पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-90
अप्रैल 1976 में उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय ने प्रधानमंत्री को असहज करने का काम किया। हालांकि यह निर्णय पूरी तरह से केंद्र सरकार के मनमाफिक था लेकिन पांच सदस्यीय खंडपीठ के एक न्यायाधीश ने बहुमत के खिलाफ अपना निर्णय सुना प्रधानमंत्री की इस अवधारणा को मजबूत करने का काम किया कि सत्ता में बने रहने के लिए ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ बेहद जरूरी है। इस निर्णय को ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण केस’ (Habesa corpus csae) के नाम से जाना जाता है। ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ नामक इस मुकदमे के पीछे आपातकाल के दौरान एक विवादित कानून ‘आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम’(Maintenance of Internal Security Act. 1971) जिसे उसके अंग्रेजी नाम के चलते ‘मीसा’ कह पुकारा जाता था, के अंतर्गत अनाप-शनाप गिरफ्तारी का मुद्दा था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों की बात कही गई है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि ‘किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता है।’ संविधान का अनुच्छेद 226 नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होने पर उच्च न्यायालयों में रिट दायर करने का अधिकार देता है जिसमें किसी भी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उच्च न्यायालय अपने समक्ष पेश करने का आदेश दे सकता है। जुलाई, 1971 में बनाए गए ‘मीसा’ कानून को आपातकाल के दौरान संशोधित करते हुए केंद्र सरकार को शक के आधार पर किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने के असीमित अधिकार दे दिए गए थे। 39वें संविधान संशोधन के जरिए इस कानून के अंतर्गत की गई गिरफ्तारियों को न्यायालयों में चुनौती नहीं दिए जाने की व्यवस्था कर दी गई थी। प्रधानमंत्री के राजनीतिक विरोधी जिनमें जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, देवीलाल, जॉर्ज फर्नांडीस, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, एम. करुणानिधि सरीखे राजनेता शामिल थे, इसी कानून के तहत गिरफ्तार किए गए थे। अप्रैल, 1976 में उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रॉय कर रहे थे, ने 4-1 के बहुमत से यह व्यवस्था दी थी कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार जिनमें ‘जीने का अधिकार’ और ‘स्वतंत्रता का अधिकार’ शामिल हैं, समाप्त माने जाएंगे और केंद्र सरकार के पास किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने का अधिकार है जिसको अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश के साथ तीन अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीएन भगवती, न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमएच बेग ने अपने निर्णय में कहा था- ‘राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल का आदेश जारी करने के बाद किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत किसी उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका अथवा कोई अन्य याचिका दायर कर गिरफ्तारी को चुनौती दे सके।’
केवल एक न्यायाधीश ऐसे थे जिन्होंने बहुमत का साथ न देते हुए अपना असहमतिपूर्ण निर्णय दिया था। इन न्यायाधीश का नाम था न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना। मानवाधिकारों के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति खन्ना ने अपने निर्णय में कहा-‘भारत का संविधान और उसके कानून जिंदगी और स्वतंत्रता को निरंकुश सत्ता के हवाले करने का अधिकार नहीं देते हैं… कानून की सत्ता दांव पर लगी है। प्रश्न यह है कि क्या अदालत के माध्यम से लागू किए जाने वाले कानूनों को चुप करा दिया जाएगा, मूक बना दिया जाएगा बिना मुकदमा चलाए किसी को भी हिरासत में रखना उन सभी के लिए एक अभिशाप समान है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता से प्यार करते हैं।’
न्यायमूर्ति खन्ना का असहमतिपूर्ण निर्णय तक इंदिरा गांधी नहीं बर्दाश्त कर पाई थीं। जनवरी, 1977 में उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए उनसे कनिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएच बेग को नया मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। हंसराज खन्ना ने अपना प्रतिरोध दर्ज करते हुए तत्काल त्यागपत्र दे डाला। बहुमत के आधार पर सरकार के पक्ष में निर्णय देने वाले चारों न्यायाधीशों को तब कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा था। दशकों बाद, सेवानिवृत्त हो चुके न्यायाधीश पीएन भगवती ने स्वीकारा था कि उनका निर्णय अविवेकपूर्ण था और इसके लिए उन्होंने देश से माफी भी मांगी थी।’
अमेरिकी दैनिक ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने इस निर्णय बाद न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की बाबत लिखा- ‘यदि भारत में कभी स्वतंत्र लोकतंत्र की वापसी होती है, जो बीते 18 वर्षों से एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उसकी गौरवपूर्ण पहचान थी, तो निश्चित ही कोई न कोई सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना का एक स्मारक जरूर बनाएगा। वह न्यायमूर्ति खन्ना ही थे जिन्होंने गत् सप्ताह स्वतंत्रता की रक्षा के लिए निडरता से अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा एक विरोधियों की बगैर अदालती कार्यवाही गिरफ्तारी का समर्थन करने वाले निर्णय के खिलाफ अपनी असहमति दर्ज कराई… स्वतंत्र न्यायपालिका का निरंकुश सत्ता के समक्ष समर्पण निश्चित ही लोकतांत्रिक समाज के विनाश का अंतिम चरण है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ऐसा ही समर्पण प्रतीत होता है।’
नवम्बर 1976 में इंदिरा सरकार ने संविधान में आमूलचूल परिवर्तन करने वाला 42वां संशोधन विधेयक संसद में पारित करा डाला। यह आजाद भारत में संविधान संग किया गया सबसे बड़ा खिलवाड़ आज तक माना जाता है। इस संशोधन के जरिए संसद को संविधान में असीमित परिवर्तन करने के अधिकार देते हुए 1973 में उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘केशवानंद भारती बनाम इंदिरा सरकार’ मुकदमे में दिए गए उस निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया गया जिसमें कहा गया था कि संसद संविधान की मूल भावना संग छेड़छाड़ नहीं कर सकती है। यह संशोधन इतना व्यापक था कि इसने संविधान को लगभग बदल डाला था। अनुच्छेद 368 को संशोधित करते हुए किसी भी प्रकार के संविधान संशोधन को अदालत के दायरे से बाहर कर दिया गया। राज्यों के अधिकारों को सीमित करते हुए केंद्र सरकार को राज्य सूची में दर्ज किसी भी विषय को अपनी सूची में लेने का अधिकार दे दिया गया। संसद को यह भी अधिकार दे दिया गया कि आवश्यकता पड़ने पर वह अपना कार्यकाल बढ़ा सकती है। मौलिक अधिकारों को निलंबित करने अथवा हटाए जाने की शक्ति को भी संसद के जरिए केंद्र सरकार को सौंप दी गई।
नवम्बर 1976 में ही इंदिरा गांधी ने एक बार फिर से आम चुनाव एक बरस के लिए स्थगित कर डाले। इससे पहले दिसम्बर 1975 में आपात स्थितियों का हवाला देते हुए फरवरी, 1976 में प्रस्तावित आम चुनाव को एक बरस के लिए टाल दिया गया था। नवम्बर में आम चुनाव को दोबारा एक बरस के लिए स्थगित करने वाली प्रधानमंत्री के मन-मस्तिष्क में लेकिन कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने आपातकाल लगाए जाने के बाद टिप्पणी की थी कि ‘मैंने जब आपातकाल लगाया एक कुत्ता तक नहीं भौंका था।’ हकीकत लेकिन ऐसी नहीं थी। अपने इस कदम के बाद इंदिरा एकदम अकेली पड़ गईं। उनके करीबी मित्रों तक ने उनसे दूरी बरतनी शुरू कर दी थी। नेहरू के कई करीबी विदेशी मित्रों ने पिता-पुत्री के कार्यकाल की तुलना करते हुए इंदिरा की कठोर शब्दों में आलोचना कर उन्हें व्यथित करने का काम किया था। नेहरू के करीबी मित्र ब्रिटिश लेबर पार्टी के सदस्य और पत्रकार फेनर ब्राकवे ने जयप्रकाश नारायण की रिहाई की मांग करते हुए ‘टाइम्स’ अखबार में विश्व के सबसे महान लोकतंत्र के क्रूर तानाशाही में बदलने की कठोर भाषा में निंदा की थी।’
इंदिरा को अपनी छोटी बहन मानने वाले ब्रिटिश राजनेता माइकल फुट अक्टूबर, 1976 में भारत आए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री को संजय गांधी के नसबंदी अभियान की सच्चाई बताने के साथ- साथ जॉर्ज फर्नांडीस समेत अन्य राजनीतिक बंदियों को तत्काल रिहा करने और आपातकाल हटाने की सलाह दी। फुट ने इंदिरा को नेहरू के उस कथन की याद दिलाई जो युवावस्था में पिता ने अपनी पुत्री से कहा था-‘बहादुर बनो और सभी तुम्हारे पीछे चलेंगे। यदि तुम बहादुर हो तो कभी नहीं डरोगी और ऐसा कुछ नहीं करोगी जिससे तुम्हें शर्मिंदा होना पड़े।’
प्रधानमंत्री ने माइकल फुट की बातें धैर्यपूर्वक सुनी जरूर लेकिन कोई आश्वासन उन्हें नहीं दिया।’ अप्रैल, 1976 में अमेरिकी पत्रकार जे. एंटनी लुकास की ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में भारत में आपातकाल को लेकर एक रिपोर्ट ‘इंडिया इज एज इंदिरा डूज’ (भारत वैसा ही है जैसा इंदिरा करती हैं) प्रकाशित हुई थी। इसमें लुकास ने लिखा- ‘…जब केवल दो-एक मां और बेटा-हरेक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लेते हैं। एक साल से भी कम समय में, दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश, अपेक्षाकृत खुली व्यवस्था से एक कठोर बंद व्यवस्था में तब्दील हो गया है। यह सभी भारतीयों और हमारे लिए भी मायने रखता है।’
इंदिरा को अपने करीबी और निजी मित्रों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा था। इन मित्रों में पुपुल जयकर और डोरोथी नारमन शामिल थे। डोरोथी ने 80 अमेरिकी बुद्धिजीवियों जिनमें भाषा विज्ञानी नोआम चोम्स्की और टेनिस स्टार ऑर्थर रॉबर्ट ऐश सरीखे शामिल थे, संग मिलकर भारत में आपातकाल लगाए जाने की कड़ी आलोचना करते हुए प्रेस को एक पत्र जारी कर अपना प्रतिरोध तक दर्ज कराया था।’
सम्भवतः अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी आलोचना चलते, एक लोकतांत्रिक पिता की पुत्री का जनता से सम्पर्क लगभग समाप्त हो जाने चलते, खुफिया एजेंसियों द्वारा चुनाव कराए जाने की अव्यवस्था में दोबारा सत्ता वापसी कहे जाने की रिपोर्ट चलते, पाकिस्तान में लम्बे अर्से बाद चुनाव कराए जाने की घोषणा चलते या फिर इन सभी कारणों का मिला-जुला असर रहा कि यकायक ही 18 जनवरी, 1977 को प्रधानमंत्री ने दो माह के भीतर आम चुनाव कराने का ऐलान कर पूरे देश को अचंभित करने का काम कर दिखाया। कैथरीन फ्रैंक के अनुसार इंदिरा ने अपने इस इरादे की किसी को भनक तक नहीं लगने दी थी। उन्होंने पहली बार अपने पुत्र के विरोध को दरकिनार करने का साहस भी दिखाया और तत्काल ही समस्त राजनीतिक बंदियों को जेल से रिहा कर दिया।’
जेल से रिहा होने बाद विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक 19 जनवरी, 1977 के दिन मोरारजी देसाई के घर में बुलाई गई थी। इसी बैठक में मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया गया था। 23 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक इकाई जनसंघ, किसान नेता चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय लोकदल, समाजवादी पार्टी और मोरारजी देसाई की कांग्रेस (ओ) को मिलाकर एक नया राजनीतिक दल ‘जनता पार्टी’ अस्तित्व में आया। जयप्रकाश नारायण के आशीर्वाद से गठित इस दल की अध्यक्षता मोरारजी देसाई को सौंपी गई थी। आपातकाल समाप्त किए जाने और मार्च, 1977 में आम चुनाव की घोषणा के साथ ही कांग्रेस भीतर राजनीतिक हलचल तेज होने लगी। इंदिरा सरकार में मंत्री रहते हरिजन नेता बाबू जगजीवन राम ने संसद में आपातकाल को स्वीकृति देने वाला विधेयक पेश किया था। आपातकाल समाप्ति के तुरंत बाद इंदिरा गांधी का साथ छोड़ने वालों में जगजीवन राम पहले नेता थे। उन्होंने कांग्रेस से अलग हो ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ नाम से अलग पार्टी बनाए जाने की घोषणा कर प्रधानमंत्री को सकते में डालने का काम किया। राम के पार्टी छोड़ने बाद एक के बाद एक कई दिग्गज नेताओं ने इंदिरा से किनारा करना शुरू कर दिया था। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा, उड़ीसा के मुख्यमंत्री रही नंदिनी सत्पथी समेत कई बड़े नेता शामिल थे। नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने भी जनता पार्टी के समर्थन में बयान जारी कर प्रधानमंत्री की मुश्किलों में इजाफा करने का काम किया। अपने बयान में इंदिरा की बुआ ने कहा- ‘इंदिरा और आपातकल ने हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है, कानून का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर किया गया। हमारे मूल्यों का क्षरण हर कीमत पर रोका जाना जरूरी है ताकि हम वापस उन आदर्शों को स्थापित कर सकें जिनके लिए हम वचनबद्ध हैं।) कैथरीन फ्रैंक के अनुसार विजय लक्ष्मी पंडित को भरोसा था कि जनता पार्टी यदि जीती तो उन्हें राष्ट्रपति बना दिया जाएगा।’
क्रमशः