भाजपा का एक बड़ा खेमा ऐसा भी है जो पार्टी में रहते हुए भी पार्टी के साथ नहीं है। इस खेमे के नेता उपेक्षित हैं। अपनी उपेक्षा से घायल यह राजनेता भारतीय जनता पार्टी की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। रेखांकित करने लायक बात यह है कि ऐसे लोगों का पार्टी के भीतर लगातार विस्तार हो रहा है। यह विस्तार आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी की वापसी में सबसे बड़ी बाधा बन सकता है। अब कीर्ति आजाद को ही लीजिए, वह कई बार भाजपा के सांसद रह चुके हैं। लेकिन वह पार्टी से खुश नहीं हैं। इसका पता इसी से चलता है कि उनकी पत्नी पूनम आजाद आगामी लोकसभा चुनाव दिल्ली से लड़ने जा रही है। वह भी आम आदमी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर। पटना से भाजपा सांसद भी पार्टी से लगातार नाराज चल रहे हैं। वह भी नई जगह और नए ठिकाने की तलाश में हैं। शत्रुघ्न सिन्हा बराबर पार्टी की फजीहत करते हैं।
बावजूद इसके पार्टी उनको क्यों बैताल की तरह अपनी पीठ पर ढोए जा रही है, समझ से परे है। बहुत संभव है 2019 लोकसभा चुनाव के पहले से दृश्य साफ हो जाए।