Uttarakhand

धाकड़ धामी की चौतरफा धूम

उत्तराखण्ड में भाजपा ने पांचों सीटों पर हैट्रिक लगाकर अपना जादू बरकरार रखा। इस चुनाव में जो मुद्दे सबसे ज्यादा असर डालने वाले बताए गए उन मुद्दों को मतदाताओं ने नकारते हुए मोदी की गारंटी पर भरोसा किया है। आमजन को सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दे धामी फैक्टर के आगे टिक न सके। भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी प्रचार के मुद्दों में काफी अंतर देखने को मिला। कांग्रेस ने उत्तराखण्ड के स्थानीय मुद्दों जिनमें मजबूत भू-कानून और मूल निवास, भर्ती घोटाला के साथ -साथ बढ़ती बेरोजगारी, अंकिता भंडारी हत्याकांड और अग्निवीर पर पूरा फोकस किया तो भाजपा कांग्रेस के इन मुद्दों से बचती रही और मोदी सरकार के काम और प्रदेश सरकार के समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को ही धार देती रही

सारे कयासों को धता बताते हुए उत्तराखण्ड में एक बार फिर भाजपा ने पांचों सीट जीतकर क्लीन स्वीप किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जोड़ी को उत्तराखण्ड के लोगों ने इस लोकसभा चुनाव में भी मन से स्वीकारा है। एक तरफ जहां पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा की डगर कठिन हुई तो वहीं देवभूमि की सीमा में आते ही पार्टी की राह आसान हो गई। लगातार तीसरी बार मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अस्वीकार कर दिया है। यह तब था जब अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को लोग उत्तराखण्ड की अस्मिता से जुड़ा हुआ करार दे रहे थे। सैनिक बाहुल्य प्रदेश में कांग्रेस ने जिस अग्निवीर के मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर सैनिक परिवारों के वोट की अभिलाषा पाली थी उसकी वह इच्छा भी दम तोड़ गई।

कहा जा रहा है कि उत्तराखण्ड में भाजपा को मोदी लहर का फायदा मिला लेकिन इस जीत में राज्य की धामी सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों का भी फायदा मिला। लोगों की मानें तो ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन का बनना, नेपाल और चीन बॉर्डर तक सड़कों का पहुंचना और चारधाम को सड़क मार्ग से जोड़ना भी अहम माना गया। भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी का सभाएं कर सीधा जनता से जुड़ना भी मतदाताओं को आकर्षित करने का एक कारण रहा। इसके साथ ही उत्तराखण्ड में स्टार प्रचारकों की धूम मची रही। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से ललेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह तक ने सूबे में अपनी रैलियां की और प्रत्याशियों के लिए वोट मांगे। भाजपा का उम्मीदवार बदलने का दांव भी प्रदेश में कामयाबी की तहरीर लिख गया। यूसीसी और नकल विरोधी कानून का भी खूब असर रहा। परीक्षा पेपर लीक होने से युवाओं में जो असंतोष पनपा था वह सीएम धामी के सख्त नकल विरोधी कानून ने कम कर दिया। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रत्याशियों के पक्ष में प्रियंका गांधी और सचिन पायलट के अलावा किसी भी स्टार प्रचारक का न आना भी माहौल बनाने में कामयाब नहीं हो सका। एक प्रदीप टम्टा को छोड़कर अन्य सभी प्रत्याशियों ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने और अनुभवहीनता का असर सफल देखने को मिला। कांग्रेस के नेताओं का एकजुट न होना और लचीला संगठन भी हार के कारणों में शुमार रहा।

अल्मोड़ा-पिथारौगढ़
टम्टा के विरोध में थे सभी जिलाध्यक्ष
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने अपनी हार स्वीकार करते हुए टिकट आवंटन को हार का कारण बताया है। प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा की इस बात की पुष्टि भी होती है। कहने को तो कांग्रेस अपने संगठन के सहयोग और उनकी सहमति के बाद ही टिकट दिए जाने की बात करती है। लेकिन अगर अल्मोड़ा- पिथौरागढ़ के पार्टी प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया देखें तो कहीं से भी पारदर्शिताा नजर नहीं आती है। पिथौरागढ़ के पार्टी के एक सक्रिय कार्यकर्ता गौरव महर की मानें तो इस लोकसभा सीट के सभी जनपदों के जिलाध्यक्षों ने पार्टी हाईकमान को पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि इस बार भी अगर प्रदीप टम्टा को टिकट मिला तो वे इसका विरोध करेंगे। हुआ भी यही पिथौरागढ़, डीडीहाट, अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर और चम्पावत के सभी जिलाध्यक्षों ने उस समय अपना विरोध प्रकट किया। जब पार्टी ने पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा को उनकी नाराजगी के बावजूद प्रत्याशी घोषित कर दिया। सभी जिलाध्यक्षों ने अपने-अपने लेटर हेड पर लिखकर हाईकमान से पार्टी प्रत्याशी को परिवर्तित करने की मांग की। गौरव महर के अनुसार माननीय हरीश रावत के कहने से ही प्रदीप टम्टा को टिकट तो दे दिया गया लेकिन वे एक दिन भी उनके समर्थन में प्रचार करने क्षेत्र में नहीं आए। वे हरिद्वार में ही अपने पुत्र के चुनाव क्षेत्र तक सीमित होकर रह गए। प्रदीप टम्टा पर आरोप है कि वे राज्यसभा और लोकसभा सांसद रहते हुए भी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रहे। पिछले कई सालों से वे लोकसभा में सक्रिय नहीं थे। जिसका फायदा भाजपा उम्मीदवार अजय टम्टा को मिला। अजय टम्टा क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहते थे उन्होंने पिथौरागढ़ और बागेश्वर के साथ ही चम्पावत के सीमांत में न केवल मोबाइल टावर
लगवाकर लोगों को कनेक्टविटी से जोड़ा, बल्कि कई सड़कों के निर्माण भी किए। अल्मोड़ा के बाशिंदों का कहना है कि कांग्रेस अगर प्रदीप टम्टा की बजाय यशपाल आर्य पर दांव खेलती तो पार्टी की जीत निश्चित थी। लेकिन हरीश रावत यशपाल आर्य के प्रति दरियादिल नहीं दिखा सके। इसके चलते ही यशपाल आर्य अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने से पीछे हटते नजर आए।

नैनीताल-ऊधमसिंह नगर

यशपाल की ‘मंडलम’ रणनीति का अधूरापन
कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के बारे में कहा जाता है कि अपने राजनीतिक जीवन में वे जितने भी चुनाव लड़े हैं किसी में भी वह आज तक नहीं हारे हैं। पार्टी के नेताओं की मानें तो इस लोकसभा चुनाव में यशपाल आर्य चाहते थे कि कांग्रेस उन्हें नैनीताल से चुनाव लड़ाए। जिसके लिए
उन्होंने बहुत दिनों पहले से ही तैयारी कर ली थी। यशपाल आर्य ने जमीनी कार्य करते हुए नैनीताल- ऊधमसिंह नगर के पार्टी कार्यकर्ता की एक टीम बनाई थी। उनकी यह टीम भाजपा के पन्ना प्रमुख को ‘मंडलम’ के जरिए टक्कर देने के लिए पूरी तरह से तैयार थी। आर्य की ‘मंडलम’ रणनीति के तहत एक ‘मंडलम’ में 10 बूथ बनाए गए थे। काशीपुर के कांग्रेस नेता राजीव चौधरी के अनुसार वह भी अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए यशपाल आर्य की मीटिंग में शामिल हुए थे। लेकिन प्रकाश जोशी ने ‘मंडलम’ टीम की बाबत जानकारी होने के बावजूद भी कभी कोई मीटिंग कराने की कोशिश तक नहीं की। प्रकाश जोशी इस चुनाव में कितनी गंभीरता से मैदान में उतरे इसे इससे जाना जा सकता है कि उन्होंने चुनावी कार्यक्रमों के दौरान पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ बैठक करना तो दूर उनसे राय-मशविरा तक भी नहीं लिया। जबकि दूसरी तरफ भाजपा प्रत्याशी अजय भट्ट पार्टी के छोटे से छोटे कार्यकर्ता से सीधे सम्पर्क में रहे। भट्ट की सौम्यता और लोगों तक पहुंचने की सरलता ही उनका प्लस प्वाइंट रहा। यही वजह रही है कि अजय भट्ट प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीते हैं। यह तब है जब इस सीट पर अल्पसंख्यक समुदाय बहुतायत में हैं। नैनीताल- ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट पर शुरू में प्रकाश जोशी कहीं नहीं दिख रहे थे। उनके चुनाव प्रचार ने उस समय जोर पकड़ा जब हल्द्वानी में राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की रैली हुई। लेकिन इसके बाद भी वे तीन लाख से अधिक वोटों से चुनाव हार गए।

टिहरी
फिर राजशाही का राज
तमाम कयासों और मतदाताओं की नाराजगी के बावजूद टिहरी संसदीय सीट पर भाजपा की माला राजलक्ष्मी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है। जबकि मुकाबले में कांग्रेस के पूर्व विधायक और वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी जोत सिंह गुनसोला दूसरे स्थान पर रहे। हर चुनाव में टिहरी राजपरिवार पर हमेशा से क्षेत्र की समस्याओं और जनता से दूरी का आरोप लगता रहा है तो वहीं राजपरिवार पहले से ज्यादा मतों से जीत हासिल करता रहा है। इसी तरह से माला राजलक्ष्मी पर भी जनता से दूरी और क्षेत्र की समस्याओं के प्रति उपेक्षा का आरोप 2012 से ही लगते रहे हैं। बावजूद इसके हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर पहले से कई गुना बढ़ा है। 2012 के उपचुनाव से लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव में माला राजलक्ष्मी को मिले मतों के आंकड़ों को देखें तो उनका जीत का अंतर पहले से कई गुना ज्यादा रहा है।

लगातार तीन बार सांसद होने के चलते महारानी माला राजलक्ष्मी के प्रति मतदाताआंे में उदासी भी सामने आ रही है जिसका असर 2024 के
लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। इस बार माला राजलक्ष्मी को 462603 मत मिले जबकि 2019 में 565333 वोट मिले। माला राजलक्ष्मी 4 लाख 62 हजार से भी ज्यादा मत लाने में सफल रही है और कांग्रेस के जोत सिह गुनसोला को 272493 मतों के भारी अंतर से हारे। जोत सिंह गुनसोला पूर्व विधायक और वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी होने के बावजूद चुनाव में कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए जबकि निदर्लीय बॉबी पंवार का प्रभाव ज्यादा देखा गया। कांग्रेस पार्टी ने गुनसोला को चुनाव मैदान में खड़ा तो कर दिया लेकिन उनको एक तरह से अकेले ही महाभारत के उस युद्ध में भेज दिया जिसमें भाजपा जैसी साधन सपन्न और मजबूत संगठन पार्टी मुकाबले में हो। हैरत की बात यह है कि गुनसोला के साथ कांग्रेस का एक भी बड़ा नेता नजर नहीं आया। न तो उनके चुनाव प्रचार में दिखाई दिया और न ही अपने क्षेत्र में मतदताओं को कांग्रेस के पक्ष में करने में सफल रहा। चकराता सीट इसकी सबसे बड़ी प्रमाण मानी जा रही है। चकराता सीट जिस पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह का लंबे समय से कब्जा रहा है, उसी चकराता सीट पर गुनसोला महज 7054 वोट ही पा सके जबकि बॉबी पंवार चकराता से 13045 वोट हासिल करने में सफल रहे।

सूत्रों की मानंे तो कांग्रेस के प्रत्याशी चयन के बाद से ही साफ हो गया था कि कंाग्रेस इस सीट पर सबसे कमजोर उम्मीदवार को उतारा है। जबकि प्रीतम सिंह ने चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया था जिसके बाद गुनसोला को मन मारकर चुनाव में उतारना पड़ा। अधिक उम्र और संसाधनों की कमी चलते गुनसोला के चुनाव प्रचार में भी इसका असर देखा गया। उनकी जनभावनाओं और रैलियो में भीड़ तक नहीं जुट पा रही थी। यहां तक कि कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जिस तरह से हरिद्वार और नैनीताल सीट पर रैलियां की उस तरह से टिहरी सीट को अकेला छोड़ दिया। कांग्रेस संगठन के बड़े नेता भी गुनसोला के प्रचार से नदारद दिखे।

हरिद्वार
संगठन को प्राथमिकता न देना बना हार की वजह
लोकसभा चुनाव होने से पूर्व हरिद्वार सीट पर जो सर्वे आया उसमें कांग्रेस जीत रही थी। कारण 10 साल से सांसद रहे डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के खिलाफ एंटी एनकम्बेंसी का होना था। यही वजह रही कि कांग्रेस के नेता जहां अन्य सीटों पर चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे थे तो सबसे ज्यादा दावेदार यही कर रहे थे। हरक सिंह रावत के अलावा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा भी यहीं से चुनाव लड़ना चाहते थे। अंतिम समय पर हरीश रावत अपने पुत्र वीरेंद्र रावत के लिए टिकट कराने में कामयाब रहे। लेकिन शुरू में जो चुनावी माहौल कांग्रेस के पक्ष में मजबूत था चुनावी तिथि आने के समय वह कमजोर हो गया। शायद यही वजह रही थी हरीश रावत ने चुनाव से एक दिन पहले भावनात्मक कार्ड खेला। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में वे भावनात्मक अपील करते हुए इस चुनाव को जीवनभर की पूंजी कहते नजर आए। इसमें दो राय नहीं कि रावत यह चुनाव पूरी शिददत के साथ लड़े। उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक अनुभवों का प्रयोग करते हुए यह चुनाव जीतने की रणनीति बनाई। लेकिन भाजपा के प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत हरिद्वार शहर और डोईवाला के साथ ही धर्मपुर, ऋषिकेश में मतदाताओं की पहली पसंद बने। हालांकि हरिद्वार के अल्पसंख्यक मतदाता पूरी तरह हरीश खेमे में नजर आए।

निर्दलीय विधायक उमेश कुमार के लिए शुरुआत में कहा जा रहा था कि वे अल्पसंख्यक मतांे में सेंध लगाकर भाजपा को फायदा पहुंचाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उमेश कुमार 91 हजार मत तो पाए लेकिन अपनी जमानत नहीं बचा पाए। उत्तराखण्ड के चुनावी इतिहास में यह भी पहली बार हुआ है कि यहां से बसपा के प्रत्याशी की जमानत जब्त हुई है। देखा जाए तो अल्पसंख्यक और दलितों का एकमुश्त वोट वीरेंद्र रावत को गया। लेकिन फिर भी क्या कारण थे कि रावत डेढ़ लाख मतों से यह चुनाव हार गए? इसका कारण बताते हुए लोगों का कहना है कि अगर यह चुनाव हरीश रावत लड़ते तो जीतते लेकिन उन्होंने जब बेटे को टिकट दिलाने के लिए पूरी जान लगाई तो कांग्रेसी कार्यकर्ता निराश हुए। कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि हरीश रावत हरिद्वार में सिर्फ परिवारवाद को पनपाना चाहते हैं। पहले बेटी अनुपमा रावत को हरिद्वार ग्रामीण से विधायक बनाया और अब बेटे को सांसद बनाने की उनकी मुराद वे पूरी करने के पक्ष में नहीं थे। एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने कहा कि लोगों का विरोध ही था कि अनुपमा रावत के विधानसभा क्षेत्र हरिद्वार ग्रामीण में भाजपा प्रत्याशी को सबसे ज्यादा वोट मिले। यहां कांग्रेस प्रत्याशी भाजपा प्रत्याशी से 9800 वोटों से पीछे रहे। हालांकि कांग्रेस विट्टाायकों वाली सीटों पर वीरेंद्र रावत को अधिक मत मिले। मंगलौर में 23 हजार तो पिरान कलियर में वीरेंद्र रावत को 19000 मत मिले।

हरीश रावत पर कांग्रेस के नेताओं का यह भी आरोप है कि उन्होंने संगठन को इस चुनाव में प्राथमिकता नहीं दी। यहां तक कि जिलाध्यक्ष तक को कोई चुनावी जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई। कार्यालय खोलने तक में उन्हें नहीं बुलाया गया। जब पार्टी के जिलाध्यक्ष ने एक चुनावी कार्यक्रम तय किया तो हरीश रावत और वीरेंद्र रावत में से किसी ने भी वहां जाना उचित नहीं समझा। यहां तक कि हरिद्वार में प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा तक को नहीं बुलाया गया। जिससे माहरा के समर्थकों में भी नाराजगी देखी गई। बताया जा रहा है कि संगठन के लोग पार्टी प्रत्याशी से इतने नाराज थे कि लोकसभा क्षेत्र के कई बूथ नजर आए जहां चुनाव के दिन पार्टी को एजेंट तक नहीं मिले। हालांकि हरिद्वार के लोग यह भी मानते हैं कि 10 साल तक सांसद रहकर इतनी सक्रियता डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ नहीं दिखा पाए जितना हरीश रावत सक्रिय रहे। गन्ना भुगतान से लेकर किसानों के हर मुद्दे पर वे जनता के साथ खड़े रहते थे। यहां तक कि खाड में पुल और खादर क्षेत्र में कई विकास कार्य हरीश रावत के सांसद रहते मील का पत्थर साबित हुए हैं। महानगर अध्यक्ष सतपाल लड़ रहे थे। बताया जा रहा है कि सतपाल ब्रह्माचारी की पूरी टीम हरिद्वार की बजाय सोनीपत में चुनावी कसरत करने में जुटी रही। हरिद्वार के वाशिंदों की माने तो वीरेंद्र रावत हरीश रावत की जमीनी नेता की छवि के आगे कहीं नहीं ठहरते नजर आए। वे 2022 में खानपुर विधानसभा का चुनाव लड़ने की तैयारी करते समय लोगों के संपर्क में रहे। लेकिन हरीश रावत की तरह लोगों में अपनी पैठ बनाने में कामयाब नहीं रहे। लोगों का यह कहना है कि हरिद्वार में वीरेंद्र रावत की हार की मुख्य वजह चुनावी मैनेजमेंट का न होना भी रहा। उट्टार पार्टी के कुछ पुराने सिपहसलारों का हरीश रावत का साथ छोड़ भाजपा प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ चले जाना भी सफलता न मिलने का एक कारण रहा। ऐसे लोगों में प्रमोद खारी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। खारी कभी हरीश रावत के खास हुआ करते थे लेकिन वह कांग्रेस छोड़ भाजपा में चले गए। खारी के बारे में एक बात यह भी चर्चा में है कि जब भाजपा का हर छोटे से बड़ा कार्यकर्ता डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के साथ जुटा हुआ था तब वे त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ हरिद्वार में चुनावी रणनीति बनाने में जुटे थे। हरिद्वार में स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि भाजपा जहां एक तरफ चुनाव में सभी का साथ लेकर चल रही थी तो वहीं हरीश रावत अपने बेटे वीरेंद्र रावत को अपने दम पर अकेले ही चुनाव लड़ाते दिखे।

पौड़ी गढ़वाल
मुद्दे हुए हवा-हवाई
प्रदेश में खास तौर पर गढ़वाल ससंदीय सीट पर कुछ बड़े मुद्दे चुनाव प्रचार के दौरान चर्चाओं में रहे थे। इनमें पौड़ी जिले की निवासी अंकिता भंडारी हत्याकांड सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहा। गढ़वाल संसदीय सीट के 13 विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक होने के बावजूद पार्टी नेताओं और सांसदों पर पहाड़ की बेटी के साथ खड़े न होने का आरोप कांग्रेस द्वारा जमकर लगाया गया। साथ ही प्रदेश सरकार और भाजपा पर इस हत्याकांड में एक वीआईपी के नाम छुपाए जाने के आरोप लगे। भाजपा के नेता इस मुद्दे पर मतदाताओं के सामने अपनी बात रखने से असहज ही नजर आते हैं। यह मुद्दा भाजपा नेताओं के साथ-साथ उसके स्टार प्रचारकों की भी गले की फांस बनता दिखाई दिया जिसके चलते इस पर एक शब्द भी कहने से परहेज किया जाता रहा। हालांकि भाजपा संगठन द्वारा इस मामले में दोषियों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने को लेकर अपनी सरकार की मजबूरी तो बताते रहे लेकिन वीआईपी का नाम का खुलासा उसके गले की फांस बन गया था। गढ़वाल सीट पर कांग्रेस ने इस मुद्दे को प्रदेश की महिलाओं की अस्मिता से जोड़कर भाजपा के खिलाफ एक बड़ा चुनावी हथियार के तौर पर अपनाते हुए भाजपा के बड़े नेताओं की चुप्पी को भी चुनाव में अपने पक्ष में करने के लिए तमाम जतन किए और चुनावी रैलियों में इसको खूब उठाया। सोशल मीडिया मंचों पर भी अंकिता भंडारी को न्याय दो और वीआईपी का नाम सार्वजनिक करो तेजी से ट्रेंड हुआ। परंतु चुनावी परिणाम से यह साफ हो गया कि अंकिता भंडारी हत्याकांड का मुद्दा गढ़वाल संसदीय सीट के साथ-साथ पौड़ी जिले में ही पूरी तरह से नाकाम रहा। गौर करने वाली बात यह है कि जिस गंगा भोगपुर क्षेत्र में अकिता भंडारी की हत्या हुई उसी क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग ही नहीं किया और 1273 मतों में से सिर्फ एक मत ही पड़ा।

चुनाव प्रचार के दौरान अग्निवीर एक ऐसा बड़ा मुद्दा बनता नजर आ रहा था। भाजपा नेता और उम्मीदवार तक इस मुद्दे पर बात करने से ही कतराने से साफ हो गया था कि अग्निवीर योजना भाजपा के लिए चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस ने अग्निवीर योजना को देश की सुरक्षा के लिए घातक बताते हुए इस योजना के खिलाफ प्रचार भी किया। यहां तक कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सत्ता में आने के बाद इस योजना को खत्म करने का वादा भी किया। प्रदेश कंाग्रेस संगठन और पार्टी के बड़े नेताओं ने भी कांग्रेस सरकार बनने के बाद इस योजना को खत्म करके सेना में परंपरागत भर्ती योजना चलाने का वादा किया।

गौरतलब है कि उत्तराखण्ड सैन्य बाहुल्य प्रदेश के तौर पर जाना जाता रहा है। देशभक्ति और सेना में जाने की ललक युवाओं में हमेशा से ही जागृत रही है। दिलचस्प तथ्य है कि जहां सेना में भर्ती को देशभक्ति से जोड़कर देखा जाता रहा है तो वहीं उत्तराखण्ड में इसे देशभक्ति के साथ-साथ रोजगार का सबसे बड़ा साधन के तौर पर भी देखा जाता है। प्रदेश में सबसे ज्यादा पूर्व सैनिक हैं और एक बड़ी तादात सेना में शामिल लोगों की है। चुनावी राजनीति में भी पूर्व सैनिकों के साथ-साथ सेवारत सैनिकों का दोनांे ही दलों को भरपूर वोट मिलता रहा है। भाजपा के प्रति सैनिकों का ज्यादा रुझान रहता आया है।

चुनावी परिणाम से यह बात तो स्पष्ट हो गई है कि स्थानीय मुद्दों को मतदाताओं ने पूरी तरह से नकारा नहीं है लेकिन भाजपा की चुनावी रणनीति और मोदी-धामी की लोकप्रियता स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा हावी होने से भाजपा को बड़ी जीत मिल पाई है।

 

भविष्य का चेहरा बनकर उभरे पंवार

निदर्लीय उम्मीदवार बॉवी पंवार भले ही तीसरे स्थान पर रहे हैं लेकिन 1 लाख 68 हजार 81 वोट लाकर बॉवी पंवार ने प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के उन नेताओं के लिए एक बड़ी लकीर खींचने में भी पंवार सफल रहे हैं जो इस क्षेत्र में वर्षों से राजनीति करते रहे हैं और अपने आप को इन क्षेत्रों की राजनीति के मठाधीश मान चुके हैं।

प्रदेश के युवाओं के हितों के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा करके सत्ता को चुनौती देकर युवा वर्ग में अपनी गहरी पैठ बना चुके बॉवी पंवार प्रदेश के चर्चित परीक्षा और भर्ती घोटाले का खुलासा करके पहली बार सुर्खियों में आए थे। इससे पूर्व बेरोजगार महासंघ का गठन करके प्रदेश के बेरोजगारों के हकों के लिए एक बड़ा मंच तैयार कर चुके बॉवी पंवार ने प्रदेश की सरकार और सरकारी सिस्टम को बड़ी चुनौती देते हुए कई आंदोलन किए थे।
बॉवी पंवार ने पिछले वर्ष देहरादून के घंटाघर में एक बड़ा आंदोलन किया जिसमें पुलिस द्वारा लाठी चार्ज भी किया गया और उनके खिलाफ कई गंभीर धाराओं में मुकदमंे दर्ज किए और उनको जेल भी भेजा गया। सरकारी तंत्र के दमन के बावजूद बॉवी पंवार को युवाओं का भरपूर साथ मिलता रहा जिसका फायदा लोकसभा चुनाव में देखने को मिला।

भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाला और राजशाही से मुक्ति जैसे मुद्दों को बॉबी पंवार ने अपने चुनावी प्रचार में थामे रखा। जिस तरह से बॉवी पंवार को मतदताओं ने भरपूर मत दिए हैं उससे तो यह नहीं कहा जा सकता कि इन मुद्दों का चुनाव में असर नहीं पड़ा। भ्रष्टाचार और भर्ती घोटाले के साथ-साथ मूल निवास और भू-कानून को भी अपने चुनाव प्रचार में जनता के सामने रखा उसी का असर रहा कि पंवार को एक लाख 68 हजार वोट मिले हैं। हालांकि यह भी दिलचस्प है कि भर्ती घोटाले, भू-कानून और मूल निवास को लेकर देहरादून में सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया गया जिसमें युवाओं की बड़ी तादात देखने को मिली लेकिन देहरादून शहर और इससे लगती हुई विधानसभाओं कैंट, मसूरी, राजपुर में बॉवी पंवार को वोट बहुत कम मिले हैं। जबकि देहरादून जिले की चकराता और उत्तरकाशी जिले की तीनों सीटों के साथ-साथ टिहरी जिले की चारों सीटों पर भी बॉवी पंवार को मतदाताओं ने निराश नहीं किया।

-कृष्ण कुमार

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