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कितनी कारगर होगी मंदिर राजनीति?

इन दिनों देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस आगामी आम चुनाव 2024 को फतह करने की भरसक कोशिश में जुटे हैं। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर हैं, वहीं भाजपा ने राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का जिस तरह से आयोजन किया उसके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि आम चुनाव से ठीक पहले मंदिर की राजनीति के जरिए भाजपा इंडिया गठबंधन को घेरना चाहती है। वैसे भी कई विपक्षी दलों ने कार्यक्रम से दूरी बनाई रखी। ऐसे में बीजेपी काफी आसानी से उन्हें हिंदू विरोधी बात कर एक विशेष वर्ग को अपने पाले में करना चाहती है। ऐसे में सवाल है कि राम आएंगे, क्या वोट दिलाएंगे? भाजपा को इसका कितना फायदा होगा? क्या भाजपा को आसानी से लोकसभा चुनाव में जीत मिल जाएगी? कितनी कारगर होगी मंदिर की राजनीति?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इतना सरल भी नहीं है यह गणित। भाजपा के लिए कई चुनौतियां भी हैं। बीजेपी मंदिर पॉलिटिक्स की राह पर जरूर चलती है, लेकिन उसका ये मानकर चलना कि इसी राम मंदिर के जरिए उसे 400 से अधिक सीटें मिल जाएंगी, ये गलत है। नेरेटिव अपनी जगह है लेकिन जो तथ्य हैं, वो कुछ अलग ही कहानी बयां करते हैं। ये बात अब जग जाहिर हो चुकी है कि हिंदी पट्टी राज्यों में भाजपा विपक्ष के मुकाबले ज्यादा मजबूत स्थिति में है।

बात चाहे 2014 के चुनाव की हो या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव की, पार्टी ने हिंदी भाषी राज्यों में एक तरह से क्लीन स्वीप किया था। अगर हिंदी पट्टी राज्यों के साथ दक्षिण के कर्नाटक को भी जोड़ लिया जाए तो बीजेपी ने 2019 के चुनाव में 211 सीटें अपने नाम की थी। 2014 में ये आंकड़ा 210 सीटों का था। लेकिन बड़ा खेल ये रहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 12 प्रतिशत के करीब बढ़ गया, मगर सीटों में बढ़ोतरी सिर्फ एक रही। अब यही बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता भी है, उसे भी इस बात का एहसास है कि बढ़े हुए वोट बैंक का मतलब ये नहीं कि सीटों में भी उतना ही इजाफा हो जाएगा।

सियासी जानकार तो यहां कह रहे हैं कि हिंदी भाषी राज्यों में बीजेपी ने पिछले दो चुनावों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दिया है, यानी कि सुधार की गुंजाइश न के बराबर चल रही है। वहीं दूसरी बात ये है कि मंदिर की राजनीति का सबसे ज्यादा असर भी इन्हीं हिंदी भाषी राज्यों में दिखता है। ऐसे में बीजेपी को किस तरह से इस हिंदुत्व की राजनीति से फायदा मिलेगा, इसका जवाब अभी देना मुश्किल है। बीजेपी को ये समझना भी जरूरी है कि वो उत्तर प्रदेश में 80 की 80 सीटें जीतने का दावा जरूर कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत और वोटिंग पैटर्न उसके लिए चुनौतियां पेश कर रहे हैं।

असल में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का यूपी में 8 फीसदी के करीब वोट शेयर बढ़ा था। उसने 50 फीसदी का बेंचमार्क छू लिया था, लेकिन हैरानी इस बात की रही कि इस प्रचंड वोट शेयर के बाद भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 2014 की तुलना में 9 सीटों का नुकसान हुआ। बीजेपी समर्थकों की मानें तो राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के जरिए दक्षिण की राजनीति को भी पार्टी साधने की कोशिश करेगी। प्रधानमंत्री मोदी भी जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में लगातार दक्षिण भारत के दौरे कर रहे हैं और अलग-अलग मंदिरों का दौरा किया जा रहा है, रणनीति साफ पता चल रही है। लेकिन यहां भी आंकड़ों वाली हकीकत बीजेपी की राह को मुश्किल कर रही है। दक्षिण से कुल 130 सीटें लोकसभा की निकलती है, पिछली बार बीजेपी को इन्हीं 130 सीटों में से मात्र 29 पर संतुष्ट करना पड़ गया था। वहां भी कर्नाटक से ही उसे अकेले 25 सीटें मिली थीं।

इस बार बीजेपी तमिलनाडु में कुछ सीटें जीतने की कोशिश कर रही है, लेकिन पार्टी की राजनीति और तमिलनाडु का सियासी मिजाज कभी भी मेल नहीं खाता है। ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु में या केरल में धर्म के लिए कोई जगह नहीं, वहां भी कई मंदिर हैं, वहां पर हिंदुओं के कई धार्मिक स्थल हैं, लेकिन जिस तरह से धर्म की राजनीति को उत्तर भारत में तवज्जो दी जाती है, वैसा हाल तमिलनाडु या फिर केरल में देखने को नहीं मिलता है। बात अगर अकेले तमिलनाडु की हो तो वहां पर जिस तरह से कई सामाजिक आंदोलन चलाए गए, जिस तरह से द्रविड़ आंदोलन को धार दी गई उसने भी वहां के लोगों के लिए धर्म वाली राजनीति को कम सक्रिय कर दिया था। इसी वजह से बीजेपी जब भी तमिलनाडु में मंदिर पॉलिटिक्स का जिक्र करती है या फिर हिंदुत्व वाली राजनीति के नाम पर वोट मांगने की कोशिश करती है, वहां की जनता उसे नकार देती है। ऐसे में मंदिर पॉलिटिक्स के जरिए इस बार दक्षिण में पार्टी कितना बड़ा उलटफेर कर पाएगी, इसे लेकर जानकारों के मन में ही कई प्रकार के संशय है।

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