मुंबई के एक गैरसरकारी संगठन ‘फ्री स्पीच कलेक्टिव’ ने कुछ समय पूर्व अपनी एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक है ‘बिहाइंड बार्स’ (सलाखों के पीछे। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 से 2020 तक भारत में 154 पत्रकारों को उनकी पत्रकारिता के चलते गिरफ्तार किया गया, पूछताछ की गई अथवा उनको कारण बताओ नोटिस दिया गया। इसी दौरान 9 विदेशी पत्रकारों को भारत निकाला भी दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक मामले 2020 में दर्ज किए गए, लगभग 40 प्रतिशत। निश्चित ही कानून सबके लिए समान होता है। यदि लोकतंत्र का चौथा हिस्सा कहे जाने वाले प्रेस अथवा मीडिया से जुड़े लोग स्थापित विधान से हट कर कुछ करते हैं तो उन पर भी वैसी ही कार्यवाही होनी चाहिए जैसी किसी अन्य अपराधी पर। लेकिन क्या कानून का पालन कराने के लिए गठित एजेंसियां पूरी निष्पक्षता और निष्ठा से अपना कार्य करती हैं? या फिर सत्ताधारी दल के इशारे पर उनको प्रताड़ित किया जाता है जिनके सुर, जिनकी लेखनी सत्ता को नहीं सुहाती है? आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी को हमसे छीन लिया गया था। क्या वर्तमान में भी ऐसा ही कुछ तो नहीं हो रहा? आतंकवाद के खिलाफ बने कठोर कानून ‘यूएपीए’ के तहत बीते कुछ समय से पत्रकारों की हो रही गिरफ्तारी कुछ ऐसा ही संकेत दे रही है। ‘बिहाइंड बार्स’ रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2020 तक 16 पत्रकारों पर ‘यूएपीए’ के तहत मुकदमे दर्ज किए गए। अब यह संख्या बढ़ चुकी है। बीते 3 अक्टूबर को ‘न्यूजक्लिक’ समाचार पोर्टल के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और उनके एक सहयोगी की गिरफ्तारी इस कानून के तहत किए जाने और इस समाचार पोर्टल से जुड़े 46 पत्रकारों संग पूछताछ के बाद अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाए जाने की आशंका बलवती हो चली है। यूएपीए के तहत अभी 7 पत्रकार जेल में हैं। इनमें 3 अक्टूबर को गिरफ्तार किए गए प्रबीर पुरकायस्थ के अलावा 2018 में गिरफ्तार ‘कश्मीर नैरेटर’ के रिपोर्टर आसिफ सुल्तान, ‘द कश्मीरवाला’ के संपादक फहद शाह (2022 से),‘द कश्मीरवाला’ के ट्रेनी पत्रकार सज्जाद गुल (2022 से), ‘वांडे’ के संपादक इरफान मेहराज (2023 से) शामिल हैं। इनके अलावा ‘न्यूजक्लिक’ के सलाहकार संपादक और लेखक गौतम नवलखा लंबे अर्से तक कैद में रहने के बाद से वर्तमान में नवंबर 2022 से अपने घर में नजरबंद हैं। आठ पत्रकार ऐसे हैं जो यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए और अब जमानत पर हैं।
सांची कहो तो मारन दौरत

मेरी बात
‘न्यूजक्लिक’ से जुड़े जिन पत्रकारों से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूछताछ की है उनमें वरिष्ठ और प्रतिष्ठत पत्रकार-संपादक उर्मिलेश, अभिसार शर्मा और भाषा सिंह शामिल हैं। इन तीनों को ही हिंदी का हर जागरूक पाठक जानता है, पढ़ता है और सुनता है। इसमें कोई शक नहीं कि इनके तेवर सत्ता विरोधी हैं। लेकिन सत्ता विरोधी होना कोई गुनाह नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता को आयना दिखाने का काम हमारा संविधान प्रदत्त अधिकार है। और यही हर सच्चे पत्रकार का पहला कर्तव्य भी है। ‘द वायर’ समाचार पोर्टल के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन.पी. लोकुर का मानना है कि ‘हालांकि पत्रकार यूएपीए के दायरे से बाहर नहीं, लेकिन इस मामले में कानून लागू करने के लिए कोई प्रमाण नहीं हैं। सार्वजनिक डोमेन में जो भी उपलब्ध है, उससे ऐसा लगता है कि ‘यूएपीए’ के तहत केस बनाने के लिए कोई सबूत नहीं हैं।’ स्मरण रहे न्यायमूर्ति मदन पी. लोकुर उन चार न्यायधीशों में शामिल थे जिन्होंने 2017 में अप्रत्याक्षित कदम उठाते हुए एक प्रेस कांफ्रेंस बुला यह कह डाला था कि ‘लोकतंत्र खतरे में है।’ 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में अपने अंतिम भाषण में डॉ .भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आड़ में संविधान का दुरुपयोग होने की आशंका व्यक्त करते हुए कहा था- ‘…however good a Constitution may be, it is sure to turn out bad because those who are called to work it, happen to be a bad lot. However bad a Constitution may be, it may turn out to be good if those who are called to work it, happens to be a good lot…The Constitution can provide only the organs of State such as the legislature, the Executive and the Judiciary. The factors on which the working of those organs of the State depends are the people and the political parties they will set up as their instruments to carry out their wishes and their politics’ (कोई भी संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसका खराब होना निश्चित है क्योंकि जिन लोगों को इसे लागू करने की जिम्मेदारी होती है वे बुरे लोग होते हैं। कोई संविधान चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो, वह तब अच्छा साबित हो सकता है जब उसे लागू करने वाले अच्छे लोग हों… संविधान केवल राज्य के अंगों जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ही उपलब्ध करा सकती है। इन अंगों का कामकाज जनता पर और जनता द्वारा स्थापित किए गए राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है जिन्हें जनता अपनी इच्छाओं की पूर्ति और अपनी राजनीति के लिए स्थापित करती है।) स्पष्ट है कि डॉ. अंबेडकर को आशंका थी कि आजाद भारत में संविधान का दुरुपयोग हो सकता है। 1975 में आपातकाल के दौरान अंबेडकर की आशंकाएं सत्य साबित हुईं। इंदिरा गांधी को उस दौर में लगने लगा था कि देश केवल उन्हीं के हाथों में सुरक्षित रह सकता है। इंदिरा गांधी की जीवनीकार कैथरीन फ्रैंक के अनुसार-‘न तो वे लोकतांत्रिक मूल्यों को समझ पाईं और न ही उन्हें ऐसे मूल्यों पर विश्वास था, उनका यह मत मजबूत होता चला गया कि भारत उनके बगैर जीवित न तो रह सकता है और न ही रह पाएगा।’ गौर कीजिए क्या आज का समय भी ठीक ऐसा ही नहीं है? और आज के हमारे रहनुमा भी इस तर्ज पर नहीं सोच रहे कि देश केवल और केवल उनके हाथों में सुरक्षित है और उनके खिलाफ उठने वाली हर आवाज देश द्रोही है?
हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि, आलोचक और शिक्षाविद् अशोक वाजपेयी ने इस बाबत ‘द वायर’ पत्रिका में लिखा है जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूं। वे लिखते हैं- ‘सांची कहो तो मारन दौरत’। यह उक्ति कबीर की है- आज से लगभग छह सौ साल पहले की। पर हाल ही में कुछ स्वतंत्रचेता पत्रकारों पर सत्ता लगातार सच बोलने के लिए सचमुच मारने दौड़ी। सच हर समय में बोलना या उस पर आचरण करना जोखिम का काम है। प्रायः हर व्यवस्था में यह जोखिम का काम रहा है। लोकतंत्र में भी।
हम अपने लोकतंत्र के जिस चरण में हैं उसमें लगभग स्थाई भाव झूठ, घृणा और हिंसा हो गए हैं। टेक्नोलॉजी के नए विकास और विस्तार ने यह संभव और आसान कर दिया है कि झूठ, घृणा और हिंसा बहुत तेजी से फैल सकती, फैलाई जा सकती है। हम लगभग एक दशक से ऐसा होते हर सप्ताह लगभग चौबीस घंटे देख रहे हैं। हमारे मीडिया का एक बड़ा साधन-संपन्न हिस्सा बहुत मुखर- सक्रिय होकर इस फैलाव में शामिल है। ऐसी विकट परिस्थिति, इस बेहद अभागे समय में, शुक्र है कि कुछ पत्रकार, बहुत थोड़े साधनों के सहारे, सच हमारे सामने लाने का दुस्साहस कर रहे हैं। हो सकता है कि कभी- कभार वे थोड़ा बहक भी जाते हों। पर कुल मिलाकर इन दिनों सच्चाई जानने, सत्ता को ठोस मुद्दों पर, प्रामाणिक साक्ष्य के आधार पर, प्रश्नाकित करने का मुख्य माध्यम यही पत्रकारिता है। नागरिक के रूप में हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए। वे इस प्रश्नांकन द्वारा लोकतंत्र को सत्यापित कर रहे हैं।
उन पर सत्ता की कोपदृष्टि होना अस्वाभाविक नहीं है। पर पिछले दिनों चालीस से अधिक पत्रकारों के साथ जो हुआ वह किसी भी समाज और लोकतंत्र में शर्मनाक है। अपने से असहमत को देश द्रोही या राष्ट्रविरोधी करार देने की चाल पिछले कुछ बरसों में बहुत व्यापक हुई है। उसका एक नया विस्तार यह है कि इस बार कुछ पत्रकारों पर शायद आतंकवादी होने का आरोप भी लगाया जा रहा है। यह भी कयास हैं कि यह सभी को सबक सिखाने के लिए है कि वे दुस्साहस न करें। चूंकि मामले में तहकीकात चल रही है, आरोपों के गुण-दोष पर इस मुकाम पर कुछ कहना परिपक्व होगा। फिर भी, हम इस एहसास से बच नहीं सकते कि पत्रकारों की अभिव्यक्ति सिर्फ एक समूह के अधिकार का मामला भर नहीं है। उसकी व्याप्ति सारे नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वततंत्रता तक है। हम सभी नागरिकों को असीमित स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति या अन्य तरह की, नहीं मिली हुई है। अनेक कानूनी, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक मर्यादाओं का हमें पालन करना होगा। उनके रहते और उनकी सीमा में हमें जो स्वतंत्रता मिली हुई है उसका हमें मौलिक अधिकार है और अगर उसमें कटौती या उसका हनन होता है तो हमारे लिए। हम सभी के लिए यह चेतावनी है। यह तो बार-बार स्पष्ट होता रहता है कि हमारी ऐसी स्वतंत्रता की रक्षा अंततः नागरिकों को ही करना होगी। नागरिक अंतः करण को ही सजग और सक्रिय रहना है। संविधान को, अपनी उजली समावेशी परंपरा को, प्रश्नवाचकता की लंबी विरासत को नागरिक ही बचाएंगे, कोई और नहीं। वे ‘मारन दौरत’ हैं तो क्या हम सच जानने, प्रश्न पूछने के अपने थोड़े से भी अवसर गंवा देंगे?’
मैं पुनः दोहरता हूं कि देश के संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं फिर चाहे वह पत्रकार हों या फिर कोई अन्य, सभी पर विधिसम्मत कार्यवाही की जानी चाहिए, यदि उन्होंने कुछ गलत किया हो तो। लेकिन सत्ता के नशे में चूर हो यदि हर आलोचना का गला घोटा जाने लगे तो आम नागरिक को जागना होगा। धर्म, जाति, क्षेत्रवाद इत्यादि के मकड़जाल से ऊपर उठ सोचना होगा कि जिनके हाथों में सत्ता की कुंजी सौंपी है वे देश की गाड़ी को सही दिशा में, सही मार्ग पर चलाकर आगे बढ़ा रहे हैं या फिर जिन बुनियादी सिद्धांतों पर यह देश अब तक टिका हुआ है उनके साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। लोक के हाथों में ही लोकतंत्र को जिंदा रखने की जिम्मेवारी भी होती है, ताकत भी।
