पौड़ी लोकसभा क्षेत्र प्रदेश का एक मात्र ऐसा संसदीय क्षेत्र है जो कि गढ़वाल-कुमाऊं मंडल तक फैला हुआ है। पौड़ी, कोटद्वार, यमकेश्वर, श्रीनगर, चौबट्टाखाल, लैंसडाउन, छह विधानसभा सीटें पौड़ी जिले में हैं तो चमोली जिले की बदरीनाथ, थराली, कर्णप्रयाग तीन विधानसभा सीटें शामिल हैं। रूद्रप्रयाग जिले की केदारनाथ और रूद्रप्रयाग विधानसभा सीटंे हैं तो टिहरी जिले की देवप्रयाग और नरेंद्र नगर विधानसभा सीटें हैं। कुमाऊं मंडल के नैनीताल जिले की रामनगर सीट भी पौड़ी संसदीय क्षेत्र में शामिल है। इस लोकसभा सीट पर राजपूत मतदाता 61 फीसदी हैं तो वहीं ब्राह्माण महज 21 फीसदी ही है। एससीएसटी का मत प्रतिशत 12 तथा अन्य वर्ग महज 6 फीसदी ही है। 2004 के लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस का मत प्रतिशत 19 था तो भाजपा को 23 फीसदी मत मिले थे। 2009 मेें कांग्रेस पांचों सीटांे पर चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा से महज एक फीसदी ज्यादा मत हासिल कर पाई। इस चुनाव में कांगेस को 21 तो भाजपा को 20 प्रतिशत मत मिले थे। लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को बुरी तरह पछाड़ते हुए सभी पांचों सीटों पर जीत हासिल की। पौड़ी सीट पर भाजपा को 32 फीसदी मत मिले, जबकि कांग्रेस को 17 प्रतिशत मतों से ही संतोष करना पड़ा था
प्रदेश का सबसे चर्चित लोकसभा क्षेत्र पौड़ी कांग्रेस-भाजपा दोनों के लिए ही विशेष महत्व रखता है। एक तरफ भाजपा के लिए इस सीट पर अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखने की चुनौती है तो वहीं कांग्रेस भी इस सीट पर लगातार होती रही हार को जीत में बदलने के लिए तैयारी करती तो नजर आ रही है लेकिन भाजपा के मुकाबले अभी उसकी गति मंद बनी हुई है। स्वयं 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे मनीष खंडूड़ी भी पोैड़ी सीट पर चुनाव को बड़ी चुनौती मान रहे हैं और पार्टी को अभी से जमीनी स्तर पर काम करने की बात कहकर एक तरह से चुनावी तैयारियों को ही आईना दिखा रहे हैं। कांग्रेस-भाजपा में एक से अधिक दावेदार रहे हैं जिससे दोनों ही पार्टियों में चुनावी गहमागहमी आरंभ हो चुकी है।
पौड़ी लोकसभा सीट प्रदेश का एक मात्र ऐसा संसदीय क्षेत्र है जो गढ़वाल-कुमाऊं मंडल तक फैला है। गढ़वाल मंडल के कोटद्वार, यमकेश्वर, श्रीनगर, चौबट्टाखाल, लैंसडाउन और पौड़ी सहित छह विधानसभा सीटें हैं तो चमोली की बदरीनाथ, थराली, कर्णप्रयाग तीन विधानसभा सीटें शामिल हैं। रूद्रप्रयाग की केदारनाथ और रूद्रप्रयाग सीटंे हैं तो टिहरी जिले की देवप्रयाग और नरेंद्र नगर विधानसभा सीटें हैं। कुमाऊं मंडल के नैनीताल जिले की रामनगर सीट भी पौड़ी संसदीय क्षेत्र में शामिल है।
पौेड़ी संसदीय क्षेत्र अविभजित उत्तर प्रदेश के समय से ही प्रदेश की राजनीतिक दशा और दिशा को बदलने वाला रहा है। जहां इस क्षेत्र ने देश को बड़े-बड़े नेता दिए हैं तो वहीं राज्य बनने के बाद प्रदेश को भुवन चंद्र खंडूड़ी, डॉ रमेश पोखरियाल ‘निंशक’, विजय बहुगुणा, त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत जैसे पांच मुख्यमंत्री भी दिए हैं। पर्वतपुत्र के नाम से विख्यात स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की राजनीति को मजबूती से स्थापित करने में पौड़ी संसदीय सीट का बड़ा भारी योगदान रहा है।
1980 के चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस को अलविदा कहा और जनता पार्टी सेक्युलर के टिकट पर पोैड़ी से ऐतिहासिक जीत हासिल की। गौरतलब है कि बहुगुणा ने अपनी राजनीतिक कर्मभूमि इलाहाबाद को बनाया था। कांग्रेस छोड़ने के बाद इंदिरा गांधी जेैसी दिग्गज और जननेता के सामने अपनी रणनीति को सुरक्षित रखने के लिए बहुगुणा को आखिरकार अपनी जन्म भूमि पौेड़ी का ही रुख करना पड़ा। 1980 में पोैड़ी सीट पर हुए उपचुनाव समूची कांग्रेस पार्टी, यहां तक कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार और केंद्र सरकार पूरी तरह से बहुगुणा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थी। बहुगुणा को चुनाव हरवाने के लिए तमाम सरकारी मशीनरी को झोंक दिया गया था बावजूद इसके हेमवती नंदन बहुगुणा को पोैड़ी के मतदाताओं ने जबर्दस्त समर्थन देकर उनकी झोली में वोटों की ऐसी बरसात की कि उन्होंने बड़े भारी अंतर से जीत हासिल की थी। आज भी इस चुनाव की चर्चा होती रहती है। राजनीतिक इतिहास की बात करें तो पोैड़ी संसदीय क्षेत्र ने देश-प्रदेश को एक से बढ़कर एक राजनेता दिए हैं। 1952 के आम चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के भक्त दर्शन पहली बार सांसद का चुनाव जीत कर संसद में पहंुचे थे। वे लगातार चार बार इस सीट से सांसद चुने जाते रहे हैं। 1971 में कांग्रेस ने प्रताप सिंह नेगी और वर्ष 1977 में जनता पाटी के जगन्नाथ शर्मा इस सीट से पहले गैर कांग्रेसी सांसद निर्वाचित हुए। 1984 में एक बार फिर कांग्रेस के चंद्रमोहन सिंह नेगी ने पौेड़ी से जीत हासिल की। 1989 में नेगी ने जनता दल के टिकट पर चुनाव जीते।
भाजपा के खाते में पौड़ी सीट वर्ष 1991 में आई। भाजपा ने सेना से सेवानिवृत मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी को अपना उम्मीदवार बनाया और पहली बार बीसी खण्डूड़ी सांसद बने। 1996 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सतपाल महाराज खण्डूड़ी को चुनाव में हराकर संसद पहुंचे। 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव में बीसी खण्डूड़ी ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली। 2004 तक खंडूड़ी पौड़ी सीट से सांसद रहे। बीसी खंडूड़ी ही एक मात्र ऐसे सांसद रहे जो कि कांग्रेस के भक्त दर्शन के चार बार के सांसद का रिकॉर्ड की बराबरी कर पाए। 2007 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनी। खण्डूड़ी मुख्यमंत्री बनने के कारण पोैड़ी संसदीय सीट पर उपचुनाव हुआ। इस उपचुनाव में भाजपा के जनरल टीपीएस रावत को जीत हासिल हुई। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटांे पर चुनाव हार गई। कांग्रेस के सतपाल महाराज पोैड़ी से दूसरी बार सांसद बने। 2014 के आम चुनाव में फिर से भाजपा के बीसी खण्डूड़ी ने भारी मतों से कांग्रेस के हरक सिंह रावत को करारी हार देकर भाजपा के खाते में इस सीट को वापस किया। 2019 में तीरथ सिंह रावत यहां से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। लोकसभा चुनाव की हार-जीत की राजनीति को देखा जाए तो भाजपा ने वर्ष 1991 से पौेड़ी सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा है। जबकि राज्य बनने के बाद कांग्रेस सिर्फ एक बार ही पोैड़ी सीट पर चुनाव जीत पाई है। वर्ष 1952 के आम चुनाव से लेकर 2019 तक के कालखंड में कांग्रेस ने कुल 7 बार और भाजपा ने 8 बार पोैड़ी सीट से जीत हासिल की है। जबकि एक बार जनता पार्टी सेक्युलर और एक बार जनता दल के उम्मीदवार पोैड़ी सीट से जीत हासिल कर चुके हैं। पौड़ी संसदीय क्षेत्र की 14 विधानसभा सीटों पर 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 12 सीटों पर कब्जा किया है। महज दो सीटों, बदरीनाथ और प्रतापनगर में ही कांग्रेस के विधायक चुनाव जीते हैं।
कांग्रेस और भाजपा में 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर खासी गहमागहमी बनी हुई है। दोनांे ही पार्टियों में पौड़ी सीट को लेकर कई दावेदारांे की चर्चा है। भाजपा की बात करें तो अभी तक मौजूदा सांसद तीरथ सिंह रावत का टिकट काटे जाने की कोई बात नहीं की है और न ही प्रदेश संगठन ने इसके कोई संकेत दिए हैं। लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रांे की मानें तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा प्रदेश की लोकसभा सीटों पर मौजूदा सांसदों के कार्यकाल से जनता में कुछ नाराजगी होने के संकेत की बात कही जा रही है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव को लेकर संघ ने एक सर्वे भी किया है। सूत्रों अनुसार संघ के सर्वे के कारण भाजपा के अनेक नेताओं को यह लग रहा हैे कि पौड़ी सीट पर भी चेहरा बदला जा सकता है और किसी नए चेहरे को टिकट देकर चुनाव में उतारा जा सकता है। इसी के चलते भाजपा में कई दावेदार टिकट पाने की जुगत में हैं। भले ही अभी किसी ने अपनी दावेदारी को न तो स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है और न ही इस पर कोई बयान जारी किया है लेकिन मीडिया मैनेजमेंट के जरिए जिस तरह से कई नेताओं के लिए माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है उससे यह साफ है कि पोैड़ी सीट पर भाजपा के कई बड़े चेहरे दावेदारी का मन बना चुके हैं जिसमें मौजूदा सांसद तीरथ सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के साथ-साथ राज्यसभा सासंद अनिल बलूनी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पुत्र शौर्य डोभाल जैसे नेताओं का नाम चर्चाओं में चल रहा है।
तीरथ सिंह रावत: 2021 में त्रिवेंद्र रावत को मुख्यमंत्री पद से अचानक हटा भाजपा नेतृत्व ने सबको चौंकाते हुए तीरथ को मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन 105 दिनों के कार्यकाल मेें उनको हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इस तरह से प्रदेश की राजनीति में सबसे कम 105 दिन के मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड भी तीरथ सिंह रावत के नाम दर्ज हो चुका है। राजनीतिक तौर पर तीरथ सिंह रावत भाजपा में नई पीढ़ी के बड़े नेता माने जाते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि के तीरथ संघ के प्रचारक और संगठन मंत्री के पद पर भी काम कर चुके हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय तीरथ सिंह रावत पहली बार एमएलसी का चुनाव जीतकर विधायक बने थे। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भाजपा की अंतरिम सरकार में शिक्षा मंत्री के पद पर रहे। 2002 के विधानसभा चुनाव में तीरथ पौेड़ी सीट से यशपाल बेनाम के हाथों महज 7 मतों से पराजित हुए। 2012 के चुनाव में तीरथ सिंह रावत पहली बार चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तीरथ सिंह को पोैड़ी सीट से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा और पहली बार तीरथ भारी मतों से जीतकर सांसद बने।
तीरथ को चुनावी राजनीति का अनुभवी नेता माना जाता है। कई वर्षों तक बीसी खंडूड़ी की चुनावी रणनीति और रणनीति के सूत्रधार रहे तीरथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इनके कार्यकाल के दौरान भाजपा प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटों पर चुनाव जीती थी। प्रदेश में 16 लाख कार्यकार्ताओं को भाजपा से जोड़ने का काम भी तीरथ सिंह रावत के कार्यकाल में हुआ। अपने सौम्य और मिलनसार व्यवहार के चलते तीरथ सिंह मतदाताओं में लोकप्रिय हैं। अपने संसदीय क्षेत्रों में भ्रमण करने वाले सांसदों में सबसे आगे भी रहे हैं। हालांकि पोैड़ी संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं में तीरथ के प्रति नाराजगी होने की बातें भी खूब सामने आ रही है। आपदा और अतिक्रमण हटाए जाने के नाम पर जिस तरह वर्षों से रोजगार कर रहे लोगों को बेरोजगार होना पड़ा है उससे तीरथ सिंह के लिए चुनाव में चुनौतियां भी हैं।
त्रिवेंद्र सिंह रावत: पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पौड़ी सीट पर दूसरे सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद पार्टी और संगठन में कोई जिम्मेदारी न मिलने से त्रिवेंद्र के सर्मथकों और कार्यकर्ताओं में भी भारी नाराजगी
बनी हुई है। त्रिवेंद्र रावत देव प्रयाग, नरेंद्र नगर के साथ-साथ पोैड़ी तथा चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों का भी निरंतर दौरा करते रहे हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री रहते हुए पौेड़ी में कई विकास कार्य और योजनाएं त्रिवेंद्र रावत के खाते में होने से उनको इसका चुनावी फायदा मिलने की पूरी संभावनाएं हैं। भाजपा के कई नेता मानते हैं कि पार्टी ने पोैड़ी सीट पर कोई बदलाव करती है तो त्रिवेंद्र रावत का नाम ही सबसे आगे हो सकता है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा आलाकमान त्रिवेंद्र रावत को बड़ी जिम्मेदारी देने का मन बना चुका है और उन्हें लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी भी मिल सकती है।
अनिल बलूनी: राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी अपने काम से प्रदेश की जनता में गहरी पैठ बना चुके हैं। पलायन को लेकर ‘मेरा गांव, मेरा वोट’ का संदेश और उत्तराखण्ड का लोकपर्व इगास बग्वाल को चर्चाओं में लाने का काम भी बलूनी द्वारा किया गया है। विगत चार वर्षों से जिस तरह बलूनी द्वारा राज्य के कई मामलों में केंद्रीय मंत्रियों से समन्वय बनाकर प्रदेश में कई योजनाएं लागू करवाई है उससे उनकी छवि बेहतर नेता के तौर पर तो बनी ही है, साथ ही राज्य में पहली बार किसी राज्यसभा सांसद के काम करने वाला नेता के तौर पर स्थापित हुई है। बलूनी के अलावा भाजपा के दो सांसद कल्पना सैनी और नरेश बंसल भी राज्यसभा सांसद हैं लेकिन राज्य के हितों के लिए इनके द्वारा कोई ऐसा काम अभी तक नहीं किया गया है जिसे एक सांसद के तौर पर उपलब्धि माना जा सके। अनिल बलूनी का राज्यसभा कार्यकाल फरवरी 2024 में खत्म हो रहा है जिसके चलते पौेड़ी से उम्मीदवार बनाया जा सकता है। बलूनी भी बड़े दावेदार माने जा रहे हैं।
सतपाल महाराज: धामी सरकार में अहम विभागों के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज भी पौड़ी सीट से भाजपा के संभावित दावेदारों की सूची में शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व महाराज कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे। 2017 के चुनाव
में भाजपा ने सतपाल महाराज को चौबट्टाखाल सीट से चुनाव में उतारा और महाराज पहली बार चुनाव जीत विधायक बने। वे त्रिवेंद्र रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव में फिर से चौबट्टाखाल से चुनाव जीते और वर्तमान में धामी सरकार में लोक निर्माण, पर्यटन और संस्कृति जैसे अहम विभागों के मंत्री हैं। 2021 में त्रिवेंद्र रावत को हटाए जाने के बाद सतपाल महाराज को मुख्यमंत्री बनाए जाने की सबसे ज्यादा चर्चाएं थी लेकिन उनकी जगह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसी तरह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद फिर से सतपाल महाराज को ही मुख्यमंत्री बनाए जाने की जबर्दस्त चर्चाएं प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में गूंजी। सतपाल महाराज पौेड़ी सीट से अपने टिकट के लिए जातिगत समीकरणों को अपने पक्ष में मान रहे हैं। मौजूदा सांसद तीरथ सिंह रावत ठाकुर हैं और अगर भाजपा इस सीट पर कोई बदलाव करती है तो उसे जातिगत समीकरण को भी देखना होगा।
शौर्य डोभाल: देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पुत्र शौर्य डोभाल भी पोैड़ी संसदीय सीट से बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। 2019 में भी शौर्य डोभाल को टिकट दिए जाने की चर्चाएं जमकर हुई थी। त्रिवेंद्र रावत सरकार के समय में शौर्य डोभाल पहली बार सुर्खियों में आए जब उनकी संस्था द्वारा राज्य सरकार के निवेश ओैर पलायन के मुद्दे को लेकर ‘रैबार’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन को शौर्य डोभाल का प्रदेश की राजनीति में पहले कदम बतौर माना गया। हालांकि भाजपा के कई नेता मानते हैं कि शौर्य डोभाल प्रदेश में गैर पहचान वाले नेता हैं। उनकी पहचान केवल उनके पिता अजीत डोभाल के ही नाम से बनी हुई है। जिस कारण पार्टी शौर्य डोभाल के नाम पर कोई बड़ा निर्णय लेगी।
कांग्रेस भीतर पौड़ी सीट पर लगातार दो लोकसभा और दो विधानासभा चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ताओं में एक गहरी निराशा का भाव नजर आ रहा है। इस सीट से कांग्रेस में दावेदारों की कोई ज्यादा संख्या तो नहीं है। बीसी खंडूड़ी के पुत्र और कांग्रेस नेता मनीष खंडूड़ी के साथ-साथ पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का नाम सबसे ज्यादा चर्चाओं में है। बदरीनाथ से विधायक राजेंद्र भंडारी भी पौड़ी लोकसभा सीट से राजनीतिक भविष्य बेहतर करने की जुगत में दावेदारों की सूची में अपना नाम दर्ज करवाने के प्रयास में जुटे हुए हैं तो पूर्व मंत्री रहे मंत्री प्रसाद नैथानी भी पौेड़ी सीट के प्रमुख दावेदारों में हैं।
मनीष खंडूड़ी: पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के पुत्र और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर पौेड़ी सीट से प्रत्याशी रहे मनीष खंडूड़ी सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। मनीष खंडूड़ी ने भाजपा के बजाय कांग्रेस के जरिए राजनीति में
प्रवेश ले खंडूड़ी समर्थकों के लिए 2019 में भारी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी थी। लोकसभा चुनाव के दौरान मनीष खंडूड़ी राहुल गांधी के संपर्क में आए और कांग्रेस में शामिल हुए। उन्हें कांग्रेस ने पोैड़ी लोकसभा सीट से चुनाव में उतारा।
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज और अविभाजित उत्तर प्रदेश से ही राजनीति में अपने आप को स्थापित कर चुके थे वे भी चुनाव में हार गए। पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री रहे हरीश रावत, लोकसभा और राज्यसभा के अलावा विधानसभा का चुनाव कई बार जीतने वाले प्रदीप टम्टा के अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह सरीखे नेताओं को भी जनता ने पूरी तरह से नकार दिया। ऐसे बड़े नेताओं की पंक्ति में महज एक माह की चुनावी तेैयारी के बावजूद बगैर राजनीतिक अनुभव के मनीष खंडूड़ी ने दो लाख से ज्यादा मत हासिल करके सबको हैरत में डाल दिया था।
चुनावी हार के बावजूद मनीष खंडूड़ी अपने संसदीय क्षेत्र की जनता से निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं। विगत साढ़े चार वर्ष के दौरान खंडूड़ी अपने क्षेत्र का दौरा करते रहे हैं। हाल ही में मनीष पौेड़ी संसदीय क्षेत्र का दोैरा करके आए और प्रेसवार्ता करते हुए जहां प्रदेश सरकार की नीतियों और विकास कार्यों पर सरकार पर गंभीर आरोप तो लगाए साथ ही कांग्रेस के संगठन और जमीनी राजनीति की हकीकत पर भी खुलकर बात की। समूचे संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के कमजोर संगठन और जनता के मुद्दों पर खुलकर आंदोलन न करने का भी चुनाव में असर पड़ने की संभावना खंडूड़ी खुलेतोैर पर सामने रख चुके हैं। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी मनीष खंडूडी राहुल गांधी की पंसद बताए जा रहे हैं। इसके चलते उनकी दावेदारी सबसे सशक्त नजर आ रही है।
गणेश गोदियाल: पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और बदरीनाथ -केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष रहे गणेश गोदियाल कांग्रेस के एक अन्य बड़े दावेदार के तौर पर समाने आए हैं। मिलनसार और मृदुभाषी गोदियाल 2017 में श्रीनगर विधानसभा से चुनाव जीत चुके हैं। 2022 में महज 500 मतांे से चुनाव हारे गोदियाल मूलतः उद्योगपति है। अपने क्षेत्र राठ में उच्च शिक्षा के लिए डिग्री कॉलेज और स्थानीय स्तर पर उद्योग भी स्थापति कर चुके हैं। राहुल गांधी के पंसदीदा नेता के तौर पर जाने जाते हैं। माना जाता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी राहुल गांधी की पंसद होने के चलते गोदियाल के खाते में आया। 2019 में मनीष खंडूड़ी की लोकसभा चुनाव की रणनीति बनाने में भी गोदियाल का बड़ा योगदान रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बेहद करीबी गोदियाल वर्तमान में कांग्रेस की शीर्ष संस्था सीडब्ल्यूसी के सदस्य हैं। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर भले ही गोदियाल का कार्यकाल कम रहा है लेकिन छोटे कार्यकाल में भी कांग्रेस के जनाधार और संगठन को मजबूत करने में गोदियाल के योगदान को कांग्रेस नेता भी मानते हैं। 2024 के लेाकसभा चुनाव में गोदियाल भी एक मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
मंत्री प्रसाद नैथानी: राज्य की पहली निर्वाचित कांग्रेस की तिवारी सरकार में पशुपालन मंत्री रहे मंत्री प्रसाद नैथानी पौेड़ी सीट से कांग्रेस के दावेदार हैं। राज्य आंदोलन से जुड़े नैथानी अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अनेक जनआंदोलनों
के भागीदार रहे हैं। छात्र जीवन से ही राजनीति में आए नैथानी वर्ष 1989 में महज 30 वर्ष की आयु में पहली बार जनता दल के टिकट पर देवप्रयाग विधानसभा से चुनाव लड़े और दिगग्ज राज्य आंदोलनकारी एवं उक्रांद नेता दिवाकर भट्ट को हराकर विधायक बने। तब देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र आज का घनशाली, नरेंद्र नगर के साथ-साथ रूद्रप्रयाग विधानसभा क्षेत्र तक फैला हुआ था। राज्य बनने के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर नैथानी कांग्रेस के टिकट पर देवप्रयाग से चुनाव जीते और तिवारी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। वर्ष 2012 में नैथानी कांग्रेस से बगावत करके निर्दलीय चुनाव में खड़े हुए और फिर से दिवाकर भट्ट को हराकर विधायक बने। तत्कालीन कांग्रेस सरकार में उक्रांद बसपा और निर्दलीय विधायकों ने एक साझा गुट प्रोग्रेसिव डेवलपमेंट फ्रंट यानी पीडीएफ बनाया और कांग्रेस सरकार को समर्थन दिया। इसके बदले में नैथानी सहकारिता और स्कूली शिक्षा विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे। देवप्रयाग पौेड़ी लोकसभा क्षेत्र का ही भूभाग है जिसमें नैथानी का अपना एक बड़ा जानाधार और समर्थकों का वर्ग निवास करता है। इसके साथ ही रूद्रप्रयाग, श्रीनगर और केदारनाथ क्षेत्र में भी नैथानी का जनाधार होने के चलते पोैड़ी सीट से प्रमुख दावेदारों की लिस्ट में है।
राजेंद्र भंडारी: बदरीनाथ विधायक राजेंद्र भंडारी पूर्व में भाजपा की खंडूड़ी और ‘निश्ंाक’ सरकार में कैेबिनेट मंत्री रह चुके हैं। 2007 में नंदप्रयाग सीट से निर्दलीय चुनाव जीते और 2022 में कांग्रेस के टिकट पर बदरीनाथ सीट से जीतकर फिर से विधायक बने। भंडारी का चमोली जिले की बदरीनाथ, थराली और कर्णप्रयाग सीट पर खासा जनाधार है। साथ ही त्रिस्तरी पंचायत के अलावा जिला पंचायत में भी उनका खासा दखल रहा है। राजेंद्र भंडारी की पत्नी रजनी भंडारी दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत चुकी हैं। लेकिन नंदा राजजात यात्रा और जिला पंचायत के कार्यों में भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपित होने के चलते भंडारी की मुश्किलें बढ़ी और बनी हुई हैं। राजेंद्र भंडारी भी पौड़ी सीट से कांग्रेस से टिकट पाने की उम्मीद लगाए हुए हैं। पोैड़ी सीट पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला चुनावी फैक्टर जातीय समीकरण भी रहा है। इस सीट पर राजपूत मतदाता 61 फीसदी है तो वहीं ब्राह्मण महज 21 फीसदी ही है। एससीएसटी का मत प्रतिशत 12 तथा अन्य वर्ग महज 6 फीसदी ही है। इस लिहाज से भाजपा ठाकुर उम्मीदवारों पर दांव लगा रही है जिनकी भाजपा में कमी नहीं है। जबकि कांग्रेस में पोैड़ी सीट पर ठाकुर नेता और उम्मीदवारों की कमी बनी हुई है। जानकारों की मानें तो इसी फैक्टर चलते राजेंद्र भंडारी अपनी दावेदारी कर रहे हैं।
पौड़ी लोकसभा सीट भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए खास महत्व रखती है। भाजपा कांग्रेस से बेहतर स्थिति में दिखाई देती है। 2004 के लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस का मत प्रतिशत 19 था तो भाजपा को 23 फीसदी मत मिले थे। 2009 मेें कांग्रेस पांचों सीटांे पर चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा से महज एक फीसदी ज्यादा मत हासिल कर पाई। इस चुनाव में कांगेस को 21 तो भाजपा को 20प्रतिशत मत मिले थे। लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को बुरी तरह पछाड़ते हुए सभी पांचों सीटों पर जीत हासिल तो की ही साथ ही कांग्रेस से बहुत ज्यादा मत हासिल करने में भी सफलता प्राप्त की। पौेड़ी सीट पर भाजपा को 32 फीसदी मत मिले, जबकि कांग्रेस को 17 प्रतिशत मतों से ही संतोष करना पड़ा था।
बात अपनी-अपनी
अभी तो पार्टी ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। पार्टी जिसे सक्षम समझेगी उसे ही टिकट देगी। मुझे पार्टी ने 2019 में लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया था और मैंने महज एक महीने की मेहनत से मजबूती से चुनाव लड़ा था तो स्वभाविक तौर पर मैं 2024 के लोकसभा चुनाव का दावेदार हूं औेर जब पार्टी चुनाव के लिए दिशा-निर्देश जारी करेगी तो मैं अपनी दावेदारी प्रस्तुत करूंगा। हार-जीत अलग विषय है, मैं उसमें नहीं जाता। मेरी सोच औेर मेरा प्रयास यह रहा हैेेेेेेे कि मैं अपनी प्रदेश ओैर अपने गढ़वाल के साथ-साथ अपनी संसदीय क्षेत्र की जनता के हितों के लिए क्या-क्या काम कर सकंू। मेरा मानना हैे कि केवल सांसद और विधायक का चुनाव जीतकर अगर अपने प्रदेश और क्षेत्र के लिए काम नहीं कर पाए तो ऐसे विधायक और सांसद किसी काम के नहीं हैं। अपने क्षेत्र में काम करने के लिए सांसद औेर विधायक होना ज्यादा बेहतर काम करने का माध्यम है।
मनीष खंडूड़ी, कांग्रेस नेता
अभी तो लोकसभा चुनाव के लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं आया है जिससे हम अपनी दावेदारी पार्टी के सामने रख सकें। जब कांग्रेस आदेश करेगी तो निश्चित ही मैं अपनी दावेदारी करूंगा। पार्टी का आदेश होगा कि मंत्री प्रसाद को चुनाव लड़ना है तो मंत्री प्रसाद इंकार कैसे कर सकता है। यह पार्टी का अनुशासन है जिसे हर कार्यकर्ता और नेता को मानना ही होता है।
मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व मंत्री
भाजपा में दावेदारी का कोई सिस्टम ही नहीं होता है, इसलिए दावेदारी करने का तो प्रश्न ही नहीं है। यह पार्टी का निर्णय होता है कि किसे चुनाव लड़ना है? कोैन दावेदार है? यह तो आप मीडिया वाले ही चर्चा करते रहते हैं और अपने-अपने हिसाब से दावेदार तय कर देते हैं।
अनिल बलुनी, राष्ट्रीय मीडिया सलाहकार, भाजपा
भाजपा में चुनाव के लिए दावेदारी का कांसेप्ट ही नहीं है, इसलिए कोई दावेदार नहीं है, जब पार्टी चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन करती है और नामों को पैनल में भेजती है, तब नाम दिए जाते हैं, पार्टी ही यह तय करती है कि किस उम्मीदवार को किस सीट से चुनाव में उतारा जाएगा। मैं पूर्व मुख्यमंत्री रहा हूं और पौड़ी सीट मेरा गृह क्षेत्र रहा है। इसलिए कार्यकर्ता मुझे स्वभाविक दावेदार मान रहे हैं, ये जरूर है कि जब पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन करेगी तब अन्य उम्मीदवारों के साथ मैं भी अपने लिए दावेदारी करूंगा।
त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड
मैं लोकसभा सीट का दावेदार नहीं हूं। मुझे सिर्फ एक सीट तक सीमित मत समझिए। मैं पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी की तरफ से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रचार करके आया हूं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने मुझसे प्रचार कराया था। फिलहाल मैं उत्तराखण्ड में अपने मंत्रालय में संतुष्ट हूं। मुझे अभी इस मंत्रालय के तहत बहुत से काम करने हैं।
सतपाल महाराज, पर्यटन मंत्री उत्तराखण्ड सरकार

