भारत के अस्पताल और डॉक्टर गुणवत्तायुक्त इलाज मुहैया कराने के लिए विदेशों में भी प्रसिद्धि हासिल कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद भारत में अब भी स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं मौजूद हैं। हाल ही में जारी रियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट में भारत की स्थिति को बेहद निराशाजनक रेखांकित की गई है। कोरोनाकाल के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति देखते हुए कई सरकारी वायदे किए गए थे कि सब दुरुस्त किया जाएगा। बावजूद इसके भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र फिर उसी रूप में हमारे सामने है। मेडिकल टूरिज्म में आगे होने के बाद भी भारत अपने ही देश के नागरिकों को अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में असक्षम नजर आ रहा है
अंग्रेजी में एक कहावत है ‘हेल्थ इज वेल्थ’ यानी हमारा असली धन हमारा बेहतर स्वास्थ्य है। कहावत से हटकर बात की जाए तो सबसे महत्वपूर्ण हर इंसान का स्वास्थ्य ही होता है जो स्वस्थ है मान लीजिए कि वही धनवान भी है। आज के दौर में तो अच्छा स्वास्थ्य होना एक विशेषाधिकार की तरह हो गया है। लाखों लोग इलाज की कमी, खराब स्वास्थ्य व्यवस्था, महंगे इलाज जैसे कई कारणों के चलते अपनों को खो बैठते हैं। जिन्हें किसी भी कीमत पर वापस पाना असंभव है। इसलिए स्वास्थ्य से कीमती कुछ भी नहीं है।
हाल ही में जारी रियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक और अमेरिकी साझेदार बरकाडिया की रिपोर्ट में भारत की स्थिति को बेहद निराशाजनक रेखांकित किया गया है। कोरोनाकाल के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति देखते हुए कई सरकारी वादें किए गए थे कि सब दुरुस्त किया जाएगा। बावजूद इसके भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र फिर उसी रूप में हमारे सामने हैं। मेडिकल टूरिज्म में आगे होने के बाद भी भारत अपने ही देश के नागरिकों को अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में असक्षम नजर आ रहा है।
नाइट फ्रैंक और बरकाडिया द्वारा जारी ग्लोबल हेल्थकेयर रिपोर्ट के अनुसार, निजी और सार्वजनिक दोनों सुविधाओं सहित भारत में प्रति हजार जनसंख्या पर 1 बिस्तर है। जबकि यूनाइटेड नेशन के अनुसार, यह प्रति हजार पर 3 होना चाहिए। भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार 2 ़4 मिलियन बिस्तरों की कमी है।
ग्लोबल हेल्थकेयर रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्तमान में अपनी 1.42 बिलियन की आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए 2 बिलियन वर्ग फुट स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र की कमी का सामना कर रहा है। यह कमी भारत के स्वास्थ्य सेवा बाजार की बढ़ती मांग और वृद्धि को देखते हुए चिंताजनक है। इस कमी को दूर करने और स्वास्थ्य देखभाल पहुंच में सुधार करने के लिए भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल नीति का लक्ष्य सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाना है। स्वास्थ्य सेवा के लिए बजटीय आवंटन वित्त वर्ष 2014 में सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2023 में 2.1 प्रतिशत हो गया है।
विश्व बैंक के अनुसार, भारत की जनसंख्या चीन (1.41 बिलियन) से अधिक हो चुकी है। हालांकि भारत की जनसंख्या (1.42 बिलियन) आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं है क्योंकि केंद्र ने अभी तक 2021 के लिए निर्धारित जनगणना अभ्यास शुरू नहीं किया है। बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में स्वास्थ सेवाओं का विस्तार किया जाना बेहद जरूरी हो चला है। साथ ही भारत स्वास्थ्य सेवा पर्यटन के लिए शीर्ष स्थलों में से एक है, जिससे इस क्षेत्र में और अधिक निवेश की आवश्यकता है।
मेडिकल टूरिज्म का बड़ा बाजार है भारत
साल 2014 और 2019 के दौरान मेडिकल वीजा पर विदेशी पर्यटकों की आमद सालाना 30 प्रतिशत बढ़ी। भारत सरकार के अनुमान के अनुसार, अस्पतालों सहित चिकित्सा बुनियादी ढांचे में लगभग 582 निवेश के अवसर हैं। भारत में स्वास्थ्य बाजार में अस्पताल उद्योग की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है। वर्तमान में भारत में अनुमानित 70 हजार अस्पताल हैं जिनमें से निजी क्षेत्र की कुल हिस्सेदारी 63 प्रतिशत है। मेडिकल टूरिज्म इंडेक्स (2020-21) के अनुसार, भारत दुनिया भर के 46 पर्यटन स्थलों में से 10वें स्थान पर माना जाता है। केंद्र ने चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 2022 में ‘हील इन इंडिया’ पहल भी शुरू की थी जिसका मकसद मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देना था।
रिपोर्ट में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में चिकित्सा प्रक्रियाओं की लागत अन्य एशियाई देशों की तुलना में बहुत कम है। उदाहरण के लिए कोरोनरी धमनी बाईपास सर्जरी की लागत दक्षिण कोरिया में 26 हजार डॉलर और सिंगापुर में 17 हजार 200 डॉलर है। जबकि भारत में इसकी कीमत 7,900 डॉलर है। इसी तरह हृदय वाल्व सर्जरी की लागत दक्षिण कोरिया में 39,990 डॉलर, तुर्की और थाईलैंड में 17,200 डॉलर, सिंगापुर में 16,900 डॉलर और भारत में 9,500 डॉलर है। घुटने और कूल्हे की सर्जरी लागत दक्षिण कोरिया में 21,000 डॉलर और थाईलैंड में 17,000 डॉलर है। भारत में इसकी कीमत 7,200 डॉलर है।
भारत अन्य देशों के मुकाबले सस्ती कीमत पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएं और इलाज प्रदान करने वाले दुनिया के सबसे किफायती स्वास्थ्य देखभाल स्थलों में से एक के रूप में उभर रहा है। कोरोना महामारी से पहले 2014-2019 के बीच के वर्षों में भारत में मेडिकल वीजा पर आने वाले विदेशी पर्यटकों की आमद 30 प्रतिशत तक बढ़ी। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि भारत में स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे की कमी के बावजूद देश स्वास्थ्य सेवा पर्यटन के लिए एक आकर्षक बाजार बना हुआ है।
नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसमें व्यक्तियों की व्यक्तिगत खर्च क्षमता बहुत अधिक है, इसका प्रमुख हिस्सा स्वास्थ्य देखभाल का है। बढ़ती उम्र की आबादी में धीरे-धीरे वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और स्वास्थ्य बीमा की पहुंच जैसे कारक भारत में स्वास्थ्य सेवा उद्योग की मांग को बढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त भारत में हृदय संबंधी बीमारियों और गलत जीवनशैली से बीमारियां बढ़ रही हैं, जिससे स्वास्थ्य देखभाल की मांग बढ़ना तय है।
आगे बढ़ने के लिए वर्चुअल या रिमोट हेल्थकेयर क्षेत्र महत्वपूर्ण
कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में और वर्तमान में भारत को आगे बढ़ने के लिए वर्चुअल या रिमोट हेल्थकेयर क्षेत्र में खुद को अग्रणी बनाना होगा। डेटा एनालिटिक्स वेबसाइट स्टेटिस्टा के अनुसार, वर्चुअल या रिमोट हेल्थकेयर का वैश्विक बाजार 2030 तक 450 बिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है। एक महत्वपूर्ण कारक जो इसके विकास में मदद करेगा वह एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग होगा।
क्या है वर्चुअल हेल्थ?
वर्चुअल हेल्थ में रोगी की देखभाल में सुधार के लिए डॉक्टर्स के उपयोग के लिए डिजिटल उपकरण और सॉफ्टवेयर प्रोग्राम शामिल होते हैं और इसे स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप या डेस्कटॉप कंप्यूटर जैसे डिजिटल उपकरणों के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता है। यह रोगियों और चिकित्सकों के बीच उनकी भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना एक सेतु का काम करता है। मरीज या मरीज के परिजन डॉक्टर के क्लिनिक या अस्पताल में जाने के बजाय चिकित्सक या विशेषज्ञ से वीडियो-चौट कर सकते हैं। वर्चुअल स्वास्थ्य आने जाने का किराया और इलाज को सुलभ बना सकता है।
नाइट फ्रैंक इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल का मानना है कि ‘‘बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ भारत की जनसंख्या पर बिस्तर अनुपात की चुनौती, देश के स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण वृद्धि की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। आबादी की बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से पूरा करने के लिए वर्तमान रियल एस्टेट क्षमता को लगभग दोगुना करने की आवश्यकता है। हमारे सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग एक-चौथाई भारतीय अल्ट्रा- हाई नेटवर्थ व्यक्तियों ने 2023 में स्वास्थ्य देखभाल से संबंधित संपत्तियों में निवेश करने का हवाला दिया था। जो नई दवाओं की खोज को बढ़ावा देने के लिए चिकित्सा अनुसंधान और विकास में निवेश का एक उभरता हुआ अवसर भी है।’’
जापान स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे आगे है। यहां प्रति हजार व्यक्ति तीन बेड्स मौजूद हैं। भारत में हालात चिंता एवं निराशाजनक हैं। यहां प्रति हजार व्यक्ति मात्र 1.3 बेड्स हैं जो डब्ल्यूएचओ के मानकों से बेहद कम है। अच्छी बात यह है कि भारत में विकसित देशों की तुलना में इलाज का खर्चा खासा कम है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में कमियां जस की तस


जापान स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे आगे है। यहां प्रति हजार व्यक्ति तीन बेड्स मौजूद हैं। भारत में हालात चिंता एवं निराशाजनक हैं। यहां प्रति हजार व्यक्ति मात्र 1.3 बेड्स हैं जो डब्ल्यूएचओ के मानकों से बेहद कम है। अच्छी बात यह है कि भारत में विकसित देशों की तुलना में इलाज का खर्चा खासा कम है।