लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को आम चुनाव 2024 का सेमीफाइनल माना जा रहा है। 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बुरी तरह हार मिली थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में उसने पूरी तरह स्वीप कर लिया था। माना जा रहा है कि इस बार भी भाजपा को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलनी तय है। राजस्थान में उसकी स्थिति सत्तारूढ़ कांग्रेस से बेहतर बताई जा रही है। मिजोरम और तेलंगाना में भाजपा की वनिस्पत कांग्रेस का पलड़ा भारी रहने के संकेत हैं

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा के साथ ही सबसे अहम सियासी मौसम का आगाज हो गया है। इन चुनावों के खत्म होते ही आम चुनाव 2024 की भी बिसात बिछ जानी है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल इन चुनावों को लोकसभा चुनावों का रिहर्सल मानकर तैयारी में जुट गई है। ये विधानसभा चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं जब पूरे देश में जातिगत सर्वे की मांग ने जोर पकड़ी हुई है। राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने बिहार की तर्ज पर जातिगत सर्वे का आदेश जारी किया है। मध्य प्रदेश में वह इसका वादा कर चुकी है। बीजेपी इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर समाज को बांटने का आरोप लगाकर लोगों के बीच में है। इस चुनाव के नतीजे जातिगत सर्वे पर जनमत संग्रह जैसे माने जाएंगे। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को आम चुनाव 2024 का सेमीफाइनल माना जा रहा है। 2018 में बीजेपी को इन चुनावों में बुरी तरह हार मिली थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में उसने पूरी तरह स्वीप कर लिया था।

विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी
विपक्षी गठबंधन (इंडिया) में कांग्रेस की हिस्सेदारी और भूमिका कितनी होगी ये भी पांच राज्यों के चुनाव परिणाम तय करेंगे। अगर चुनाव में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस और राहुल गांधी की हैसियत मजबूत होगी। वे अपने हिसाब से चीजें तय कर सकेंगे। अगर कांग्रेस कमजोर रही तो सीट शेयरिंग के मामले में समझौता करना होगा।

दिग्गजों की अग्नि परीक्षा
विधानसभा चुनाव के नतीजे राजनीतिक दलों के अलावा कई दिग्गजों के लिए भी चुनौती से कम नहीं होंगे। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी ने कह दिया है कि वह सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। राजस्थान में कांग्रेस के अशोक गहलोत और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव के लिए भी यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को भी राज्य में निर्विवाद नेता के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए हर हाल में जीतना होगा।

बीजेपी की दुविधा
इस चुनाव में बीजेपी की राज्यों में दुविधा की भी परीक्षा होगी। पिछले कुछ चुनावों से उसकी स्थिति राज्यों में कमजोर हुई है। माना गया कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की स्थिति तो मजबूत है लेकिन राज्यों में पार्टी को कड़ी चुनौती मिल रही है। कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में यही ट्रेंड देखा गया। केंद्र सरकार में मजबूती के लिए राज्यों पर भी मजबूत पकड़ होना जरूरी माना जाता है।

मुफ्त की राजनीति
ये चुनाव मुफ्त की राजनीति की दिशा तय करने के लिए भी अहम माने जा रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से मुफ्त की रेवड़ी की राजनीति पर खूब बहस हुई। जिसे पीएम मोदी ने इसे एक
राजनीतिक मुद्दा बनाकर इस्तेमाल किया। चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने वोटरों से कई लुभावने वादे किए हैं। बीजेपी ने भले इसका विरोध किया लेकिन राज्य स्तर पर जहां उसकी सरकार रही, वहां इस होड़ में बीजेपी भी शामिल हुई। अगर इन वादों का असर वोटिंग पर दिखा तो अगले चुनाव में इसका ट्रेंड और बढ़ेगा।

नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति
नॉर्थ-ईस्ट के मिजोरम में भी चुनाव होना है। माना जाता है कि दिल्ली का मूड नॉर्थ-ईस्ट भी दिखाता है। इसके अलावा मिजोरम में ऐसे समय में चुनाव हो रहा है, जब मणिपुर में हालात पिछले कुछ महीनों से खराब हैं। इसे मणिपुर के हालात से भी जोड़कर देखा जाएगा।

मोदी फैक्टर रहेगा अहम
बीजेपी ने साफ संकेत दिया है कि विधानसभा चुनावों में वह पीएम मोदी और केंद्र सरकार के कामकाज के साथ उतरेगी। इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश में मौजूदा सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेसी को कम करना और जिन राज्यों में विपक्ष में है वहां गुटबाजी को रोकना है। पीएम वन मैन आर्मी की तरह मैदान में उतरेंगे। सभी राज्यों को मिलाकर वह 60 से अधिक रैलियां करेंगे। जैसा परिणाम आएगा ब्रैंड मोदी भी उसी अनुरूप में 2024 से पहले आगे बढ़ेगा।

महिला वोटरों की हिस्सेदारी
हाल के दिनों में चुनाव में महिला वोटिंग एक्स फैक्टर साबित हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी संख्या और भी बढ़ी। उन्हें लुभाने के लिए सभी दलों ने पिछले कुछ चुनावों से पूरी ताकत लगा दी है। बीजेपी महिला आरक्षण को बड़ा मुद्दा बना सकती है। वहीं कांग्रेस ने इनके लिए कई मुफ्त की योजनाओं का वादा किया है।

तेलंगाना का संदेश
तेलंगाना का चुनाव भी इस बार राष्ट्रीय संदेश देगा। क्या कांग्रेस वहां उभर सकती है? क्या राव जीत की हैट्रिक लगाएंगे? क्या बीजेपी दक्षिण में अपने प्रसार को तेलंगाना से आगे बढ़ाएगा? इन सवालों का जवाब इसके परिणाम से मिलेगा। ओवैसी फैक्टर का भी असर पड़ेगा।

राजस्थान विधानसभा चुनाव की तारीख में बदलाव
दो दिन पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनावों की घोषणा की। ये चुनाव अलग-अलग चरणों में होंगे। मिजोरम में 13 अक्टूबर से चुनाव प्रक्रिया शुरू होगी। पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती 3 दिसंबर को होगी।

मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए 7 नवंबर को मतदान
होगा। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराई जाएगी। पहले चरण का मतदान 7 नवंबर को होगा और दूसरे चरण का मतदान 17 नवंबर को होगा। इस बीच चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि मध्य प्रदेश में 17 नवंबर, राजस्थान में 23 नवंबर और तेलंगाना में 30 नवंबर को मतदान होगा। हालांकि चुनाव आयोग ने राजस्थान विधानसभा के लिए मतदान की तारीख में बदलाव कर दिया है। पूर्व घोषणा के मुताबिक राजस्थान में 23 नवंबर को मतदान होना था। हालांकि अब 25 नवंबर को वोटिंग होगी। आयोग द्वारा अन्य तिथियों को बरकरार रखा गया है।

क्यों बदली गई तारीख?
यह बात सामने आई है कि मतदान की तारीख दो दिन आगे बढ़ाने की वजह राजस्थान में त्योहार और शादी का सीजन है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदान की तारीख बदलने का निर्णय विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से प्राप्त अनुरोधों के आधार पर किया गया था। आयोग ने बताया, ‘इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि 23 नवंबर को बड़ी संख्या में नागरिक समारोहों और शादियों में मतदाता व्यस्त रहेंगे, जिससे चुनाव प्रभावित हो सकते हैं, चुनाव को दो दिनों के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया गया है।’
लोकसभा सांसद पी. पी चौधरी ने इस संबंध में चुनाव आयोग को एक अनुरोध प्रस्तुत किया था।

चौधरी ने कहा, ‘23 नवंबर को ही देवउठनी एकादशी है। यह दिन राजस्थान के नागरिकों के लिए महत्व रखता है। इस दौरान कई धार्मिक कार्य किए जाते हैं। कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, करोड़ों नागरिक मानसरोवर जाते हैं और पवित्र स्नान करते हैं। राजस्थान में इसे आबूज सेव भी कहा जाता है। इस संबंध में हमें नागरिकों से बड़ी संख्या में पत्र प्राप्त हुए तदनुसार, हमने आयोग से मांग की है।’ इस दौरान चौधरी ने यह भी बताया कि उस दिन राज्य में 50 हजार से ज्यादा विवाह समारोह आयोजित होने हैं। ‘विवाह स्थल पर बड़ी संख्या में रिश्तेदार इकट्ठा होते हैं। इसके अलावा कई कर्मचारी विवाह सेवाएं प्रदान करने में व्यस्त हैं। लोग शादियों के लिए अपने स्थानों से बहुत दूर जाते हैं तो इससे मतदान दर प्रभावित हो सकती है।’

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