ललित जोशी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र जीवन से की। वे 23 वर्ष पूर्व एनएसयूआई सचिव के रूप में छात्र राजनीति में उतरे। इसके बाद जोशी छात्र संघ और कांग्रेस में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 1995 में एमबीपीजी कॉलेज हल्द्वानी में छात्र संघ के सचिव, 1999 में छात्र संघ अध्यक्ष बने। 1999-2000 तक छात्र संघ महासंघ कुमाऊं विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले जोशी को कांग्रेस ने हल्द्वानी में मेयर पद का उम्मीदवार बनाया है। पेश है जोशी से ‘दि संडे पोस्ट’ के विशेष संवाददाता संजय स्वार की बातचीत
राजनीति में पहले कदम से आज तक की अपनी राजनीतिक यात्रा का आत्म मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?
अपने राजनीतिक सफर का स्वमूल्यांकन मैं समाज के नजरिए से करता हूं, मेरा राजनीतिक दायरे का आधार मेरे आस-पास का समाज है जिसने मुझे समावेशी राजनीतिज्ञ बनने की प्रेरणा दी जिसमें न जातिगत भेदभाव है और न ही साम्प्रदायिक भेदभाव। ऐसी समावेशी राजनीति आज की जरूरत है। समाज व्यक्ति की क्षमताओं को आंकते हुए ही नेता बनाता है। नेता अपना कर्तव्य करते हुए स्वयं को लोकतंत्र में स्थापित करता है और व्यक्ति अपने संचित कार्यों से अपनी जीत की राह अग्रसर करता है। राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का विषय है। आप तभी सम्मान पा सकते हैं जब आपने समाज के लिए कुछ सकारात्मक किया हो। व्यक्ति के लिए टिकट लेना ही काफी नहीं है उसे अपनी काबिलियत को साबित भी करना होता है। मेरी राजनीतिक यात्रा इसी के इर्द-गिर्द रही।
कांग्रेस में आपका लम्बा सफर रहा। अब जाकर आपको कांग्रेस ने चुनावी लड़ाई में उतारा। क्या ये अवसर आपको पहले नहीं मिल जाना चाहिए था?
राजनीतिक परिस्थितियां होती हैं जो जरूरी नहीं हमेशा आपके अनुकूल ही हों। कभी सूखा तो कभी हरा ये प्रकृति से लेकर समाज और राजनीति की सच्चाई है। कुछ चीजें ऐसी हो जाती हैं भले ही वो आपको पसंद न हों। मैं पिछले 11 सालों को अपनी जिंदगी का एक सीखने का अनुभव मानता हूं क्योंकि मैंने 11 साल पहले टिकट की दावेदारी कांग्रेस से की थी। मेरे लिए बड़ा लंबा अनुभव है जो मेरी आगे की जिंदगी में जरूर काम आएगा।
आज जब कांग्रेस पार्टी ने आपको अपना प्रत्याशी हल्द्वानी नगर निगम के रूप में नामित किया है आप कैसा महसूस कर रहे हैं?
मैं बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूं। हमारे सम्मानित नेता, स्थानीय विधायक सुमित हृदयेश, गोविंद सिंह कुंजवाल, यशपाल आर्य, हरीश रावत, प्रकाश जोशी, प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा, दीपक बल्यूटिया सहित सभी प्रदेश, केंद्र का नेतृत्व, सभी का आभार और धन्यवाद जिन्होंने मुझ पर विश्वास जताया। सबने एकजुटता दिखाई। बिना विवाद प्रत्याशी चयन हो गया, ये मुझे सबसे अच्छा लगा।
आपको मेयर पद का प्रत्याशी कांग्रेस ने घोषित कर दिया है आप क्या-क्या चुनौतियां पाते हैं खासकर अपनी पार्टी के भीतर?
कांग्रेस पार्टी के अंदर कोई चुनौती नहीं है सब मिल जुल कर चुनाव लड़ा रहे हैं। मैं आपको बता दूं हमारी पार्टी के अंदर किसी भी प्रकार का कोई अंतर्विरोध नहीं है। पार्टी के बाहर की बात करूं तो इस वक्त भटकाव की राजनीति चल रही है। मेरा मानना है कि चुनाव मुद्दों पर लड़ा जाना चाहिए। आप अपना विजन तो सामने लाएंगे कि आपके पास जनता के लिए क्या है? हल्द्वानी के विकास का खाका क्या है आपके पास? लेकिन भाजपा और उसके प्रत्याशी के मुंह पर विभाजनकारी खून लग चुका है। उनका एजेंडा ही विभाजकारी है। वो मुद्दों की तो बात कर ही नहीं रहे। मैं ज्यादा इन बातों पर जाना ही नहीं चाहता। वो ये नहीं बताएंगे कि शहर कैसे अच्छा बनना चाहिए, वो ये नहीं बताएंगे कि बच्चों को रोजगार कैसे मिलेगा। शहर में जो जाम की स्थिति बन रहीं है उसके लिए उनके पास कोई विकल्प है सुझाने के लिए, शायद नहीं। मेयर के रूप में आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी आपकी क्या सोच है ये कहीं नहीं दिखता। वो अपनी प्राथमिकता बताएं कि चुनाव किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। मैं कहना नहीं चाहता था लेकिन भाजपा प्रत्याशी के सामने समस्या है वो उनका जनता से कनेक्ट शून्य है। अब उनके साथ समस्या है कि वो बातें क्या करें? हम आंदोलन से उठे नेता हैं हम जानते हैं कि जनता की क्या समस्याएं हैं। अब देखिए वो अपनी पार्टी के नगर निगम के पिछले दस सालों का जिक्र करने से बच रहे हैं। पहले तो गिनाने के लिए कुछ है नहीं अगर कुछ सकारात्मक होगा भी तो अपनी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के कारण कहने से बच रहे है।
हल्द्वानी के विकास के लिए आपके जहन में क्या कोई विस्तृत योजना है जिससे जनता जान सके कि आपके विकास का क्या मॉडल है?
मैं चाहता हूं कि सबसे पहले हल्द्वानी की सड़कें दुरस्त हों। विकास के नाम पर अराजकता नहीं होनी चाहिए। सड़क चौड़ीकरण के हम विरोधी नहीं हैं लेकिन प्रभावितों का पुनर्वास तो सुनिश्चित होनी ही चाहिए। एक वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था होनी चाहिए। आज हल्द्वानी की मुख्य सड़कों को जाम से बचाने के लिए बायपास सड़कों की जरूरत है। विकास की प्लानिंग दीर्घकालिक होनी चाहिए। रिंग रोड का मसला किसानों की जमीन खराब किए बिना सुलझाया जाना चाहिए। हल्द्वानी महानगर बन चुका है अब प्लानिंग उसी अनुरूप होनी चाहिए। कूड़ा निस्तारण के लिए 23 एकड़ जमीन ट्रंचिंग ग्राउंड के लिए चाहिए लेकिन आप 6 एकड़ में ट्रंचिंग ग्राउंड बनाकर वाहवाही लूट रहे हैं। 23 एकड़ की व्यवस्था क्यों नहीं कर पा रहे? दमुवाढंूगा का मुद्दा जिसे स्व. इंदिरा जी ने समाधान के करीब ला दिया था भाजपा ने उसे भी उलझा दिया। दमुवाढं़ूगा भी हमारी प्राथमिकताओं में है।
सड़क, बिजली और पानी ये तो मूलभूत समस्याएं हैं ही लेकिन कोई ऐसे विशेष कार्य जिसे आप कह सकें कि ये मेरी योजना है हल्द्वानी को एक मॉडल शहर बनाने के लिए?
हल्द्वानी में पोटेंशियल बहुत हैं लेकिन उसी के अनुरूप आपका नजरिया होना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय बस अड्डा अगर बन गया होता तो हल्द्वानी में जाम की समस्या 50 प्रतिशत खत्म हो जाती। भाजपा सरकार के आते ही वो ठंडे बस्ते में चली गई। अंतरराष्ट्रीय खेल परिसर में राष्ट्रीय खेलों की तैयारी है ये किसका विजन था- स्व. इंदिरा हृदयेश का। हमें उसी विजन की जरूरत है आज। ‘कोटा’ राजस्थान की तरह हल्द्वानी को ‘एजुकेशन हब’ बनाने का मेरा सपना है। उत्तराखण्ड की संस्कृति को धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए एक सांस्कृतिक केंद्र बनाने की जरूरत है। नगर निगम का अपना एक ऑडिटोरियम हो एक बड़ा पुस्तकालय हो ये मेरी प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
हल्द्वानी को नगर निगम का दर्जा मिले लगभग 11 वर्ष हो गए। इन वर्षों के कार्यकाल का आप किस रूप में मूल्यांकन करते हैं?
ये सवाल उनसे भी पूछा जाना चाहिए जो 10 वर्षों तक यहां सत्तासीन रहे एक दल के रूप में एक व्यक्ति के रूप में। ट्रिपल इंजन का ढिंढोरा पिटा गया। 10 सालों तक बस डुगडुगी ही बजाते रहे। 2300 करोड़ आने की बात कहते हैं लेकिन इनके पास 35 करोड़ रुपए नहीं हैं भुगतान के लिए। सिर्फ तमाशे की डुगडुगी बाजाकर ये जनता को भरमाना चाहते हैं अब तमाशे की डुगडुगी से कुछ हासिल तो हो नहीं सकता क्योंकि आपके पास अच्छा गिनाने के लिए तो कुछ है नहीं। इसलिए उनके लोग मरा हुआ प्रत्याशी जैसी उपमाओं का प्रयोग हमारे लिए कर रहे हैं। डॉ. जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला से हमारे वैचारिक मतभेद भले ही रहे हों लेकिन वो एक शालीन व्यक्ति हैं ‘सीजन्ड’ व्यक्ति हैं लेकिन ये जो नए लोग भाजपा के हैं वो तो ऐसी भाषा का प्रयोग कर शहर का क्या हाल करेंगे। वो ऐसी भाषा से चुनावी टैªक बदलने का असफल प्रयास कर रहे हैं। मेरे नजरिए से देखें तो ये दस साल बस ढ़पोर शंखी रहे।
क्या आपको नहीं लगता कि स्थानीय निकाय चुनावों में मुद्दा विकास के इर्द-गिर्द ही होना चाहिए?
स्थानीय निकाय ही क्यों सारे चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। हम भी चाहते हैं कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टियां पार्टी का सिम्बल जरूर देती हैं लेकिन ये आपसी सम्बंधों पर भी लड़े जाते हैं। आपका स्थानीय स्तर पर लोगों से रिश्ता कैसा रहा यहां पर आपकी परीक्षा होती है। मेरे चुनाव में दलीय प्रतिबद्धताएं तोड़ दी हैं लोग अपनी पार्टी के इतर मेरा समर्थन कर रहे हैं। चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल के क्यों न हों। इस बार नगर निगम चुनाव एक ऐसा नैरेटिव सैट कर रहे हैं जो भविष्य के लिए मिसाल होंगे। अब चुनावों में भाजपा ने स्व. मुलायम सिंह जी की भी एंट्री करवा दी है तो ये सवाल वो अपनी केंद्र सरकार से पूछे कि मुलायम सिंह जी को पद्म विभूषण किसने दिया।
नगर निगम का नया जुड़ा क्षेत्र आपके लिए कितनी चुनौती है। जिसे भाजपा अपना गढ़ बता रही है?
ये मनगढ़ंत और फैलाई गई बातें हैं। जब रेरा कानून को सख्ती से लागू करने की बात हुई तो वहां जरूरतमंद लोग अपनी जमीन बेच नहीं पा रहे थे। शादी-ब्याह, बीमारी के समय जो पैसे की जरूरत होती है उसके लिए भी लोग अपनी जमीन बेच नहीं पा रहे थे। लेकिन उस समय दो महीना लम्बा संघर्ष चला उसमें मैंने भी दिन रात संघर्ष किया था। सबने मिलकर उसका समाधान निकलवाया। मुझे नहीं लगता कि उस क्षेत्र के लोग मेरे संघर्ष को भुला देंगे।
सुंदर कांड, हनुमान चालीसा, मंदिर जाना ये आजकल आपके भी प्रचार का हिस्सा बन गए हैं। क्या ये भाजपा की रणनीति को ध्वस्त करने का हिस्सा है। कहीं ये कांग्रेस की घोषित नीति धर्मनिरपेक्षता से विचलन और साफ्ट हिंदुत्व की तरफ शिफ्ट होना तय नहीं हैं?
धर्मनिरपेक्षता किसी को अपने धर्म का पालन करने से रोकती नहीं है। धर्म निजी आस्था का विषय है। इसमें किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? अब ये भाजपा को पसंद नहीं आ रहा। ये उनकी समस्या है।
1995 के बाद गजराज सिंह बिष्ट और ललित जोशी फिर आमने -सामने हैं क्या राजनीतिक मायने हैं इसके?
1994-95 में अपने छात्र जीवन में आज तक मैं इस शहर की परिक्रमा ही करता रहा। मेरे साथ अच्छा-बुरा जो भी हुआ इसका साक्षी हल्द्वानी शहर रहा है। इतना लंबा समय मैंने जनता के साथ बिताया। ये आंकलन अब जनता को करना है कि कौन कितना समाज के बीच रहा। मैं अपनी बात करूंगा कि मैं शहर के लिए क्या करूंगा क्योंकि मैं जनता को दिगभ्रमित नहीं करना चाहता। साफ एवं स्वच्छ राजनीति मेरी पहचान रही है, कांग्रेस की पहचान रही है। हम सिर्फ यहां पर मेयर प्रत्याशी के विरोधी के रूप में हैं इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं देखता। स्थानीय निकाय ही क्यों सारे चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। हम भी चाहते हैं कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टियां पार्टी का सिम्बल जरूर देती हैं लेकिन ये आपसी सम्बंधों पर भी लड़े जाते हैं। आपका स्थानीय स्तर पर लोगों से रिश्ता कैसा रहा यहां पर आपकी परीक्षा होती है। मेरे चुनाव में दलीय प्रतिबद्धताएं तोड़ दी हैं, लोग अपनी पार्टी के इतर मेरा समर्थन कर रहे हैं। चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल के क्यों न हों। इस बार नगर निगम चुनाव एक ऐसा नैरेटिव सैट कर रहे हैं जो भविष्य के लिए मिसाल होंगे।

