हिंदू धर्म के शीर्ष धर्मगुरुओं द्वारा आपत्ति उठाए जाने को दरकिनार करते हुए अयोध्या में निर्माणाधीन राममंदिर में रामलला की मूर्ति का सफल प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित कर भाजपा पूरे देश में यह संदेश दे पाने में सफल रही कि नरेंद्र मोदी ही असल हिंदू हृदय सम्राट हैं और उनके नेतृत्व में ही भारत अपने गौरवशाली अतीत को वापस ला सकता है। उच्चतम न्यायालय के कई पूर्व न्यायाधीशों, कॉरपोरेट की दुनिया के दिग्गजों और फिल्मी सितारों से लेकर आम हिंदू मतदाता राममंदिर निर्माण को सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मान जिस तरह से खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है उससे स्पष्ट है कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की राह रोक पाना विपक्षी दलों के लिए लगभग असंभव हो चला है

देश में इन दिनों एक ओर जहां आगामी आम चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं वहीं सैकड़ों वर्षों से चली लंबी लड़ाई और फिर देश की सर्वाेच्च अदालत के फैसले बाद आखिरकार भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है। इस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी, यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत सहित कई उद्योगपति और बड़ी हस्तियां शामिल हुए।

22 जनवरी 2024 को जय श्री राम की रैली

रामलला के प्राण प्रतिष्ठा के बाद पीएम मोदी ने कार्यक्रम स्थल पर मौजूद जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा ‘हमारे राम आ गए हैं। रामलला अब टेंट में नहीं बल्कि दिव्य मंदिर में रहेंगे। आज हमें सदियों के उस धैर्य की धरोहर मिली है। आज हमें श्रीराम का मंदिर मिला है। गुलामी की मानसिकता को तोड़कर उठ खड़ा हुआ राष्ट्र ऐसे ही नव इतिहास का सृजन करता है। ‘‘प्रधानमंत्री ने राम मंदिर को लेकर अदालत के फैसले का भी जिक्र किया और कहा कि न्याय के पर्याय प्रभु राम का मंदिर भी न्यायबद्ध तरीके से ही बना। राम मंदिर से जुड़े विवाद की ओर संकेत करते हुए पीएम मोदी ने कहा, ‘‘कुछ लोग कहते थे कि राम मंदिर बना तो आग लग जाएगी। ऐसे लोग भारत की सामाजिक विवेक को नहीं जान पाए। राम आग नहीं ऊर्जा हैं। राम विवाद नहीं, समाधान हैं। राम सिर्फ हमारे नहीं हैं, सबके हैं। राम सिर्फ वर्तमान नहीं, अनंतकाल हैं। ये भारत का समय है और भारत अब आगे बढ़ने वाला है। शताब्दियों के इंतजार के बाद ये पल आया है अब हम रुकेंगे नहीं।’’

पीएम के इस भाषण को लेकर कहा जा रहा है कि उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री के भाषण में राम के आने की बात कहकर एक बड़ा राजनितिक संदेश दिया है। पीएम ये बताना चाह रहे हैं कि राम को बीजेपी और आरएसएस लेकर आए हैं। जो आने वाले चुनाव को देखकर कहा गया है। इस कार्यक्रम से पहले जिस तरह से देशभर में झंडे बांटे गए और भजन-कीर्तन हुआ इससे ये संदेश देने की कोशिश की गई कि सिर्फ बीजेपी ही हिंदुओं की एक मात्र रक्षक है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मानना है कि कांग्रेस जिस तरह ‘तुष्टिकरण’ की नीति चलाती रही है उससे देश में अस्सी फीसदी होते हुए भी हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बने रहते। भाजपा लोगों में हिंदू गर्व भरने में कामयाब रही है और हिंदुओं की एक बड़ी आबादी इस भावना में बहने भी लगी है।

राजनीतिक विश्लेषक लेकिन मानते हैं कि बीजेपी सिर्फ राम मंदिर के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकती। सारे राम भक्त बीजेपी के समर्थक नहीं हैं। अगर सारे हिंदू राम के नाम पर बीजेपी को वोट देते तो इसे कम से कम 80 फीसदी नहीं तो 60 फीसदी वोट मिलते ही मिलते। राम के भक्त को भारतीय जनता पार्टी का वोटर मानना ठीक नहीं होगा। ये भी नहीं कि भाजपा को इसका कोई लाभ नहीं होगा। जाहिर है फायदा होगा क्योंकि बीजेपी ने 30 साल तक इसके लिए लड़ाई लड़ी है। तमाम हार-जीत, कानूनी लड़ाई, संसद की राजनीति, के बाद भव्य राम मंदिर बना है। बीजेपी इसका फायदा क्यों न उठाए। इसके अलावा भाजपा के पास मोदी की गारंटी नामक चुनावी हथियार भी है जिसे पार्टी चुनाव में जोर-शोर से उठाएगी।

भाजपा को लग रहा है कि 2024 के चुनाव में अगर बीजेपी को उत्तर भारत में कोई झटका लगता है तो दक्षिण में कुछ सीटें जीतकर वो इसकी भरपाई कर सकती है। बीजेपी दक्षिण भारत में अपना विस्तार करना चाहती है। मोदी जी का हर कदम राजनीतिक और चुनावी होता है। जिस तरह वो दक्षिण में मंदिर- मंदिर घूमे हैं उससे यही संकेत मिलते हैं। हालांकि उत्तर भारत में बीजेपी की सीटों में कोई कमी आएगी ऐसा हाल फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा है लेकिन प्रधानमंत्री ये समझते हैं कि भारतीय जनता पार्टी पर उत्तर भारत या हिंदी बेल्ट की पार्टी होने का जो टैग लगा है उसे खत्म किया जाए। मोदी की गारंटी और मंदिर को वो दक्षिण भारत में भी प्रयोग करना चाहते हैं।

खास बात यह कि तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर इस मंदिर के प्रसंग के कारण पूरा देश ‘राम’ के रंग में रंगा नजर आ रहा है। ऐसे में देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का जिस तरह से आयोजन किया उसके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि आम चुनाव से ठीक पहले मंदिर की राजनीति के जरिए भी भाजपा इंडिया गठबंधन को घेरना चाहती है। वैसे भी कई विपक्षी दलों ने कार्यक्रम से दूरी बनाई रखी। ऐसे में बीजेपी काफी आसानी से उन्हें हिंदू विरोधी बात कर एक विशेष वर्ग को अपने पाले में करना चाहती है। इस माहौल में सवाल उठ रहे हैं कि इस प्रसंग को धार्मिक या आध्यात्मिक कहा जाए या राजनीतिक? क्योंकि आध्यात्म के साथ राजनीति भी इस घटनाक्रम से जुड़ी नजर आ रही है और राजनीति का इससे तालमेल भी किसी से छुपा नहीं है। इसके साथ ही यह भी प्रश्न उठ रहा है कि अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा आने वाली रामनवमी (राम जन्मदिवस) के बजाए अभी क्यों किया गया? क्या इस पवित्र धार्मिक कार्य को रामनवमी के दिन नहीं किया जा सकता था? क्या भाजपा इसके जरिए

लोकसभा चुनाव 2024 में जीत की हैट्रिक लगाना चाहती है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रामनवमी तक देश में आम चुनाव होने हैं। जिसमें कुछ ही महीनों का समय शेष है। ऐसे में आचार संहिता लागू हो जाती और सत्तारूढ़ दल को उसका राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाता, इसलिए इस आध्यात्मिक कार्य के लिए बाईस जनवरी के दिन का चयन किया गया। असल में भाजपा सभी विरोधी पार्टियों को अपनी रणनीतिक पिच पर बुला रही है। राहुल गांधी बजरंगबली का मुखौटा पहने नजर आ रहे हैं तो अरविंद केजरीवाल सुंदर कांड करा रहे हैं। फिर भी देश में यह पहली बार हुआ है कि वामपंथी और कांग्रेस को एक दक्षिणपंथी व्यक्ति ने ध्वस्त कर दिया है।

कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह जग जाहिर है कि भाजपा शुरू से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति करती रही है। यह जनसंघ के जमाने से रहा है। यह उनके डीएनए का हिस्सा रहा है, मगर विपक्ष की कमजोरी का एक कारण यह है कि वह मूल बातों को नजरअंदाज करती हैं। यह कहना कि राम के नाम पर भाजपा वोट मांग रही है वह गलत है। जिस प्रकार कई दलों ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर आरोप लगाए कि यह भाजपा का राजनीतिक आयोजन है और इसे 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इसके लिए कई अहम बातों को नजरअंदाज किया गया। विरोध करने वाले ज्यादातर दल अब अयोध्या जाने की बात कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में भी इसी तरह की बातें हो रही थीं। 2024 के चुनाव नतीजों के बाद भी इस तरह की बात हो सकती है क्योंकि जमीनी स्तर पर जो सामाजिक आर्थिक बदलाव हुए हैं उसकी वजह से हजारों मतदाता भाजपा के साथ जुड़े हैं। ये वोटर सिर्फ मंदिर की वजह से नहीं जुड़े हैं। देश का 50 फीसदी वोटर पिछड़ी जाति से आता है। वह भाजपा के साथ क्यों है यह भी समझना होगा।

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