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क्लीन चिट मिली, मगर बहुत देर से…

देश को आर्थिक दिवालियापन की कगार से निकालने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सुप्रीम कोर्ट ने कोयला आवंटन मामले में आखिरकार क्लीन चिट दे दी लेकिन यह फैसला उनकी मृत्यु के 19 महीने बाद आया। सवाल सिर्फ एक नेता की बेगुनाही का नहीं बल्कि उस न्याय व्यवस्था का है जिसमें फैसला आने तक व्यक्ति दुनिया छोड़ चुका होता है और राजनीतिक फायदे के लिए विपक्षी नेता बेबुनियाद आरोप लगा, एक ऐसे व्यक्ति का दामन दागदर करने से नहीं हिचकिचाते जिसने देश को आर्थिक दलदल से उबारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था

लगभग डेढ़ दशक तक भारतीय राजनीति में ‘कोयला घोटाले’ का पर्याय बना दिया गया नाम आखिरकार न्यायपालिका की कसौटी पर बेदाग साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लाॅक आवंटन मामले में पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रही कार्यवाही समाप्त करते हुए सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली और स्पष्ट कर दिया कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं था। विडम्बना यह है कि फैसला तब आया जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री इस दुनिया में नहीं रहे। दिसम्बर 2024 में उनके निधन के लगभग 19 महीने बाद अदालत ने कहा कि विशेष अदालत द्वारा समन जारी करना उचित नहीं था और सीबीआई की जांच में उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनता था।

यह फैसला केवल एक व्यक्ति को मिली कानूनी राहत नहीं है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था, जांच एजेंसियों और राजनीतिक विमर्श पर भी गम्भीर प्रश्न खड़े करता है। आखिर जिस व्यक्ति को वर्षों तक भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके नाम के साथ ‘कोलगेट’ जैसा शब्द चिपका दिया गया, यदि अंततः सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का आधार ही नहीं था तो उन वर्षों की राजनीतिक और नैतिक क्षति की भरपाई कौन करेगा?
आर्थिक दलदल से देश को था उबारा
डाॅ. मनमोहन सिंह का सार्वजनिक जीवन ईमानदारी, सादगी और बौद्धिक क्षमता का पर्याय माना जाता रहा। 1991 में जब भारत विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था और देश के पास मुश्किल से कुछ सप्ताह के आयात लायक विदेशी मुद्रा बची थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने उन्हें वित्त मंत्री बनाया।
उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का श्रेय मुख्य रूप से उन्हें ही दिया जाता है। आज जिस भारत को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, उसकी बुनियाद रखने वालों में उनका नाम सबसे ऊपर आता है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री बनने के बाद विशेषकर 2009 से 2014 के दूसरे कार्यकाल में उनकी सरकार लगातार घोटालों के आरोपों से घिरती चली गई। 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, हेलीकॉप्टर सौदा और सबसे अधिक चर्चित कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद ने सरकार की छवि को गम्भीर नुकसान पहुंचाया। विपक्ष ने उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कहा और यह आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार उनके नेतृत्व में फल-फूल रहा है।
अब विनोद राय क्या कहेंगे? माफी मांगेंगे? पर किससे?
कोयला आवंटन विवाद को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में उस समय के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) विनोद राय की रिपोर्ट की बड़ी भूमिका रही। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि प्रतिस्पर्धी नीलामी के बजाए आवंटन की प्रक्रिया अपनाने से सरकारी खजाने को लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपए का सम्भावित नुकसान हुआ। यह आंकड़ा राजनीतिक विमर्श का सबसे बड़ा हथियार बन गया। संसद से लेकर चुनावी मंचों तक यही संख्या गूंजती रही। बाद में अर्थशास्त्रियों और कई विशेषज्ञों ने यह तर्क दिया कि यह वास्तविक नुकसान नहीं बल्कि अनुमानित अवसर लागत थी लेकिन तब तक जनमत बन चुका था।
कोयला ब्लॉक आवंटन के इसी मामले में विशेष अदालत ने 2015 में डॉ. मनमोहन सिंह को समन जारी कर मुकदमे का सामना करने का आदेश दिया। उन्होंने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सीबीआई पहले ही अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कह चुकी थी कि उनके खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य नहीं हैं लेकिन विशेष अदालत ने उस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया था। अब सर्वोच्च न्यायालय ने वही क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हुए कहा है कि विशेष अदालत के पास उसे खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं था और समन जारी करना उचित नहीं था। कोयला ब्लाॅक आवंटन विवाद की जड़ें वर्ष 2004 से 2009 के बीच की उस नीति में थीं, जब देश में कोयले की बढ़ती मांग को देखते हुए निजी और सार्वजनिक कम्पनियों को विभिन्न कोयला ब्लाॅकों का आवंटन किया गया।
उस समय तक अधिकांश आवंटन प्रतिस्पर्धी नीलामी के बजाए स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों के आधार पर होते थे। यह व्यवस्था नई नहीं थी। 1993 से ही विभिन्न सरकारें इसी प्रणाली के तहत कोयला ब्लाॅक आवंटित करती रही थीं लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दूसरे कार्यकाल में यही प्रक्रिया विवाद का सबसे बड़ा कारण बन गई। विवाद का केंद्र यह था कि सरकार ने नीलामी के बजाए चयन की प्रक्रिया क्यों अपनाई। विपक्ष का आरोप था कि इस व्यवस्था का लाभ कुछ चुनिंदा कम्पनियों को पहुंचाया गया। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि उस समय तक नीलामी की कानूनी व्यवस्था पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी और पूर्ववर्ती सरकारें भी इसी प्रणाली का पालन करती रही थीं। यही कारण है कि बाद में इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस अलग-अलग दिशाओं में चलती रही।
साल 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट सामने आई। तत्कालीन सीएजी विनोद राय ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि यदि इन कोयला ब्लाॅकों की नीलामी की जाती तो सरकार को लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता था। इसी अनुमानित राशि ने पूरे विवाद को विस्फोटक बना दिया। ‘एक लाख छियासी हजार करोड़ का घोटाला’ अगले कई वर्षों तक भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित वाक्य बन गया। संसद ठप रही, विपक्ष ने सरकार को घेरा और मीडिया में लगातार यह धारणा बनी कि देश के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किए थे कोयला ब्लाॅक आवंटन
इसी बीच वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 1993 के बाद किए गए 214 कोयला ब्लाॅकों के आवंटन को अवैध घोषित कर दिया। यह फैसला सरकार के लिए बड़ा झटका था लेकिन इस निर्णय में अदालत ने नीति की वैधता और आवंटन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे, किसी विशेष व्यक्ति को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं ठहराया था। इसके बावजूद जनमानस में यह संदेश गया कि सरकार ने बहुत बड़ा घोटाला किया है। इसी प्रकरण में उड़ीसा के तलबीरा-2 कोयला ब्लाॅक के आवंटन को लेकर डाॅ. मनमोहन सिंह का नाम भी सामने आया क्योंकि उस समय कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी उनके पास था। सीबीआई ने पूरे मामले की जांच की। कई वर्षों की जांच के बाद एजेंसी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के खिलाफ अभियोजन योग्य कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं और उसने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी लेकिन विशेष अदालत ने उस रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और 2015 में उन्हें आरोपी के रूप में तलब कर लिया।
यहीं से न्यायिक लड़ाई शुरू हुई। डाॅ. मनमोहन सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामला वर्षों तक लम्बित रहा। इस दौरान भारतीय राजनीति बदल गई, दो आम चुनाव हो गए, सरकारें बदल गईं और अंततः दिसम्बर 2024 में डॉ. मनमोहन सिंह का निधन हो गया। अब, लगभग डेढ़ दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट सही थी और विशेष अदालत द्वारा उसे अस्वीकार करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं था। अदालत ने यह भी माना कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का औचित्य नहीं था।
कौन करेगा बेबुनियाद आरोपों की भरपाई? और कैसे?
यही वह बिंदु है जहां यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह जाता। यह इस सवाल को जन्म देता है कि यदि जांच एजेंसी किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध का प्रमाण नहीं पाती, फिर भी वह वर्षों तक सार्वजनिक रूप से आरोपी बना रहता है तो उसकी प्रतिष्ठा को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा? लोकतंत्र में अदालतें अंततः न्याय देती हैं लेकिन यदि न्याय उस समय पहुंचे जब सम्बंधित व्यक्ति स्वयं उसे सुनने के लिए जीवित ही न हो तो उस न्याय का नैतिक अर्थ क्या रह जाता है?
डाॅ. मनमोहन सिंह को मिली यह मरणोपरांत क्लीन चिट केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है बल्कि उस राजनीतिक आख्यान पर भी सवाल खड़ा करती है जिसने लगभग एक दशक तक भारतीय राजनीति को प्रभावित किया। 2014 का लोकसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा गया था। यूपीए सरकार के खिलाफ 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल और कोयला आवंटन जैसे मामलों को लगातार उठाया गया। इनमें कोयला आवंटन विवाद सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतीक बन गया। चुनावी सभाओं से लेकर टीवी स्टूडियो तक ‘कोलगेट’ शब्द आम हो गया और डाॅ. मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी भी कठघरे में खड़ी कर दी गई।
मीडिया भी बेदाग नहीं
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका पर भी चर्चा जरूरी है। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व सत्ता से सवाल पूछना है लेकिन आरोप और अपराध में अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। कोयला आवंटन विवाद के दौरान अनेक समाचार माध्यमों ने सीएजी के अनुमानित नुकसान को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत किया। टीवी बहसों और अखबारों की सुर्खियों में ‘सबसे बड़ा घोटाला’ स्थापित हो गया जबकि न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भिक अवस्था में थी। अदालतों के अंतिम निर्णयों को उतनी प्रमुखता नहीं मिली, जितनी आरोपों को मिली थी। यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में लोगों की स्मृति में ‘कोयला घोटाला’ है लेकिन यह तथ्य नहीं कि उसी मामले में पूर्व प्रधानमंत्री को अंततः क्लीन चिट मिल चुकी है।
इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां किसी नेता का मूल्यांकन उसके जीवनकाल में एक तरह से हुआ और बाद में परिस्थितियों तथा तथ्यों के आधार पर बदल गया। डॉ. मनमोहन सिंह के साथ भी शायद ऐसा ही हो रहा है। आज उनके कार्यकाल का मूल्यांकन केवल कथित घोटालों के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक सुधारों, सूचना का अधिकार कानून, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, परमाणु समझौते, आधार जैसी परियोजनाओं और भारत की तेज आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में भी किया जा रहा है। समय के साथ उनकी छवि एक शांत, विद्वान और संस्थाओं में विश्वास रखने वाले प्रधानमंत्री की अधिक मजबूत हुई है।
फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न वही रह जाता है जिससे इस पूरे मामले की शुरुआत होती है कि क्या बहुत देर से मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है? यदि किसी व्यक्ति को उसके निधन के बाद अदालत निर्दोष घोषित करे तो कानूनी दृष्टि से यह सही निर्णय हो सकता है लेकिन नैतिक दृष्टि से उसकी उपयोगिता सीमित रह जाती है। वह अपने ऊपर लगे आरोपों का बोझ जीवन भर ढोता है, राजनीतिक अपमान सहता है, सार्वजनिक आलोचना झेलता है और अंततः जब उसका नाम साफ होता है, तब वह स्वयं उस फैसले को सुनने के लिए मौजूद नहीं होता।

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