महाराष्ट्र में 2024 का साल काफी अहम है। साल की शुरुआत में आम चुनाव है तो साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होंगे। शरद पवार अभी अपने गुट के साथ महाविकास आघाड़ी में हैं। महाराष्ट्र में एमवीए को उन्हीं ने बनाया था, लेकिन भतीजे अजित पवार की बगावत के बाद शरद पवार काफी कमजोर पड़ गए हैं। चुनाव आयोग के फैसले के साथ राजनीतिक हल्कों में चर्चा हो रही है कि क्या शरद पवार घर वापसी जैसा बड़ा निर्णय ले सकते हैं। गौरतलब है कि पवार कांग्रेस से जरूर अलग हुए थे, लेकिन उनकी अगुवाई वाली एनसीपी शुरुआत से यूपीए का हिस्सा रही है। पिछले साल मार्च तक एनसीपी अविभावजित थी तब पार्टी की ओर से शरद पवार का नाम यूपीए चीफ के तौर पर तब आगे भी किया गया था। एनसीपी की युवा शाखा ने इस संबंध में तब एक प्रस्ताव भी पास किया था।

अजीत पवार की बगावत के बाद कमजोर हुए शरद पवार की घर वापसी के पीछे महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य का हवाला दिया जा रहा है। दलील दी जा रही है कि नई पार्टी और नए चुनाव चिन्ह के साथ लोकसभा चुनाव में उतरना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। ऐसे में जब अगले महीने के मध्य में आम चुनाव की घोषणा की उम्मीद की जा रही है तो यह भी चर्चा है कि महाराष्ट्र में चुनाव शुरुआती चरणों में हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या घर वापसी का फैसला शरद पवार ले सकते हैं। पिछले कुछ महीनों पर नजर डालें तो महाविकास अघाड़ी में शरद पवार के कमजोर पड़ने के बाद भी कांग्रेस की तरफ से उन्हें पूरा सम्मान दिया गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संग गत् दिनों पवार की मुलाकात में यह संदेश निकलकर आया है कि पवार कांग्रेस में वापसी की राह तलाश रहे हैं। राजनीतिक हलकों में पवार की घर वापसी की कयासबाजी पर समर्थकों ने बधाई देने का सिलसिला भी शुरू कर दिया है। चर्चा यहां तक हो रही हैं कि पवार लोकसभा चुनाव से पहले या विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ा फैसला ले सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र की सियासत शरद पवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। वो सत्ता में हों या न हों, लेकिन सूबे की राजनीति में शरद पवार ‘फैक्टर’ सबसे अहम रहा है। वे महाराष्ट्र की राजनीति को अपने तरीके से चलाते रहे, लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि शरद पवार सियासी तौर पर अब असहाय नजर आ रहे हैं। भतीजे अजित पवार ने ऐसा सियासी दांव चला कि चाचा शरद पवार चारो खाने चित्त हो गए। उनके हाथों से पार्टी छिन गई, नेता भी साथ छोड़ गए। ऐसे में शरद पवार के लिए नई पार्टी बनाकर दोबारा से उसे खड़ा करना आसान नहीं होगा।

शरद ने 24 साल पहले कांग्रेस से अलग होकर जब एनसीपी का गठन किया था तब वो युवा अवस्था में थे, जिसके चलते वो मशक्कत कर अपने पार्टी को महाराष्ट्र में स्थापित करने में कामयाब रहे। लेकिन वे अब उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां न पहले की तरह मेहनत कर सकते हैं और न ही उस तरह की लोकप्रियता बची है। दूसरा शरद के सामने बेटी सुप्रिया सुले को अपने सियासी वारिस के तौर पर स्थापित करने की चुनौती खड़ी हो गई है। अब उनके लिए नई पार्टी बनाकर दोबारा से उसे खड़ा करना बड़ी चुनौती होगी। हालांकि एनसीपी शरद पवार गुट और कांग्रेस इन अटकलों का खंडन कर रहे हैं। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने कहा है कि कांग्रेस में विलय की खबरें निराधार हैं, हम सिंबल के लिए कोर्ट जाएंगे। वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने भी इस बात का खंडन किया। उन्होंने कहा कि एनसीपी और कांग्रेस के विलय की खबरें सिर्फ अफवाह हैं। हमने आगामी रणनीति को लेकर हाल ही में शरद पवार से मुलाकात की थी। महाराष्ट्र के कांग्रेस प्रभारी रमेश चौन्निथला खुद शरद पवार से मिले और हम सबने महा विकास आघाड़ी के रूप में ही मजबूती से चुनाव लड़ने का संकल्प लिया है।

शरद पवार के पोते रोहित पवार ने भी इस तरह की खबरों को निराधार बताया है। रोहित पवार का कहना है कि ‘इस तरह की खबरें बीजेपी की तरफ से प्लांट की जा रही हैं। महा विकास अघाड़ी को राज्य में मिल रहे जबरदस्त जन समर्थन के कारण बीजेपी में घबराहट है। वह लगातार इस तरह की योजना बनाने की कोशिश कर रही है कि महा विकास अघाड़ी कमजोर हो रही है लेकिन बीजेपी जितनी ज्यादा ऐसी कोशिशें कर रही है, महा विकास अघाड़ी महाराष्ट्र में उतनी ही ज्यादा मजबूत हो रही है। रोहित का यह भी कहना है कि राज्य की 48 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार जीतने के लिए बीजेपी के पास ताकतवर उम्मीदवार हैं ही नहीं। इसलिए बीजेपी लगातार यह कोशिश कर रही है कि दूसरी पार्टियों के जो मजबूत जनसंपर्क वाले नेता हैं, उन्हें तोड़ा जाए। शरद पवार गुट के कांग्रेस में विलय की खबर उड़ाने का बीजेपी का एक ही मकसद है कि वह लोगों में भ्रम पैदा कर सके।

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