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प्रिया राजवंश की अधूरी कहानी रहस्यमयी मौत की परछाई में गुम एक सितारा

हिंदी सिनेमा की बेहद खूबसूरत और संजीदा अदाकारा प्रिया राजवंश की जिंदगी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही। प्यार, सफलता, अकेलापन और अंत में एक ऐसा कत्ल, जिसकी गूंज आज भी अदालतों और यादों में सुनाई देती है। चेतन आनंद के साथ उनका रिश्ता जितना गहरा था, उनकी मौत उतनी ही रहस्यमयी रही और न्याय की प्रक्रिया अब तक अधूरी सी लगती है। दिलचस्प यह भी है कि उनकी जिंदगी पर फिल्म बनाने की चर्चाएं बार-बार उठीं लेकिन हर बार यह कहानी पर्दे तक पहुंचने से पहले ही ठहर गई

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी चमक भले ही लम्बे समय तक पर्दे पर न रही हो लेकिन उनकी कहानी हमेशा लोगों को आकर्षित करती है। प्रिया राजवंश उन्हीं में से एक हैं, एक ऐसी अभिनेत्री जिनकी जिंदगी में कला, प्रेम और त्रासदी तीनों का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

पाकिस्तान के झेलम में जन्मीं वीरा सुंदर सिंह ने विभाजन का दर्द झेला और फिर अपने अभिनय के सपनों को लेकर लंदन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट तक पहुंचीं। यहीं उनकी मुलाकात हुई मशहूर फिल्मकार चेतन आनंद से, जिन्होंने उन्हें न सिर्फ फिल्मों में मौका दिया बल्कि ‘प्रिया राजवंश’ जैसा नया नाम भी दिया।
वर्ष 1964 की फिल्म ‘हकीकत’ से शुरू हुआ उनका सफर ‘हीर रांझा’, ‘हंसते जख्म’ और ‘हिंदुस्तान की कसम’ जैसी फिल्मों तक पहुंचा। उनकी खूबसूरती और अभिनय में एक अलग ही ठहराव था, एक ऐसा आकर्षण जो उन्हें भीड़ से अलग करता था लेकिन प्रिया की जिंदगी का सबसे अहम अध्याय उनका निजी रिश्ता रहा। चेतन आनंद के साथ उनका सम्बंध गहरा था लेकिन अनौपचारिक। उन्होंने लगभग पूरी फिल्मी यात्रा उन्हीं के साथ तय की। 1997 में चेतन आनंद के निधन के बाद प्रिया का जीवन जैसे ठहर गया। फिर आया 27 मार्च 2000, वह दिन जिसने इस कहानी को रहस्य और सनसनी में बदल दिया। मुम्बई के जुहू स्थित उनके बंगले में प्रिया का शव मिला। जांच में यह हत्या साबित हुई। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया जिनमें चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद और विवेकानंद भी शामिल थे।

अदालत ने 2002 में चारों को उम्रकैद की सजा सुनाई लेकिन बाद में जमानत और अपील की प्रक्रिया के चलते मामला उच्च अदालत में लम्बित हो गया। यही कारण है कि यह कहानी आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं मानी जाती।

फिल्म बनने की चर्चाएं, क्यों ठहर गई कहानी?
प्रिया राजवंश की जिंदगी में जितना ड्रामा, रहस्य और भावनात्मक गहराई है, उसने लम्बे समय से फिल्मकारों को आकर्षित किया है। मुम्बई में कई बार इस पर फिल्म या वेब सीरीज बनाने की चर्चाएं उठीं।

करीब एक दशक पहले यह खबरें सुर्खियों में थीं कि इस कहानी को बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी हो रही है। उस समय कंगना रंनौत और प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्रियों के नाम सम्भावित कास्ट के तौर पर चर्चा में आए थे। अभिनेता जानकी दास के बेटे शानू मेहरा भी इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की कोशिशों में बताए जाते हैं लेकिन यह चर्चाएं कभी ठोस रूप नहीं ले सकीं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मानी गई, मामले का कानूनी रूप से पूरी तरह समाप्त न होना। जब तक अदालत से अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक इस तरह की संवेदनशील सच्ची घटनाओं पर फिल्म बनाना जोखिम भरा माना जाता है। इसके अलावा यह कहानी सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं बल्कि कई जीवित व्यक्तियों और परिवारों से भी जुड़ी हुई है जिससे निर्माता-निर्देशक अक्सर दूरी बना लेते हैं।
प्रिया राजवंश की जिंदगी एक ऐसी फिल्म की तरह है जिसकी शुरुआत शानदार है, मध्य भाग भावनात्मक है और अंत रहस्य से भरा हुआ लेकिन क्लाइमेक्स आज भी अधूरा है। शायद यही वजह है कि उनकी कहानी बार-बार फिल्म बनाने की चर्चाओं में लौटती है लेकिन हर बार हकीकत की दीवार से टकराकर रुक जाती है। जब कभी इस कहानी पर फिल्म बनेगी, वह सिर्फ एक अभिनेत्री की बायोपिक नहीं होगी बल्कि हिंदी सिनेमा के एक दौर, एक रिश्ते और एक अनसुलझे रहस्य का जीवंत दस्तावेज होगी।

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