देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज के 650वें प्रकटोत्सव वर्ष के अवसर पर 29 जुलाई से 20 फरवरी 2027 तक चलने वाले राष्ट्रव्यापी ‘समरसता संकल्प अभियान’ की शुरुआत कर दी है। पार्टी का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य संत रविदास के सामाजिक समरसता, समानता और सेवा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। इसके तहत देशभर में दीपोत्सव, कलश यात्रा, संत सम्पर्क अभियान, समरसता यात्रा और हजारों सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे लेकिन अभियान के ऐलान के साथ ही राजनीतिक गलियारों में एक नया सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि क्या यह केवल सामाजिक समरसता का अभियान है या फिर 2027 के विधानसभा चुनावों की बड़ी राजनीतिक तैयारी? यही सवाल राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों के बीच भी बहस का विषय बना हुआ है।
विपक्ष का आरोप है कि भाजपा चुनावों से पहले सामाजिक और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से अपना जनाधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सामाजिक समरसता ही उद्देश्य है तो ऐसे व्यापक अभियान चुनावों से ठीक पहले ही क्यों शुरू किए जाते हैं। उनका आरोप है कि भाजपा सामाजिक अभियानों को भी राजनीतिक लाभ से जोड़कर देखती है, दूसरी तरफ भाजपा इस पूरे अभियान को चुनाव से जोड़ने से साफ इनकार कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संत रविदास किसी एक समाज के नहीं बल्कि पूरे देश के संत हैं। उनका संदेश समानता, सामाजिक न्याय और समरसता का है। इसलिए उनके 650वें प्रकटोत्सव वर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है। पार्टी का दावा है कि इस अभियान के माध्यम से देशभर के संतों, सामाजिक संगठनों और समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। भाजपा का तर्क है कि इसे चुनावी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का हिस्सा बता रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक अभियान का समय काफी मायने रखता है। भाजपा का यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड समेत कई राज्यों में चुनावी तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। यह अभियान भी फरवरी 2027 तक चलेगा यानी ऐसे समय तक जब कई राज्यों में चुनावी माहौल अपने चरम पर होगा। संत रविदास का प्रभाव विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब और दिल्ली सहित कई राज्यों में व्यापक माना जाता है। इन राज्यों में रविदास समाज और अनुसूचित जाति के मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में इस अभियान को केवल सांस्कृतिक आयोजन के बजाए राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है क्योंकि भाजपा पिछले कुछ वर्षों से दलित समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर, भगवान बिरसा मुंडा और अब संत रविदास के विचारों को व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की रणनीति को उसी क्रम की कड़ी माना जा रहा है। भाजपा केवल धार्मिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर रही बल्कि सामाजिक संवाद का ऐसा नेटवर्क तैयार कर रही है, जिसका राजनीतिक असर आगामी चुनावों में दिखाई दे सकता है।
राजनीतिज्ञों की नजर सबसे अधिक उत्तर प्रदेश पर है। 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी सभी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में दलित मतदाताओं के बीच प्रभाव बढ़ाने की हर कोशिश को राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने पिछले दो चुनावों में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। अब पार्टी रविदास समाज सहित व्यापक दलित समुदाय तक अपनी पहुंच और मजबूत करना चाहती है। यही कारण है कि अभियान की शुरुआत वाराणसी स्थित संत रविदास की जन्मस्थली से की गई, जिसे राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
पंजाब में भी इस अभियान के अलग राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। वहां रविदास समाज की बड़ी आबादी है और लंबे समय से सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा राज्य में अपना संगठनात्मक आधार मजबूत करने के उद्देश्य से भी इस अभियान को आगे बढ़ा रही है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश की राजनीति में सामाजिक और राजनीतिक अभियान अक्सर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं होते। उनके अनुसार यदि कोई राजनीतिक दल सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच बनाता है तो उसका राजनीतिक लाभ मिलना स्वाभाविक है। इसलिए यह कहना आसान नहीं होगा कि यह अभियान केवल सामाजिक है या पूरी तरह चुनावी। विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा वैचारिक विस्तार और चुनावी संगठन दोनों लक्ष्यों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करती रही है। ऐसे में ‘समरसता संकल्प अभियान’ को भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बहरहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस अभियान का चुनावी असर कितना व्यापक होगा। इसका वास्तविक आकलन तब होगा जब आने वाले महीनों में भाजपा इसे गांव-गांव और बूथ स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाती है और विपक्ष इसके जवाब में कैसी राजनीतिक रणनीति तैयार करती है। इतना जरूर है कि सात महीने तक चलने वाला यह अभियान केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन बनकर नहीं रहने वाला। इसके सामाजिक संदेश, राजनीतिक संकेत और चुनावी प्रभाव पर आने वाले महीनों में सभी दलों की नजर बनी रहेगी।
कुल मिलाकर भाजपा सामाजिक समरसता का राष्ट्रीय अभियान बता रही है जबकि विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के तौर पर देख रहा है। इन दोनों दावों के बीच वास्तविक तस्वीर क्या है इसका जवाब आने वाले महीनों की राजनीति और 2027 के चुनावी नतीजे ही देंगे।