गत् दो जुलाई को उत्तर प्रदेश के हाथरस हादसे में करीब 125 लोगों के काल कवलित होने के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। पूछा जा रहा है कि ये हादसा था या साजिश? आखिर धार्मिक आयोजनों और धार्मिक स्थलों में ही ऐसे हादसे क्यों होते हैं? क्या इन हादसों के लिए अलग से कानून बनना चाहिए? इनकी बड़ी वजह क्या है? हाथरस में सत्संग के दौरान करीब डेढ़ लाख लोग मौजूद थे। बताया जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने का अंदाजा न तो आयोजकों को था और न ही प्रशासन को। इसलिए इस संख्या के हिसाब से मौके पर व्यवस्था ही नहीं की गई थी

गत् दो जुलाई को उत्तर प्रदेश के हाथरस हादसे में करीब 125 लोगों के काल कवलित होने के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। पूछा जा रहा है कि ये हादसा था या साजिश? इस हादसे के दोषी कौन है? असल में आमतौर पर धार्मिक आयोजनों या धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़ उमड़ती है। गहरी आस्था के चलते लोग अपने आराध्य के दर्शन करने या उनके बारे में सत्संग-प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले कई मामले हैं जिनमे कई लोगों की जानें जा चुकी है। एक जनवरी 2022 को माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े थे जिससे भगदड़ मच गई थी। इस हादसे में 12 लोगों की जान चली गई थी, जबकि एक दर्जन घायल हुए थे।

ऐसे ही महाराष्ट्र के सतारा में साल 2005 की 25 जनवरी को मंधार देवी मंदिर में सालाना तीर्थयात्रा के दौरान मची भगदड़ में 340 से अधिक श्रद्धालुओं की कुचलने से मौत हो गई थी। तीन अक्टूबर 2014 को पटना के गांधी मैदान में दशहरा समारोह के समाप्त होने के बाद भगदड़ में 32 जानें गई थीं। चार मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित मनगढ़ में कृपालु महाराज के राम जानकी मंदिर में मची भगदड़ में 63 लोगों की जान चली गई थी।

पटना में गंगा तट पर 19 नवंबर 2012 को छठ पूजा के दौरान अचानक अस्थायी पुल ढहने से भगदड़ में 20 लोगों की मौत हो हुई थी। इससे पहले आठ नवंबर 2011 को हरिद्वार में गंगा किनारे हरकी पैड़ी पर मची भगदड़ में कम से कम 20 लोगों ने अपनी जान गवाई थी। बावजूद इसके देश में धार्मिक आयोजनों और धार्मिक स्थलों पर ऐसे हादसे होते रहे हैं। जिसके बाद जांच और कार्रवाई तो होती है लेकिन कोई सबक लेता नहीं है। इसके लिए कहीं न कहीं इंतजामों की कमी भी जिम्मेदार होती है। लोग अपनी-अपनी आस्था के कारण धार्मिक स्थलों या आयोजन में शामिल होना चाहते हैं और इसके लिए वे किसी बात की परवाह नहीं करते हैं। ऐसे में जरा-सी भी ऊंच-नीच भगदड़ का कारण बन जाती है। भारी भीड़ के बीच छोटी-सी अफवाह भी बड़ा रूप ले लेती है। जैसे साल 2011 की 14 जनवरी को केरल के इडुक्की जिले में एक जीप सबरीमाला मंदिर में दर्शन कर रहे श्रद्धालुओं से टकरा गई थी। इसके बाद ऐसी अफवाह फैली जिससे भगदड़ मच गई और 104 श्रद्धालुओं की जान चली गई।

इसी तरह से हाथरस में सत्संग के दौरान करीब डेढ़ लाख लोग मौजूद थे। बताया जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने का अंदाजा न तो आयोजकों को था और न ही प्रशासन को। इसलिए इस संख्या के हिसाब से मौके पर व्यवस्था ही नहीं की गई थी जबकि सत्संग स्थल के भीतर की व्यवस्था आयोजकों को संभालनी थी और बाहर कानून- व्यवस्था पर प्रशासन और पुलिस को नजर रखनी थी क्योंकि इस आयोजन के लिए जिला प्रशासन से बाकायदा अनुमति ली गई थी। इसके बावजूद सत्संग स्थल पर न तो श्रद्धालुओं के प्रवेश और निकासी के लिए अलग- अलग द्वार थे और न ही वीआईपी यानी भोले बाबा को भीड़ से सुरक्षित अलग रास्ते से निकालने के इंतजाम। ऐसे में बाबा जब सामने दिखे तो भीड़ उनके पैरे छूने के लिए आगे बढ़ने लगी और बेकाबू हो गई। चश्मदीदों के हवाले से यह भी बताया जा रहा है कि सत्संग स्थल पर जमीन ऊबड़-खाबड़ थी।

ऐसे में जब भीड़ निकलने लगी तो पैर ऊपर-नीचे होने से लोग गिरने लगे जिससे भगदड़ की स्थिति और भी गंभीर हो गई। जहां तक इसके लिए अलग से कानून बनाने की बात है तो हाथरस घटना और धर्म गुरुओं के प्रति बढ़ते ऐसे अंधविश्वास को लेकर कानून बनाने की मांग सड़क से संसद तक उठाने लगी है।

अंधविश्वास को लेकर कानून बनाने की मांग
हाथरस घटना और धर्म गुरुओं के प्रति बढ़ते ऐसे अंधविश्वास को लेकर तीन जुलाई को राज्यसभा द्वारा इसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की गई। इसी दौरान नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष कानून बनाए जाने की मांग करते हुए कहा कि अंधविश्वास पर लोग चलते हैं और इसके लिए कोई कानून नहीं है। ऐसे सत्संग कितने एरिया में होना चाहिए, कहां पर होना चाहिए, वहां पहुंच क्या है, आसपास हॉस्पिटल कहां है, यह सब तय होना चाहिए। अंधविश्वास में बिना कुछ सोचे समझे लोग चले जाते हैं। ऐसे नकली बाबाओं के खिलाफ महाराष्ट्र और कर्नाटक में कानून बना है। मैं विनती करता हूं,इस पर पूरे देश में अलग से कानून बनाया जाए।

गौरतलब है कि बाबा के सत्संग में न तो मीडिया जा सकती है और न ही कोई उनकी वीडियो बना सकता है। बाबा अपने सत्संग का या अपना प्रचार मीडिया में नहीं करते। लेकिन उन्होंने अपने प्रचार-प्रसार के लिए भक्तों का नेटवर्क मॉडल बना रखा है। इनके सत्संगी अनुशासित होते हैं। साफ-सफाई से लेकर भीड़ प्रबंधन ट्रैफिक प्रबंधन तक की प्रत्येक जिम्मेदारी सतसंगी ही संभालते हैं। सम्भवतः यही वजह रही कि कार्यक्रम के आयोजकों ने सत्संग के प्रबंधन और सुरक्षा को देखने के लिए अपने स्वयंसेवकों या सेवादारों को ‘कमांडो’ की वर्दी में तैनात किया था। उन्होंने प्रशासन के किसी भी सदस्य को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी और कार्यक्रम के लिए निर्धारित शर्तों का उल्लंघन किया। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने घटना की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया है। इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई है लेकिन इसमें बाबा नारायण साकार का नाम शामिल नहीं है।

पुलिस की है बड़ी भूमिका

वर्ष 2007 से 2009 तक उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे विक्रम सिंह का कहना है कि हाथरस हादसे की जड़ में बाबा हैं। उन्होंने कहा, ‘एफआईआर घटना की सूचना होती है और विवेचना के दौरान इसमें और भी नाम शामिल हो सकते हैं लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि सारी मुसीबत, फसाद और अपराध की जड़ बाबा है और एफआईआर में उसका नाम सबसे पहले होना चाहिए था।’ वे आगे कहते हैं, ‘बाबा का नाम बाद में क्यों आएगा?’

सत्संग करवाने वाली समिति किसकी थी? ये समिति बाबा की थी। बाबा का नाम एफआईआर में न होना, दिखाता है कि उसके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया गया है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। पुलिस प्रशासन ने इससे पहले कुंभ, अर्धकुंभ, चुनाव, कांवड़ और वीआईपी ड्यूटी करवाई है, कहीं कुछ नहीं हुआ। ये कहां से हो गया, जाहिर है आपने दावतनामा दिया। सूचना मिले या ना मिले, दोनों स्थितियों में जिम्मेदारी पुलिस की होती है। पुलिस के पास इंटेलिजेंस है, संपर्क सूत्र हैं। पुलिस को पता होना चाहिए था कि वहां कितनी भीड़ है। वहां बैरिकेडिंग, ट्रैफिक, वॉच टावर, कंट्रोल रूप से समन्वय होना चाहिए था, जो नहीं था। हादसे के लिए सिर्फ आयोजकों और सेवादारों को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है, इसमें पुलिस की भी बड़ी भूमिका है।

प्रशासन की अनदेखी और आयोजकों की मनमानी
धार्मिक आयोजन हों या अन्य कोई आयोजन जिसमें ऐसी हस्तियां पहुंचती हैं जिनके कारण भारी भीड़ इकट्ठा हो सकती है तो आयोजक खुद को वीआईपी से भी बड़ा मानने लगते हैं। इसके कारण वे लोगों के साथ मनमानी करते हैं। उन्हें रोकते-टोकते हैं जिससे लोगों में आक्रोश पनपने लगता है और यह किसी न किसी रूप में फूटता है। कई बार पत्थरबाजी और तोड़-फोड़ होती है तो कई बार वीआईपी के लिए बनाए गए मंच आदि पर भीड़ चढ़ जाती है। हाथरस की घटना में भी इसी तरह का नजारा सामने आने की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि बाबा के
काफिले को निकालने के लिए वहां मौजूद श्रद्धालुओं को आयोजन की व्यवस्था संभालने में लगे लोगों ने रोक दिया था। जबकि श्रद्धालु किसी भी कीमत पर बाबा के पास पहुंचना चाहते थे। आमतौर पर प्रशासन भी ऐसे मामलों की अनदेखी करता है।

कम जगह में ज्यादा लोग

देश के कई धार्मिक स्थलों के परिसर तो काफी बड़े हैं लेकिन मुख्य दर्शन या पूजा स्थल काफी छोटे हैं। इसमें एक साथ भीड़ आती है तो धक्के के कारण लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगते हैं। ऐसे में अगर एक व्यक्ति भी भीड़ में गिर जाता है तो लोग चाहते हुए भी खुद को रोक नहीं पाते हैं और उस पर चढ़ जाते हैं। नतीजा यह होता है कि भीड़ में किसी के गिरने, बेहोश होने या मौत की अफवाह फैलती है और बचने के लिए लोग भागते हैं।

भीड़ में शामिल लोग, खासकर बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं इस भगदड़ का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। इसके लिए स्थानीय प्रशासन भी कहीं न कहीं जिम्मेदार होता है, जो आस्था के आगे हाथ खड़े कर देता है। छोटे स्थल पर अधिक लोगों की भीड़ बढ़ने पर भी वह लोगों को रोकता नहीं है। हाथरस के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिल रहा है। बताया जा रहा है कि हाथरस में अनुमति और आकलन से कहीं ज्यादा भीड़ पहुंच गई थी। इसके बावजूद प्रशासन तमाशबीन बना रहा और न तो आयोजन निरस्त किया और न ही लोगों को रोकने की कोशिश की।

विश्वास या अंधविश्वास

नारायण साकार विश्व हरि उर्फ ‘भोले बाबा’ के निकलने के लिए अलग से रास्ता बनाया गया था। पुलिस द्वारा लिए गए बयानों के मुताबिक सत्संग समाप्त होने के बाद श्रद्धालुओं में बाबा के चरणों की धूल इकट्ठा करने की होड़ मच गई। सैकड़ों महिलाएं बाबा के करीब से दर्शन पाने के लिए खड़ी थीं। नारायण साकार जब अपने वाहन की तरफ जा रहे थे उसी समय भगदड़ मची।

नारायण साकार के भक्त जब भगदड़ में फंसे थे तो वो वहां रुके बिना ही आगे बढ़ गए। पुलिस ने बताया कि सेवादारों ने ‘बाबा’ के चरणरज लेने के लिए भीड़ को अनियंत्रित छोड़ दिया, जिसके बाद महिलाएं और बच्चे एक दूसरे के ऊपर गिर गए और इसके बाद सेवादार वहां से फरार हो गए। बावजूद इसके घटना की कोई जिम्मेदारी बाबा नहीं ले रहे हैं। वो इस पूरे हादसे से खुद को अलग कर चुके हैं। इस हादसे में ज्यादा महिलाओं की मौत हुई है। लेकिन इसके बाद भी श्रद्धालुओं का विश्वास बाबा पर पूरी तरह से कायम है। श्रद्धालु इस घटना को अपने कर्मों का फल मान रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि यह विश्वास है या अंधविश्वास। एक महिला श्रद्धालु का कहना है कि यदि इस घटना में वो मारी जाती तो वो उनके लिए सौभाग्य की बात होती। इसके अलावा अन्य श्रद्धालु कहते हैं कि बाबा दरबार में आने से मन्नत पूरी होती है।

करीब चार साल पहले बाबा के संपर्क में आने वाली गोमती देवी गले में लटकी नारायण साकार की तस्वीर की माला दिखाते हुए दावा करती हैं कि इसे गले में लटकाने से लाभ मिलता है, सुकून मिलता है, मर्ज ठीक हो जाते हैं, घर का क्लेश कट जाता है, रोजगार मिलता है। ऐसे ही नारायण साकार के भक्त दिनेश यादव कहते हैं, ‘हमारी तरफ के लोग बाबा की छवि रखकर पूजा करते थे, उन्हें देखकर हम भी पूजा करने लगे, हम एक साल से इस सत्संग में हैं। अभी हमें कोई अनुभव नहीं हुआ लेकिन परमात्मा (बाबा) पर हमें विश्वास है, जो मन्नत मांगते हैं वो पूरी होती है। दिनेश इस हादसे के लिए नारायण साकार को जिम्मेदार नहीं मानते हैं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD