पूर्व में बदरी-केदार नाम से रही विधानसभा सीट अब बदरीनाथ से जानी जाती है। मंगलौर के साथ ही यहां भी विधानसभा उपचुनाव होना है। 10 जुलाई को मतदान होने से पूर्व सभी राजनीतिक दल जोर-आजमाइश में जुटे हैं। मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच है। यह सीट राजेंद्र भंडारी के भाजपा में चले जाने से खाली हुई थी। राजेंद्र भंडारी कांग्रेस के विधायक थे। भाजपा ने बेशक उपचुनाव में भंडारी को ही टिकट दिया है लेकिन यह चुनाव उसके लिए चुनौती साबित हो रहा है। कांग्रेस ने यहां से लखपत सिंह बुटोला को मैदान में उतारकर एक तीर से दो शिकार कर दिए हैं। बुटोला पूर्व में राजेंद्र भंडारी के राजनीतिक रणनीतिकार रहे हैं। साथ ही वे भंडारी के कमजोर पक्ष से भी वाकिफ हैं। भंडारी के लिए इस चुनाव में मुख्य चुनौती यह है कि वे न तो अपने पूर्व में रहे कांग्रेस के समर्थकों को और न ही भाजपा के कार्यकर्ताओं को एक साथ साधने की कोशिश में सफल हो पा रहे हैं जबकि भाजपा को लगता था कि भंडारी की जीत सुनिश्चित करने में उनके कांग्रेस के पुराने सहयोगी मुख्य भूमिका में होंगे। कांग्रेस का पूरा फोकस भंडारी के इन्हीं पुराने साथियों को अपने पाले में बनाए रखना है जिसमें पार्टी को सफलता भी मिलती दिख रही है। फिलहाल बदरीनाथ उपचुनाव भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए कड़ी परीक्षा साबित हो रहा है
बदरीनाथ विधानसभा सीट का उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिली पांच सीटों पर जीत का खुमार विधानसभा उपचुनाव में भी बरकरार रखने की है तो वहीं कांग्रेस लोकसभा सीट पर मिली करारी हार से उबरने के लिए जी-जान से जुटी हुई है। दोनों ही पाटियों ने उपचुनाव में प्रचार के लिए अपने-अपने दिग्गजों को मैदान में उतार दिया है।
लोकसभा चुनाव में बदरीनाथ विधानसभा सीट पर भाजपा को कांग्रेस से 8 हजार से ज्यादा मतों से बढ़त हासिल हुई थी। इसी बढ़त को उपचुनाव में बरकरार रखने के लिए भाजपा ने पूरे चुनाव की जिम्मेदारी नए सांसद बने अनिल बलूनी के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद भट्ट को दी है। इसके अलावा प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं और सरकार के मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार में उतारा गया है। जिनमें धनसिंह रावत को चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बनाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं। कांग्रेस इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर चुनाव लड़ रही है। लोकसभा चुनाव में मिली हार का बदला लेने के लिए कांग्र्रेस ने अपने कई बड़े नेताओं को प्रचार में उतार कर भाजपा को कड़ी चुनौती देने का काम किया है।
कांग्रेस ने लोकसभा उम्मीदवार रहे गणेश गोदियाल की लोकप्रियता को उपचुनाव में भुनाने की पूरी कोशिश की है। इसके मद्देनजर उनको ही सबसे बड़े स्टार प्रचारक के तौर पर सामने रखा है। उल्लेखनीय है कि गणेश गोदियाल लोकसभा चुनाव में भले ही हार गए लेकिन पूरे चुनावी अभियान में वे भाजपा को कड़ी टक्कर देते नजर आए और अनेक अवसरों पर वे अनिल बलूनी पर भारी पड़ते दिखाई दिए। गोदियाल की चुनावी रणनीति के चलते प्रदेश की पांचों सीटों पर सबसे ज्यादा चर्चा गढ़वाल सीट की ही रही। माना जा रहा है कि इसी के चलते कांग्रेस द्वारा चुनाव प्रचार की कमान गोदियाल के हाथों दी गई है। कांग्रेस की चुनावी रणनीति को देखें तो यह पहला अवसर है जब कांग्रेस बदरीनाथ उपचुनाव में एक साथ नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करण माहरा, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, चकराता विधायक प्रीतम सिंह के साथ-साथ चमोली कंाग्रेस संगठन को भी पूरे जोश-खरोश से प्रचार अभियान में झोक दिया है।
भाजपा भी इस चुनाव में जीत के लिए कमर कसकर मैदान में डटी हुई है। राजेंद्र भंडारी के कांग्रेस से भाजपा में शमिल होने के बाद उनको टिकट देकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि भंडारी की क्षेत्र में लोकप्रियता है जिसके चलते आसानी से भाजपा चुनाव जीत सकती है। जानकारों की मानें तो भले ही भंडारी अपने क्षेत्र में लोकप्रिय हों लेकिन उनके चुनावी जीत का मार्ग कांग्रेस पार्टी और उनके कार्यकर्ताओं के बूते ही रहा है। कंग्र्रेस के उम्मीदवार लखपत बुटोला लम्बे समय से पार्टी से जुड़े हुए हैं। बुटोला अपने क्षेत्र में खासे जनाधार वाले नेता बताए जाते हैं। राजेंद्र भंडारी को पूर्व में मिली चुनावी जीत में भी बुटोला की मेहनत और उनके जनाधार को महत्वपूर्णा माना जाता है। बुटोला कांग्रेस में सबसे ज्यादा सक्रिय नेता रहे हैं और कार्यकर्ताओं में भी उनकी लोकप्रियता बनी हुई है। भंडारी के कांग्रेस में रहते हुए बुटोला को राजनीति में आगे आने का रास्ता नहीं मिल रहा था लेकिन भंडारी के भाजपा में जाने के बाद क्षेत्र के मतदताओं में भंडारी की अपेक्षा बुटोला पर ज्यादा भरोसा जताया जा रहा है।
कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को लेकर चुनाव प्रचार में उतरी है जिसमें चारधाम यात्रा, बदरनीनाथ नव निर्माण में स्थानीय निवासियों के हक- हकूकों पर कुठाराघात के साथ-साथ जोशीमठ आपदा में केंद्र और राज्य सरकार की नाकामी प्रमुख है। जबकि भाजपा आज भी मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल और केंद्र सरकार की योजनाओं को इस चुनाव में प्रचारित कर रही है।
राजनीतिक जनकरारो का मानना है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं का साथ नहीं मिला लेकिन राज्यों के चुनाव पूरी तरह से स्थानीय मुद्दों पर ही होते रहे हैं जिसका फायदा कांग्रेस को इस उपचुनाव में मिल सकता है। काफी हद तक यह बात सही है कि विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे ही मतदाताओं को प्रभावित करते रहे हैं लेकिन प्रदेश में भाजपा की लगातार दो बार से सरकार है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता जिस तरह से बढ़ी है उससे भाजपा को फायदा पहुंचने के भी पूरे आसार हैं।
भाजपा के उम्मीदवार राजेंद्र भंडारी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके पूर्व में सहयोगी रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उनका भाजपा में चले जाने से भारी नाराजगी बनी हुई है। साथ ही जिस भाजपा को वे दिन-रात गरियाते रहे आज उसी भाजपा के कार्यकर्ता, यहां तक कि पन्ना प्रमुखों के सहारे उन्हें चुनाव मैदान में उतरना पड़ रहा है। इसको लेकर कांग्रेस उनके पूर्व में किए गए कार्यों और आरोपों को प्रचार में जमकर प्रयोग कर रही है। हालांकि कांग्रेस को यह भी डर है कि भंडारी के सत्तापक्ष में चले जाने से पुराने कार्यकर्ता उनके पाले में जा सकते हैं। यह बात इसलिए भी कही जा सकती है कि जब राजेंद्र भंडारी भाजपा में गए थे तो उनहोंने मीडिया के सामने साफ-साफ कहा था कि उनके क्षेत्र में काम नहीं हो रहे हैं। साथ ही उनके लोगों के भी काम नहीं हो रहे हैं इसलिए वे भाजपा में गए हैं।
भाजपा इसी बात को चुनाव में सबसे ज्यादा प्रचारित भी कर रही है कि प्रदेश और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है तो भाजपा विधायक ही इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा काम कर सकते हैं जबकि विपक्ष के विधायक क्षेत्र में काम करवाने में असमर्थ होते हैं। एक तरह से भाजपा ने साफ-साफ मतदाताओं को संदेश देने का प्रयास किया है कि राजेंद्र भंडारी के विधायक बनने के बाद ही सरकार बदरीनाथ क्षेत्र का विकास करेगी।
बहरहाल जो भी हो उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए कड़ी चुनौती तो बन गई है। 10 जुलाई को मतदान होना है और मतदान के बाद बदरीनाथ सीट का विजेता कौन होगा यह तो मतगणना के बाद ही सामने आएगा। लेकिन कांग्रेस पार्टी में जिस तरह कई गुट बने हुए थे उसे इस चुनाव में एक जुट होने और लगातार मिल रही चुनावी हार से उभरने का बड़ा अवसर नजर आ रहा है जो कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत है। भाजपा के लिए भी उपचुनाव जीतना चुनावी रथ को बरकरार रखने के साथ-साथ नए सांसद अनिल बलूनी के लिए भी अपनी जीत के बाद भाजपा उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने की चुनौती है। साथ ही धामी सरकार के भारी-भरकम विभागों के कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत के लिए भी यह चुनाव कड़ी परीक्षा है। इस उपचुनाव में धन सिंह रावत क्या कमाल करते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।

