Editorial

देश को पुलिस स्टेट बनने से रोकिए-2

मेरी बात

पहले वे आए कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
फिर वे आए यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।
     – मार्टिन नीमोलर

मार्टिन नीमोलर एक जर्मन धर्मशास्त्री थे। वे शुरुआती दौर में हिटलर के समर्थक हुआ करते थे लेकिन बाद में उन्होंने खुलकर हिटलर की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने का काम किया। 1946 में लिखी उनकी कविता ‘First they came…’  खासी चर्चित रही है और अनेकों भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ है। भारत की शासन व्यवस्था में बड़ा बदलाव होते देख, इसके ‘पुलिस राज्य’ में बदलने की आशंका ने मुझे इस कविता का स्मरण करा दिया। विश्व गुरु बनने का सपना देख रहे हर भारतीय को समझना होगा कि यदि समय रहते नागरिक अधिकारों की कटौती के खिलाफ वह मुखर नहीं हुआ तो उसकी यह तटस्थता एक दिन उसके खिलाफ जाएगी ही जाएगी। केंद्र सरकार की संस्थाओं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से समझा जा सकता है कि कैसे आम नागरिक को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का क्षरण बढ़ रहा है। इन आंकड़ों के साथ-साथ उन कानूनों को भी समझना होगा जिन्हें देश की सम्प्रभुता को बचाए रखने के नाम पर बनाया गया है लेकिन जिनका दुरुपयोग मौलिक अधिकारों पर सीधे आघात पहुंचा रहा है। पहले बात राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों की। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में हिरासत में मौत के मामले बढ़ रहे हैं। एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2020-21 में पुलिस हिरासत में 1,940 मौतें हुई थी जो 2021-22 में बढ़कर 2,544 जा पहुंची। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरबी) के अनुसार 2010 से 2020 के दशक में 17,146 लोग पुलिस हिरासत में मारे गए। यानी प्रति दिन पांच की मौत पुलिस/न्यायिक हिरासत में रहते हुई हैं। ये सरकारी आंकड़े हैं। अगस्त, 2021 में उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन.वी. रमन्ना ने हिरासती मौतों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था- ‘Police stations pose the highest threat to human right’s and dignity as custodial torture, violence and police atrocities still prevail, not with standing constitutional guarantees’ (मानवाधिकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरा पुलिस थानों से है। संविधान प्रदत्त सुरक्षा और अधिकारों के बावजूद हिरासत में यंत्रणा, हिंसा और पुलिसिया अत्याचार जारी है।)

ये उपरोक्त आंकड़े भारत सरकार की संस्थाओं द्वारा जारी किए गए हैं और पुलिस हिंसा पर कथन एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश का है जो इस बात की, इस आशंका की पुष्टि करने के लिए काफी हैं कि पिचहत्तर बरस के आजाद भारत में धीरे-धीरे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से आम नागरिकों को वंचित किया जाता रहा है और अब राष्ट्र की एकता बनाए रखने के नाम पर इन अधिकारों का दायरा तेजी से कम किया जा रहा है। हम कमजोर स्मरण शक्ति वाले लोग हैं इसलिए कुछ समय के हो-हल्ला बाद हम शांत हो जाते हैं, भूल जाते हैं कि कैसे हमारे अधिकारों का हनन् किया जा रहा है। 4  दिसम्बर, 2021 का दिन याद कीजिए जब खबर आई थी कि नागालैंड के मोन जिले में सेना ने 14 नागरिकों को आतंकी समझ मार डाला। केंद्रीय गृहमंत्री ने तब स्वीकारा था कि सेना से भूल हुई है और 14 निर्दोष मारे गए हैं। कितना आसान है यह कहना कि ‘भूलवश’ मारे गए। जरा सोचिए, उन परिवारों का जिन्होंने सेना की इस ‘भूल’ चलते अपनों को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया। क्या उनकी निष्ठा भारत के प्रति, भारतीय संवधिान के प्रति बनी रही होगी।? पूर्वोत्तर के राज्यों में या फिर देश के किसी भी हिस्से में, जहां ‘अफस्पा’ कानून लागू है, इस प्रकार की ‘भूलें’ होते हम लगातार देख रहे हैं। थोड़ा प्रयास करेंगे तो याद आएगी 2004 की वह घटना जिसने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हमारी छवि को दागदार करने और हर भारतीय को शर्मसार करनेे का काम किया था। 15 जुलाई 2004 को मणिपुर की महिलाओं ने 17 असम राइफल्स (केंद्रीय सुरक्षा बल) के मुख्यालय पहुंच ‘अफस्पा’ (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) कानून के खिलाफ नग्न हो प्रदर्शन करते हुए सैन्य बलों से उनका भी बलात्कार करने को कहा था। असम राइफल्स पर आरोप था कि उसने एक 34 वर्षीय स्थानीय महिला टी. मनोरमा देवी को पूछताछ के नाम पर हिरासत में ले उसके साथ बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर डाली थी। इस हत्याकांड की जांच के लिए मणिपुर सरकार ने एक न्यायिक आयोग गठित किया लेकिन इस आयोग की जांच रिपोर्ट आजतक सार्वजनिक नहीं की गई है। दोषियों के खिलाफ राज्य की पुलिस और सरकार ‘अफस्पा’ कानून के चलते कुछ भी कर पाने में असमर्थ रही है क्योंकि यह कानून सुरक्षा बलों को ऐसी किसी भी जांच से बचाने के लिए संरक्षित करता है। मणिपुर आज तक सुलग रहा है और वहां यह कानून अभी तक लागू है। पुलिस स्टेट को समझने के लिए मुनव्वर फारूकी की जनवरी 2021 में गिरफ्तारी का प्रसंग याद करना होगा। फारूकी एक कॉमेडियन हैं जिन्हें 37 दिन जेल में गुजारने पड़े थे। उन पर हिंदू देवी-देवताओं और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का मजाक उड़ाने के आरोप लगाए गए थे जो प्रमाणित नहीं हो पाए लेकिन फारूकी को 37 दिन जेल में बिताने पड़े।

फरवरी 2021 में एक पर्यावरणविद् छात्रा दिशा रवि को तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के पक्ष में बोलने की कीमत गिरफ्तारी दे चुकानी पड़ी थी। उन पर पुलिस ने देशद्रोह के संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। 13 फरवरी को दिशा गिरफ्तार कर ली गई थी। 22 फरवरी, 2021 को दिल्ली की सेशन कोर्ट ने अभियुक्त के खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने की बात कहते हुए दिशा को जमानत दे दी थी। यह कुछेक उदाहरण इस आशंका को प्रमाणित करते हैं कि हम धीरे-धीरे एक पुलिस स्टेट में बदलते जा रहे हैं। ‘अफस्पा’ कानून तो सैन्य बलों को असीमित सुरक्षा देता ही है। राज्य सरकारें भी अपने पुलिस बलों को ऐसे ही प्रकार के संरक्षण देने के लिए कठोर कानून बनाने लगी हैं। कोविड महामारी के चरम दौर में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक विशेष पुलिस बल बनाने का फैसला लिया और इस पुलिस बलल को स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स नाम दिया गया है। इस बल को गठित करने के बाद इसके लिए अलग से कानून राज्य विधानसभा ने पारित किया जिसका अनुच्छेद 10(1) इस बल को यह शक्ति देता है कि वह बगैर वारंट किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। उसकी तलाशी ले सकता है। इतना ही नहीं इसका अनुच्छेद 15 न्यायालयों को इस पुलिस बल की बाबत किसी शिकायत का संज्ञान लेने पर रोक भी लगाता है। यानी आम नागरिक इस पुलिस बल द्वारा की गई किसी ज्यादती के खिलाफ अदालत नहीं जा सकता है। यह सीधे-सीधे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है जिसे राष्ट्र की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नाम पर थोपा जा रहा है। नागरिकों की निजता तो मानो अब महत्व ही नहीं रखती है। संविधान का अनुच्छेद 21, भारतीय नागरिकों को ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण’ का मौलिक अधिकार देता है। इस अधिकार का दायरा बीते पिचहत्तर बरसों के दौरान लगातार सिकुड़ता जा रहा है। मुम्बई आतंकी हमलों (2009)के बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने एक ‘नेशनल इन्टेलिजेंस ग्रीड’ (NATGRID) बनाए  जाने की घोषणा की थी। यह ऐसा सिस्टम है जो आम नागरिक के निजी जीवन में पूरी तरह ताक-झांक करने की क्षमता रखता है। उत्तर प्रदेश  की तर्ज पर ही बिहार सरकार ने भी कोविड काल के दौरान मार्च, 2021 में एक विशेष सुरक्षा बल ‘बिहार स्पेशल आर्म्ड पुलिस’ का गठन किया है। उड़ीसा, महाराष्ट्र पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और केरल में भी इस प्रकार के विशेष पुलिस बल मौजूद हैं जिन्हें व्यापक अधिकार दिए गए हैं। केंद्र सरकार भी लगातार राज्यों के कार्य क्षेत्र में केंद्रीय सुरक्षा बलों को अधिक शक्तियां दे हस्तक्षेप कर रही है। अक्टूबर, 2021 में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों से परामर्श किए बगैर पंजाब, पश्चिम बंगाल और असम में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का कार्यक्षेत्र बढ़ा डाला है।

यह सही है कि देश की अखंडता को अक्षुण रखने के लिए और तमाम प्रकार की आपराधिक घटनाओं, साइबर क्राइम, आतंकी हमलों से बचाव के लिए सुरक्षा एजेंसियों को मजबूत बनाना आवश्यक है लेकिन इसकी आड़ में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को कमजोर करना अंततः इस लोकतांत्रिक राष्ट्र को पुलिस स्टेट बनाने का काम कर रहा है, इसका प्रतिरोध यदि समय रहते नहीं किया गया तो इसका भारी नुकसान हमें यानी आम जन को ही भुगतना होगा।

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