अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का विवादों संग चोली-दामन का साथ रहा है। 1947 में अस्तित्व में आया यह संगठन विदेशी राष्ट्रों में तख्तापलट कराने, अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे राष्ट्राध्यक्षों की हत्या कराने समेत नाना प्रकार के आरोपों से घिरा रहता है। इस बार लेकिन अपनी ही महिला अधिकारियों के ‘रुमीटू’ आंदोलन चलते यह विवादित संगठन भारी आंतरिक संकट का सामना कर रहा है
दुनियाभर में यौन उत्पीड़न का सामना करने वाली महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार हर तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में यौन उत्पीड़न का शिकार होती है। यह समस्या वैश्विक स्तर पर है और विभिन्न देशों में अलग-अलग रूपों में देखी जाती है। यौन उत्पीड़न के कई मामले सामने आते हैं, लेकिन सामाजिक कारणों चलते अधिकांश मामले सामने नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अमेरीकी कार्यकर्ता तराना बर्क द्वारा साल 2006 में ‘मीटू अभियान’ विश्व स्तर पर चलाया गया। यह मुहिम 2017 में तब ज्यादा प्रसिद्ध हुई जब अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया पर यौन उत्पीड़न का सामना करने वाले लोगों से रुमीटू का उपयोग करके अपनी आपबीती साझा करने का आग्रह किया।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में यौन उत्पीड़न और शोषण के मामलों का अंदाजा अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से लगा सकते हैं। पिछले महीने अमेरिकी खुफिया एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी को विश्वभर में तैनात रहते हुए दर्जनों महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने का दोषी पाया गया।
सीआईए में एक लम्बे समय तक अधिकारी रहे व्यक्ति, जिसने विश्वभर में तैनात दो दर्जन से अधिक महिलाओं को नशीला पदार्थ दिया, उनकी तस्वीरें खींची तथा उनका यौन उत्पीड़न किया, को 30 वर्ष की सजा सुनाई गई है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की वरिष्ठ न्यायाधीश कोलीन कोलार- कोटेली ने सजा सुनाते हुए कहा, ‘यह कहना सुरक्षित है कि वह एक यौन शिकारी है।’ ऐसे में एक तरफ जहां खुफिया जांच एजेंसी सीआईए दुविधा में है कि आखिर वो यौन उत्पीड़न मामलों की निष्पक्ष जांच और न्याय कैसे करवाए, वहीं दूसरी ओर सीआईए एजेंसी के पीड़ित अधिकारी यौन उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ खुद का ‘मीटू’ अभियान चला रहे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि सीआईए उत्पीड़न का शिकार हो रहे पीड़ितों के साथ न्याय करने के बजाय यौन उत्पीड़न अपराध को बढ़ावा दे रही है। उत्तरी वर्जीनिया और वाशिंगटन डीसी की अदालतें एक वर्ष से अधिक समय से सीआईए में कथित यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई कर रही हैं, जिससे मालूम होता है कि जासूसी एजेंसी में यौन उत्पीड़न की एक गहरी समस्या व्याप्त है।
वर्जीनिया में दो मामलों में दुष्कर्म के आरोप साबित हुए हैं। पिछले महीने ही वाशिंगटन, डीसी में एक संघीय न्यायाधीश द्वारा दर्जनों महिलाओं को नशीला पदार्थ देने और यौन उत्पीड़न के आरोप में एक पूर्व सीआईए अधिकारी को 30 साल तक की कारावास की सजा सुनाई गई है। सीएनएन की एक रिपोर्ट अनुसार सीआईए पर ऐसे ही कई आरोप हैं जो सामने नहीं आ पा रहे हैं। एक दावा ऐसा भी किया जा रहा है कि एक आरोपी अधिकारी को नौकरी से निकाल दिया गया है। हाल ही में महिला मुखबिरों का दल सीआईए में यौन उत्पीड़न और उत्पीड़न के अन्य आरोपों के बारे में कांग्रेस की निगरानी समिति के समक्ष बंद दरवाजों के पीछे गवाही देने के लिए कैपिटल हिल गई थी।
इसके अलावा सीआईए के महानिरीक्षक द्वारा पेश किए गए 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट तथा कांग्रेस के जांचकर्ताओं द्वारा की गई एक अलग समीक्षा में पाया गया कि सीआईए शिकायतों से निपटने के तरीके में गंभीर खामियां रखती है। खुफिया एजेंसी के अंदर यौन उत्पीड़न और शोषण का शिकार हुए पीड़ितों ने एक अलग, अपना मीटू अभियान चलाया है। जिसका नाम सीआईए के रुमीटू रखा गया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने पहली बार यौन उत्पीड़न की समस्या के दायरे को समझने के लिए एक आंतरिक सर्वेक्षण भी करवाया है। सर्वेक्षण के अनुसार कुल 7 फीसदी उत्तरदाताओं ने बताया कि एजेंसी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें कम से कम एक बार अवांछित यौन संपर्क या हमले का सामना करना पड़ा, जबकि 1 फीसदी ने बताया कि यह अनुभव पिछले वर्ष हुआ था।
एजेंसी में हैं कई खामियां
सीएनएन के मुताबिक खुफिया जांच एजेंसी के कई अधिकारीयों और पीड़ितों के अधिक्वक्ताओं ने कहा कि सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि एजेंसी को ‘कड़ी मेहनत करो, जमकर मौज करो’ की संस्कृति को बदलने की जरूरत है। इस नीति के चल ते लम्बे समय से अवांछित यौन आचरण के खिलाफ प्रतिबंधों को असमान रूप से लागू किया है। इस समस्या को खत्म करने के लिए अभी काफी समय लगेगा। सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस तरह के व्यवहार की जवाबदेही अनुशासन में असमानता है। सर्वेक्षण के परिणाम वास्तविक धरातल के परिणामों से कम हो सकते हैं। राष्ट्रीय यौन हिंसा संसाधन केंद्र की संचार निदेशक लौरा पालुम्बो के अनुसार हमेशा से ही यौन उत्पीड़न के मामलों की रिपोर्टिंग कम ही की जाती रही है। सीआईए के अधिकतर कर्मचारी इस तरह के सर्वेक्षण से बचते हैं कि उनकी गुमनामी का सम्मान नहीं किया जाएगा। इसीलिए संभावना है कि वे इसमें शामिल न होने का विकल्प चुनते हो।
सर्वेक्षणों के इन परिणामों को आंतरिक रूप से ऐसे समय में सार्वजनिक किया गया है जब सीआईए कुछ विशेष रूप से गंभीर आरोपों का सामना कर रही है। सीआईए की एक युवा महिला ने आरोप लगाया है कि एक वरिष्ठ अधिकारी उसके घर बंदूक लेकर आया और यौन संबंध बनाने की मांग की और फिर बाद में उसे सीआईए परिसर में धमकी भी दी। हालांकि उस अधिकारी को एजेंसी द्वारा बर्खास्त कर दिया गया है। वहीं एक अन्य महिला का कहना है कि हाल ही में यूरोप में तैनात एक अधिकारी के यौन उत्पीड़न पीड़ितों में से वह एक है। कई स्रोतों और कथित पीड़ितों में से एक द्वारा उस देश में अमेरिकी राजदूत को भेजे गए एक पत्र के अनुसार शारीरिक हिंसा का कोई आरोप नहीं है। लेकिन अधिकारी पर अपने कथित पीड़ितों को जानबूझकर यौन संचारित रोग से संक्रमित करने का आरोप लगाया गया है। वर्जीनिया कानून के तहत अगर संक्रमित व्यक्ति के ‘संक्रमण को फैलाने का इरादा’ साबित हो जाता है तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। इस मामले में सीआईए द्वारा उसकी जांच की जा रही है। यौन उत्पीड़न और शोषण से संबंधित कम से कम कुछ कथित हमले वर्जीनिया में हुए हैं। इस मामले की जांच शुरू हो चुकी है। जांच के नतीजे आने तक वह व्यक्ति सीआईए मुख्यालय में कार्यरत रहेगा। सीआईए के वरिष्ठ अधिकारियों, जिनमें मुख्य परिचालन अधिकारी मौरा बर्न्स और निदेशक बिल बर्न्स शामिल हैं उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि वे इस समस्या को गंभीरता से ले रहे हैं।
दुविधा में सीआईए
सीआईए पर लगे आरोपों का समाधान निकालते हुए एजेंसी ने पिछले साल समर्पित कार्यालय की स्थापना की। जिसका उद्देश्य यौन उत्पीड़न और उत्पीड़न के आरोपों को प्राप्त कर जांच करना था। इसे और सुविधाजनक बनाने के लिए कानून प्रवर्तन अधिकारी को नियुक्त किया गया। यह संगठन सीआईए अधिकारियों के लिए वर्गीकृत जानकारी को खतरे में डाले बिना अपराध की रिपोर्ट करना आसान बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसमें उनका कवर भी शामिल है।
सीआईए एजेंसी के नव स्थापित यौन उत्पीड़न और रोकथाम कार्यालय की प्रमुख डॉ. टैलीटा जैक्सन और मौरा बर्न्स के मुताबिक कई अधिकारी अभी भी इस बात को लेकर निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि वे अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की शिकायत दर्ज कराए या नहीं। मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार कुछ पीड़ितों का कहना है कि उन्हें अभी भी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अपने कथित हमलों की रिपोर्ट करने से रोका जा रहा है। जून में समान रोजगार अवसर आयोग को यौन हमले की एक ‘पीड़ित द्वारा दायर याचिका है जिसके अनुसार एजेंसी ने अनुचित रूप से पीड़ितों के आरोपों को गलत बताने का निर्देश दिया है।’ एक पीड़ित के अनुसार जनरल काउंसल के कार्यालय द्वारा पीड़ितों को कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष झूठे बयान देने के निर्देश दिए गए हैं और सूचित किया गया कि यदि वे किसी भी तरह से सीआईए की बाबत शिकायत करेंगे तो उन पर कार्यवाही की जाएंगी।

