उत्तराखण्ड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के घेरलु कर्मचारी की अचानक हुई मौत से राज्य में कोरोना के ईलाज को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। साथ ही कोरोना के ईलाज में भेदभाव किए जाने पर भी आंशका जताई जाने लगी है।
गौरतलब है कि पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और उनके परिजनों के साथ ही कई लोगों में कोरोना का संक्रमण पाया गया था। जिनमें सतपाल महाराज के आवास में काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल थे। स्वयं सतपाल महाराज भी कोरोना पॉजीटिव पाए गए थे जिसके चलते उनके परिजनों का एम्स ऋषिकेश में उपचार किया गया। उपचार के बाद सभी को होम क्वारंटीन में भेज दिया गया। इसी कड़ी में सतपाल महाराज की नर्सरी में काम करने वाले 76 वर्षीय रतन बहादुर भी कोरोना पॉजीटिव पाया गया था। रतन बहादुर को दून अस्पताल में 31 मई को कोरोना के ईलाज के लिए भर्ती किया गया था।
10 जून को रतन बहादुर को स्वस्थ घोषित करके अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया था तब से रतन बहादुर सतपाल महाराज की नेहरूग्राम स्थित पुष्प विटका नर्सरी में अपने आवास में ही था। 15 जून को रतन बहादुर खाना खाकर सो गया लेकिन अगले दिन वह अपने विस्तर पर मृत पाया गया।
सतपाल महाराज और उनकी धर्मपत्नी अमृता रावत का उपचार ऋषिकेश एम्स में चल रहा था। 16 जून को एम्स से उनको डिस्चार्ज कर दिया गया और उनको 14 दिनों तक होम क्वारंटीन में रहने की सलाह दी गई है। सतपाल महाराज औेर उनकी पत्नी का 17 दिनों तक एम्स में उपचार चला। जबकि उनके कर्मचारी रतन बहादुर को 31 मई को दून अस्पताल में भर्ती किया गया और दस दिन में ही उनको स्वस्थ घोषित करके डिस्चार्ज कर दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि सतपाल महाराज को ठीक 17 दिनों के बाद एम्स से छुट्टी दी गई और ठीक 17 दिनों के बाद उनके कर्मचारी रतन बहादुर की मौत हो गई।
इसी को देखते हुए अब राज्य के स्वास्थ्य विभाग और कोरोना के उपचार पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं। पहला सवाल यह है कि कोरोना जैसी महामारी जब किसी तरह का भेदभाव नहीं कर रही है तो कोरोना के मरीजों के उपचार से भेदभाव किया जाना अपने आप में ही एक गंभीर बात है। जिस तरह से सतपाल महाराज के परिजनों का उपचार बेहतर तरीके से एम्स में किया गया लेकिन उनके कर्मचारी का उपचार दूर अस्पताल में ही किया गया।
इसके अलावा उन दिनों जिस तरह से रतन बहादुर को कोरोना से स्वस्थ बताकर डिस्चार्ज कर दिया गया और डिस्चार्ज के छह दिनों के भीतर ही उसकी अचानक मौत होने से कई सवाल खड़े होना लाजिमी है। माना जा रहा है कि कर्मचारी एक सामान्य व्यक्ति था जिसके चलते उसका दून अस्पताल में ही ईलाज किया गया, जबकि सतपाल महाराज के साथ उनके परिजनों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाए दी गई। अगर सतपाल महाराज चाहते तो रतन बहादुर को भी एम्स में बेहतर उपचार दिया जा सकता था।
इस मौत से अब कई तरह की आशंका जताई जाने लगी है। जिस तरह से प्रदेश में कोरोना से संक्रमित लोगों की मौतें हो रही है और मौतों का आंकड़ा अब 19 तक जा पहुंचा है इससे राज्य में कोरोना के उपचार को लेकर कई तरह की आशंका जाताई जाने लगी है। हालांकि रतन बहादुर के मोत पर अभी साफ नहीं हुआ है कि मौत का कराण कोरोना का संक्रमण रहा है या स्वभाविक मौत का मामला है। यह तो जांच के बाद ही सामने आएगा लेकिन पूरे मामले से कम से कम राज्य के स्वास्थ्य विभाग और उसके उपचार के तरीके पर सवाल तो खड़ा हो ही गया है। जिससे अब डर का माहौल बन रहा है।

