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जानिए,वेब सीरीज ‘तांडव’ को क्यों देखना चाहिए और क्यों नहीं ?

ओटीटी प्लेटफार्म अमेजन प्राइम वीडियो पर 16 जनवरी को रिलीज़ हुई वेब सीरीज ‘तांडव’ शुरुआत से ही विवादों में छायी हुई है।  गौरव सोलंकी द्वारा लिखित इस वेब सीरीज को देखने के बाद इससे संबंधित सभी विवादों की तह को समझा जा सकता है। यह बात अलग है कि जो आरोप तांडव वेब सीरीज को लेकर लगाए जा रहे हैं उनमें कितनी सच्चाई है इसको लेकर सभी की अपनी-अपनी राय हो सकती है।

गौरव सोलंकी ने वेब सीरीज को चर्चित करने के सभी मसाले इसमें प्रयोग किये हैं

लेकिन इतना तो तय है कि लेखक गौरव सोलंकी ने वेब सीरीज को विवादित या कहें चर्चित करने के सभी मसाले इसमें प्रयोग किये हैं। चाहे वह एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर हो या एक ही औरत का  कई पुरुषों के साथ जिस्मानी सम्बन्ध हो। तांडव में कुछ एपिसोड तो इस पर ही बेस्ड है कि कैसे पुरुषवादी मानसिकता की चादर ओढ़ कर स्त्री के जिस्म का इस्तेमाल किया जाता है।

हां, एक और ट्रेंड है जो किसी भी फिल्म या वेब सीरीज को हिट कराने का ज़बरदस्त फार्मूला माना जाता है। वह यह कि किसी धर्म के देवी-देवता को लेकर एक ऐसा सीन लिखना जिसे विवादित लेखनी का एक प्रयोग माना जा सके उसे जोड़ना।

किसान आंदोलन को जोड़कर इस वेब सीरीज को वर्तमान समय की राजनीतिक हलचल से भी जोड़ा गया है हालाँकि कैसे बड़े-बड़े आंदोलनों को सत्ता की कुर्सी के लिए आहुति में डाल दिया जाता है यह भी इस वेब सीरीज का एक हिस्सा है।

सेक्स,लव,धोखा और देवी-देवता

सेक्स,लव,धोखा और देवी-देवता ,यह सब इस वेब सीरीज का बेस नजर आते हैं क्योंकि ‘तांडव’ में असल में राजनीति पर तांडव दिखाते-दिखाते लेखक ने यह पूरा ध्यान दिया है कि राजनीति में जो पॉपुलर हिट फार्मूला है वह कहीं छूट न जाए।  इसीलिए अभिनेता अनूप सोनी को एक ऐसा करैक्टर दिया गया है जो सिर्फ अनुसूचित जाति का होने की वजह से प्रधानमंत्री के कैबिनेट में शामिल होता है। उस पर ‘चमार’ शब्द का प्रयोग कर उसे नीचा दिखाने की कोशिश भी की जाती है। यही वह दांव है कि देश की राष्ट्रीय पार्टी बसपा की मुखिया मायावती भी इस विरोध के तांडव में योगदान देने उतर गयीं।

 

खैर,उपर्युक्त सभी ऐंगल्स पर अधिकता के साथ स्क्रिप्ट पर कलम चलायी गयी है। हालाँकि अभिव्यक्ति की आज़ादी में निहित मीडिया के इस रूप में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इससे किसी की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचें। लेकिन यह भारत है अश्लील भोजपुरी गानों को सुनकर कोई आहत नहीं होता , न ही उसपर लखनऊ के हजरतगंज थाने में कोई एफआईआर दर्ज कराई जाती है। लेकिन अगर कुछ व्यंग जिसके मायने  ठीक से समझे बिना सिर्फ यह देखकर कि इसमें देवी-देवता के नाम जुड़े हैं ,प्रदर्शन करना यहां आम बात है।

ग्रामीण इलाकों हो रहे रामलीलाओं में भद्दे कपड़े पहन अश्लील गानों पर जब शिव-गौरी या राधा-कृष्ण बने लोगों का अजीबो-गरीब नाच होता है तब क्यों ऐसे विरोध नहीं दर्ज कराये जाते ?

सैफ अली ख़ान ने नेता समर सिंह का अभिनय बखूबी निभाया है। आज़ादी,आज़ादी से गूंजता कुछ-कुछ जेएनयू(जवाहर लाल नेहरू) से मिलता-जुलता वीएनयू (विवेकानदं विश्वविद्यालय) को भी दिखाया गया है। अभिनेता जीशान अयूब का किरदार युवा नेता कन्हैया कुमार से प्रेरित नजर आता है।

सुनील ग्रोवर ने अपने अभिनय से किया आकर्षित

तिग्मांशु धुलिया ,डिंपल कपाडिया के मुख्य किरदारों के बीच  गौहर खान ,सुनील ग्रोवर और  कृति ने अपने अभिनय से जरूर आकर्षित किया। तांडव के संगीत की बात करें तो ए.आर. रहमान ने फिल्म युवा का ट्रैक ‘ओ युवा युवा….’ को रिवाइज्ड कर उसे पुनः युवाओं का पसंदीदा गीत बनाया है।
डायलॉग की बात करें तो वहां भी लेखक ने भारत की राजनीति के चर्चित किस्सों को ही उकेरा है। मसलन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ,चाणक्य और चन्द्रगुप्त आदि।

कुल मिलकर तांडव ने जनता के बीच आकर हर जगह तांडव ही मचा दिया है। भले ही निर्देशक और लेखक को क़ानूनी दांव पेंचों का सामना करना पड़  रहा है लेकिन वेब सीरीज की सफलता का श्रेय भी इन्हें ही जाता है।

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