‘मेरा जीवन लक्ष्य उत्तराखण्डियत’ किताब के कई जगह विमोचन होने के बाद अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने जीवन पर बनी डाक्यूमेंट्री ‘उत्तराखण्डियत की ओर’ का देहरादून में लोकार्पण सुर्खियों में है। कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी और उक्रांद के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी की उपस्थिति ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। कहा जा रहा है कि राजनीतिक रूप से यह डाक्यूमेंट्री रावत समर्थकों को फिर से सक्रिय करने और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने का माध्यम बन सकती है
हरीश रावत ने अपने राजनीतिक जीवन की यात्रा और संघर्षों पर आधारित ‘उत्तराखण्डियत की ओर’ डाॅक्यूमेंट्री का विमोचन किया वह सिर्फ इसलिए चर्चा का विषय नहीं है कि इस कार्यक्रम में हरीश रावत के अनछुए पहलुओं को दर्शाया गया है जबकि असल में चर्चा हो रही है कि इस विमोचन कार्यक्रम में उत्तराखण्ड की राजनीति के तीन बड़े चेहरे जो एक-दूसरे के राजनीतिक विचारधारा के धुर-विरोधी रहे हैं, को एक मंच पर लाकर खड़ा किया गया। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जो कि खांटी आरएसएस और भाजपा के दिग्गज नेता माने जाते हैं, वह भी हरीश रावत के उत्तराखण्डियत की ओर जैसे अहम विमर्श पर दलगत राजनीति से इतर हरीश रावत पर कसीदे पढ़ते नजर आए। साथ ही उक्रांद के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी भी हरीश रावत के इस प्रयास की जमकर सराहना करते रहे।
सबसे पहले उत्तराखण्डियत की ओर डाॅक्यूमेंट्री की बात करें तो इस डाॅक्यूमेंट्री का पहला एपिसोड का विमोचन देहरादून में किया गया। करीब एक घंटा 7 मिनट की इस डाॅक्यूमेंट्री में हरीश रावत के राजनीतिक जीवन और उनके संघर्षों के बारे में सिलसिलेवार हुए घटनाक्रमों को दर्शाया गया है। ब्लाॅक प्रमुख चुनाव से लेकर 1980 में पहली बार अल्मोड़ा संसदीय सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने के बारे में भी बताया गया है। हरिद्वार संसदीय सीट से चुनाव जीतकर केंद्र सरकार में मंत्री और फिर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बनने का सफर के कई अनछुए पहलुओं को भी दिखाया गया है जिनमें कांग्रेस में सबसे बड़ी बगावत के कारणों और बदलती राजनीतिक निष्ठा पर भी खुलकर बात कही गई है। साथ ही राज्य में केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाए जाने और उसके बाद के घटनाक्रमों को भी बताया गया है। हरीश रावत द्वारा उत्तराखण्ड में हाशिए में पड़ी कांग्रेस पार्टी को उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन से जोड़ने और कांग्रेस के संगठन को खड़ा करने के संघर्षों को भी बताया गया है कि किस तरह एक समय आया कि कांग्रेस को चुनाव में उम्मीदवार तक नहीं मिल पा रहे थे बावजूद इसके रावत द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस पार्टी को संगठन के तौर पर मजबूत किया जिसका नतीजा रहा कि 2002 में कांग्रेस पार्टी प्रदेश में सरकार बनाने के मुहाने तक पहुंच गई। इन सबके बावजूद हरीश रावत की मेहनत को अनदेखा करते हुए कांग्रेस हाईकमान ने 2002 में नारायण दत्त तिवारी और 2012 में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री का ताज सौंप दिया जिसकी कसक आज भी हरीश रावत को कहीं न कहीं सालती रही है। इसका खुलासा डॉक्यूमेंट्री में उनके वक्तव्यों से साफ झलकता है।
उत्तराखण्ड की ओर डाॅक्यूमेंट्री में अनेक बातों पर विमर्श और बहस हो सकती है, साथ ही इसमें कई ऐसी बातें भी हैं जिन पर विवाद आज भी होते रहे हैं परंतु जिस तरह से हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में अपनी चुनावी जीत और चुनावी रणनीति को दिखाया है उसी तरह अपनी चुनावी हार और रणनीति को समझने और उसको धरातल पर उतारने में हुई कमी को भी पूरी इमानदारी से कहने में कोई कसर नहीं रखी। 2017 के विधानसभा चुनाव हो या 2014 के लोगसभा चुनाव जिसमें कांग्रेस की बुरी हार हुई। यहां तक कि हरीश रावत किच्छा और लालढ़ांग विधानसभा से बुरी तरह चुनाव क्यों हारे? इसके कारणों पर भी हरीश रावत ने बात करने से परहेज नहीं किया। साथ ही अपने कार्यकाल में हर उस नेता और सहयोगियों का भी जिक्र किया जिन्होंने उनके साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी के लिए मेहनत की भले ही मौजूदा समय में वे भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों में शामिल होकर चुनाव जीत चुके हों। किशोर उपाध्याय, हरक सिंह रावत, विजय बहुगुणा, गोविंद सिंह कुंजवाल, सुरेंद्र सिंह नेगी तथा कई निर्दलीय विधायकों और बसपा तथा उक्रांद के नेताओं में खासतौर पर काशी सिंह ऐरी का भी उल्लेख हरीश रावत ने पूरी डाॅक्यूमेंट्री में कई बार किया है।
चुनावी वर्ष में प्रदेश की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा करने का हरीश रावत का यह प्रयास उनकी राजनीति और कांग्रेस पार्टी के लिए कितना सफल होगा यह तो आने वाला समय ही बता पाएगा लेकिन इसके पीछे ठोस राजनीतिक समीकरणों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। पूर्व में भी हरीश रावत उत्तराखण्डियत नाम से एक पुस्तक लिख चुके हैं जिसका दिल्ली, देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार में विमोचन कार्यक्रम हो चुके हैं। तब यह किताब प्रदेश की राजनीति में खासी चर्चाओं का विषय भी बनी रही अब उत्तराखण्डियत की ओर डॉक्यूमेंट्री के आने के बाद इस पर भी राजनीतिक चर्चाऐ शुरू होने लगी हैं खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी और काशी सिंह ऐरी के हरीश रावत के साथ विमोचन कार्यक्रम में एक साथ मंच साझा करने के भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस में भी सुगबुगाहट शुरू होने लगी है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो फिलहाल तीनों ही नेता हरीश रावत, भगत सिंह कोश्यारी और काशी सिंह ऐरी अपने-अपने दलों में अपनी भूमिका को लेकर संशय में हैं जहां कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, हरक सिंह रावत और प्रीतम सिंह को ही कांग्रेस की कमान और चुनावी रणनीति तथा चुनाव संचालन की जिम्मेदारी दी है उसमें हरीश रावत को फिलहाल बाहर रखा गया है। हरीश रावत को इस तिकड़ी में शामिल न करने से उनकी नाराजगी गाहे-गबाहे नजर आ जाती है उसी तरह से कोश्यारी भी महाराष्ट्र के राज्यपाल के पद से विदाई के बाद पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर हाशिए पर ही नजर आ रहे हैं। हालांकि उनकी नाराजगी की खबरें तो सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है लेकिन कई बार कोश्यारी के वक्तव्यों से भाजपा की अंदरूनी राजनीति में चर्चाएं हो चुकी हैं जिसमें गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी पर उनका हालिया बयान हो या अरविंद पाण्डे प्रकरण में उनके बयानों से हलचल मची। इसी तरह से काशी सिंह ऐरी आज के दौर की उक्रांद में अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर खासे बेचैन हैं। आज उक्रांद सोशल मीडिया में प्रदेश में सरकार बनाने का दावा करने से पीछे नहीं है लेकिन हकीकत में उक्रांद अपने संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की भारी कमी होने और अनुभवी वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी के चलते उसके दावों पर सवाल उठ रहे हैं, इसी को लेकर ऐरी की बेचैनी भी बढ़ी हुई है।
हरीश रावत की डाॅक्यूमेंट्री के बहाने तीनों वरिष्ठ नेताओं को अपनी भूमिका को नए सिरे से सामने रखने को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। खासतौर से हरीश रावत ने जिस तरह से डॉक्यूमेंट्री में अपने आपको एक नायक के तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया वह इसी बेचैनी और बदलते नए राजनीतिक समीकरणों को साधने का प्रयास करना भी माना जा सकता है।
भगत सिंह कोश्यारी अपने वक्तव्य में हरीश रावत की जमकर तारीफ करते रहे। उन्होंने उत्तराखण्डियत की ओर को प्रदेश के लिए सबसे अच्छा विचार बताया तो है ही साथ ही इशारों-इशारों में तंज भी कसे जिसमें
भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के अल्मोड़ा सासंद के तौर पर उनके संसदीय कार्यकाल पर भी टिप्पणी करने से पीछे नहीं रहे। कोश्यारी ने कहा कि हरीश रावत पहली बार 1980 में अल्मोड़ा से मुरली मनोहर जोशी को हराकर संसद पहुंचे तो वहां उन्होंने सवालों की झड़ी लगा दी और जीरो आवर के हीरो बन गए। पहलेे के सांसद तो शायद कभी सवाल पूछते होंगे लेकिन हरीश रावत सत्र में लगातार सवाल दर सवाल उठाते रहे। कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी और हरीश रावत की राजनीति को कांग्रेस से बड़े स्थान की बात करते हुए कोश्यारी ने अटल जी की कविता ‘हार नहीं मांनूगा, रार नहीं ठानूगा’ कही। व्यंग के साथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल पर भी इशारा करते हुए कहा कि हरीश रावत का कद इतना बड़ा है कि सारा बोझ गोदियाल के कंधों पर डाल दिया लेकिन हार नहीं मानने वाले।
गणेश गोदियाल ने भी कोश्यारी के इस व्यंग्य को सामान्य तौर पर लेते हुए कहा कि हरीश रावत को मैं इस बात पर आज भी याद करता हूं कि उन्होंने मुझे किस तरह से आगेे बढ़ाया। हरीश रावत के साथ उनके सम्बंध औपचारिक नहीं हैं, आज वे जहां खड़े हैं हरीश रावत की ही वजह से खड़े हैं। जब भी अवसर मिलेगा हरीश रावत के विचारों के लिए खड़ा रहूंगा। उक्रांद के वयोवृद्ध नेता काशी सिंह ऐरी ने तो हरीश रावत पर ‘हरी अनंत-हरी कथा अनंता में हरदा भी अनंत’ कहकर हरीश रावत के संघर्षों को याद किया और उनकी खुलकर तारीफ की।