वर्ष २०१७ तक रुद्रपुर नगर निगम क्षेत्र में कूड़ा उठाने के लिए पांच लाख ८० हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाते थे। लेकिन अचानक इसी काम का ठेका तीन गुना ज्यादा यानी १८ लाख १० हजार रुपए में दिया गया तो संदेह उठना स्वाभाविक है। लोग इसमें राजनेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से द्घोटाले की आशंका जाहिर कर रहे हैं

रुद्रपुर नगर निगम की स्थापना के समय लोगों को उम्मीद जगी थी कि शहर को विकास के नए आयाम मिलेंगे। लेकिन हालात यह है कि अपनी स्थापना के चार साल में ही निगम शहर के लिए विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि द्घोटालों का केंद्र बनकर उभरा है। द्घपले-द्घोटाले की शुरुआत निगम के जन्म से ही हो गई थी। हालांकि तब मामलों को दबा दिया गया। अब आरटीआई कार्यकर्ता पीएस कार्की को सूचना अधिकार के जरिए जो साक्ष्य मिले हैं, वह नगर निगम में बड़े द्घोटाले की तरफ संकेत दे रहे हैं। नगर निगम का बंटाधार करने की यह साजिश राजनेताओं, अफसरशाही और ठेकेदारों के गठजोड़ से हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि २० वार्डों के सभासद इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं।

वर्ष २०१७ तक नगर निगम रुद्रपुर के सभी २० वार्ड़ों का कूड़ा उठाने वाले ठेकेदारों को साफ सफाई के एवज में ५ लाख ८० हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाते थे। लेकिन आश्चर्यजनक है कि अब इसी काम का ठेका १८ लाख १० हजार में दे दिया गया। ठेकेदार पर मेहरबानी का सिलसिला यहीं नहीं रुक पाया। ठेके की नियमावली के अनुसार साफ-सफाई का जो ठेका तीन साल के लिए दिया जाना चाहिए था वह ५ साल ८ महीने के लिए दे दिया गया। इस तरह दो करोड़ १७ लाख सालाना के अलावा ठेकेदार को प्रति वर्ष १० प्रतिशत राशि बढ़ोतरी का भी अधिकार दे दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन नियमों का हवाला देकर यह धनराशि ५ लाख ८० हजार प्रतिमाह से बढ़ाकर १८ लाख दस हजार की गई वह अभी अस्तित्व में ही नहीं हैं। जैसा कि आजकल द्घपले- द्घोटालों को अंजाम देने की नीयत से फाइलों पर फटाफट हस्ताक्षर किए जाते हैं, इस मामले में भी यही लगता है। एक ही दिन में सारी फाइलें निपटा दी गई।

 गौरतलब है कि रुद्रपुर शहर पूर्व में नगर पालिका के अंतर्गत था। वर्ष २०१३ में यह शहर २० वार्ड़ों में बांटकर नगर निगम बना दिया गया। पूर्व में एके इंटरप्राइजेज एवं कोणार्क ग्लोबल सर्विस द्वारा शहर में डोर-टू-डोर कूड़ा एकत्रित करके उसे ट्रंचिंग ग्राउंड पर डाला जा रहा था। दोनों कंपनियों को १०-१० वार्ड का कूड़ा उठाने का ठेका दिया गया था। प्रत्येक कंपनी को २ लाख ९० हजार रुपए का ठेका दिया गया था। इस तरह पूरे महीने का शहर का कूड़ा-कचरा ५ लाख ८० हजार में ट्रंचिंग ग्राउंड तक पहुंचाया जा रहा था। लेकिन २०१७ में नगर निगम ने कूड़ा शहर से बाहर डलबाने के लिए निविदाएं आमंत्रित की। इसके लिए राज्य से बाहर के एक अखबार ‘आज’ में २ अगस्त २०१७ को विज्ञापन दिया गया। शायद यही वजह थी कि टेंडर आमंत्रित करने की इस प्रक्रिया का बहुत कम लोगों को पता चला। इसके लिए तीन निविदाएं प्राप्त हुई। जिन तीन लोगों ने निविदाएं दी, उन सभी ने एक ही दिन में एक ही समय पर ऋषिकेश के चंदा स्टांप ड्यूटी वाले से १०० रुपए के स्टांप पेपर खरीदे। हालांकि यह टेंडर की आधुनिक प्रक्रिया के मद्ेदनजर सवालों के द्घेरे में है। कारण यह है कि एक करोड़ से ऊपर का ठेका ई-टेंडरिंग के जरिए होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस तरह ३ साल के बजाए ५ साल ८ महीने के लिए ठेका १५ करोड़ ८७ लाख में जीरो वेस्ट इनकॉरपोरेशन को दे दिया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जितने का ठेका दिया जाता है उसका ३ प्रतिशत रेवन्यू स्टांप लगता है। इस तरह देखा जाए तो १५ करोड़ ८७ लाख का रेवन्यू स्टांप ४७ लाख होता है। ठेका लेने वाली कंपनी जीरो वेस्ट इनकॉरपोरेशन को ४७ लाख रुपए की स्टांप ड्यूटी देनी थी। लेकिन इसके बजाय महज १०० रुपए के स्टांप पर ही कंपनी के साथ एग्रीमेंट कर लिया गया। ठेकेदार को ४७ लाख के राजस्व का चूना लगाने की छूट दे ही दी गई। इसके अलावा ठेकेदार का हैसियत प्रमाण पत्र भी टेंडर में नहीं लगाया गया। जबकि ठेकेदार के पास ठेके की ८० प्रतिशत हैसियत का प्रमाण पत्र होना चाहिए था। ठेका लेने वाली कंपनी की आईटीआर में भी द्घपला है। नियम के अनुसार जिस कंपनी को १८ लाख १० हजार प्रतिमाह का ठेका दिया गया उसका टर्न ओवर उसमें उससे ज्यादा होना चाहिए, जबकि ठेका लेने वाली कंपनी जीरो वेस्ट इनकॉपोरेशन की आईटीआर में सिर्फ ४ लाख रुपया दिखाया गया।

सवाल यह है कि बिना हैसियत प्रमाण पत्र और उपयुक्त आईटीआर ना होने के बावजूद जीरो वेस्ट इन कॉपोरेशन को ठेका कैसे दे दिया गया? जीरो वेस्ट इनकॉपोरेशन द्वारा नगर निगम कार्यालय में जमा कराया गया आयकार रिटर्न तथा बैलेंस शीट बहुत ही कम मूल्य के हैं। मसलन जीरो वेस्ट इनकॉपोरेशन के २०१६-१७ के इनकम टैक्स रिटर्न में २२ लाख ७ हजार २०५ रुपए की आय दिखाई गई। इसी प्रकार लाभ-हानि खाते में शुद्ध लाभ ४ लाख ९० हजार दिखाया गया है। जीरो वेस्ट इनकॉरपोरेशन के पास मात्र पांच लोगों का ही लेबर लाइसेंस उपलब्ध है, जबकि नगर निगम में जीरो वेस्ट कंपनी में १०० से ऊपर कर्मचारी कार्यरत हैं। कंपनी का ईएसआई लाइसेंस तक नगर निगम के दस्तावेजों में जमा नहीं है। जो कि यह दर्शाता है कि कर्मचारियों का ईएसआई का भुगतान भी नहीं किया जा रहा।

नगर निगम और कंपनी के बीच हुए एग्रीमेंट के शर्तनामा में बिन्दु संख्या तीन में स्पष्ट वर्णित है कि द्वितीय पक्ष यानी जीरो वेस्ट इन कॉपोरेशन द्वारा कूड़े का एकत्रीकरण, छटाई एवं स्थल पर जैविक कूड़े के निस्तारण और कंपोस्ट खाद्य बनाने की पूर्ण जिम्मेदारी होगी। बावजूद इसके शर्त का पालन करने के बजाय आज तक कंपोस्ट खाद बनाने का स्थल तक चयनित नहीं किया जा सका है। उसकी जगह पर कूड़ा खुले में जलाकर पर्यावरण को प्रदूषित किया जा रहा है। कंपोस्ट खाद से नगर निगम को आय का स्रोत बनाने का दावा भी झूठा साबित हो रहा है। आरटीआई एक्टिविस्ट पीएस कार्की द्वारा इस बाबत जब आरटीआई में पूछा गया कि ठेका लेने वाली कंपनी ने कितनी कंपोस्ट खाद बनाकर बेची है, उसका ब्यौरा दें, तो इस पर निगम द्वारा ब्यौरा जीरो यानी कुछ भी नहीं दर्शाया गया है। जबकि सूत्र बताते हैं कि २० वार्डों का कूड़ा एकत्र कर ट्रंचिंग ग्राउंड तक पहुंचाने के एवज में पूर्व में दिए जा रहे ६ लाख ८० हजार रुपए के भुगतान को १८ लाख १० हजार रुपए इसी आधार पर किया गया था कि कूड़ा खुले में नहीं जलाया जाएगा, बल्कि इससे कंपोस्ट खाद बनाकर बेची जाएगी। इससे निगम को अतिरिक्त आय अर्जित करने का भी दावा किया गया था। लेकिन निगम के यह दावे महज कागजी करार साबित हो रहे हैं। निगम के नियम और शर्तें लागू होना तो दूर की बात है शहर की सफाई तक सही ढंग से नहीं हो पा रही है। जबकि डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन करने के एवज में प्रत्येक द्घर से ५० रुपए वसूला जा रहा है।

बात अपनी-अपनी

इस मामले में कोई द्घोटाला नहीं है। सब कुछ नियमों के सापेक्ष हुआ है। ज्यादा जानकारी में आपको तभी दे सकता हूं जब आप मेरे ऑफिस आएंगे।
जयभरत सिंह, आयुक्त नगर निगम रुद्रपुर

यह मामला मेरे आने से पहले का है। इसमें मैं कुछ नहीं कह पाऊंगा।
डीके तिवारी, उपायुक्त नगर निगम रुद्रपुर

पहले शहर के कूड़े को रिक्शे से फेंकवाया जाता था। लेकिन वह ठेकेदार कूड़े को मोहल्ले में ही फेंक देता था। अब गाड़ियों से कूड़ा उठवाया जा रहा है। पहले डोर-टू- डोर पैसा उगाही करके दिया जाता था। लेकिन अब वही ठेकेदार पैसा भी उगाहते हैं और खुद ही कूड़े को ट्रंचिंग ग्राउंड तक फेंकते हैं। अभी कंपोस्ट खाद बनाने के लिए जमीन नहीं मिली है। जिसकी वजह से कंपोस्ट खाद संयंत्र नहीं चल सका है। फिलहाल ठेकेदारों से उसका पैसा काटा जा रहा है।
सुरेश कोली, रुद्रपुर की मेयर के पति
(रुद्रपुर की मेयर सोनिया कोली से संपर्क साधने पर मेयर के स्थान पर उनके पति से ही बात संभव हो पाई)

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may also like

MERA DDDD DDD DD