वर्ष 2000 में केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी सरकार ने तीन नए राज्य उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ और झारखंड का गठन किया। झारखंड की सियासत में क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) एक मजबूत राजनीतिक ताकत के तौर पर स्थापित है। वर्तमान में वहां सत्ता की कमान झामुमो नेता चम्पई सोरेन के हाथों में है। लेकिन यह सौभाग्य उत्तराखण्ड में सक्रिय क्षेत्रीय दलों को नहीं मिल पाया। उत्तराखण्ड का एकमात्र क्षेत्रीय दल उत्तराखण्ड क्रांति दल अविभाजित उत्तर प्रदेश में कई बार जीता। यूकेडी के शीर्ष नेताओं में शुमार किए जाते रहे काशी सिंह ऐरी 1985 में डीडीहाट सीट से पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे और लगातार 1985, 1989 और 1993 में जनप्रतिनिधि के तौर पर पहाड़ के लोकप्रिय नेताओं में गिनती कराते रहे। राज्य बनने के बाद जनाकांक्षाओं, अस्मिता और संवेदनाओं की प्रतीक होने के बावजूद यूकेडी जनमत हासिल करने में नाकाम रही। पिछले 24 सालांे के इतिहास में कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा बारी-बारी से सूबे की सत्ता पर काबिज रही हैं। गत दिनों हुए लोकसभा चुनाव में दोनों ही दलों के मुख्य एजेंडे में स्थानीय मुद्दों पर खामोशी छाई रही। पहाड़ की जनता हमेशा से जनमुद्दों पर मुखर रही है। टिहरी गढ़वाल के निर्दलीय उम्मीदवार रहे बॉबी पंवार ने पहाड़ की जनता के इस मिजाज को समझा और उन्होंने चुनाव में जमीनी मुद्दों को उठाकर जनता का दिल जीता है। पहाड़ से जुड़े मुद्दों जैसे मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सहित अग्निवीर योजना और ओल्ड पेंशन स्कीम की समस्या को उठाकर बॉबी ने सबको पीछे छोड़ दिया। टिहरी में एक तरफ राजशाही का चुनाव था तो दूसरी तरफ राजशाही को चुनौती देने वाला बॉबी पंवार मजबूती से चुनाव लड़ा है। उनके समर्थकों का दिया नारा ‘वोट भी और नोट भी’ खूब चला। ऐसे में पहाड़ों पर बॉबी पंवार एक जननायक बतौर उभरे हैं
बेरोजगार युवाओं के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले बॉबी पंवार टिहरी गढ़वाल संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर चर्चाओं में हैं। उनके नामांकन में उमड़े हुजूम ने सत्ताधारी पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों के दिलों में डर का माहौल पैदा कर दिया है। बॉबी पिछले कई वर्षों से बेरोजगारों की आवाज बने हुए हैं और इन्होंने समय-समय पर आंदोलन में युवाओं का नेतृत्व किया है। इनके कारण ही कई बड़े भर्ती घोटाले सामने आए हैं। बेरोजगारों के लिए पिछले 6 साल से सड़को पर लड़ाई लड़ने वाले बॉबी को युवाओं का चुनाव में पूर्ण सहयोग मिला। इस चुनाव में बॉबी पहाड़ की आवाज बनकर भी उभरे हैं। इन्होंने पहाड़ से जुड़े जनमुद्दों जैसे मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सहित अग्निवीर योजना और पुरानी पेंशन स्कीम पर सरकार की खूब घेराबंदी की। कहा जा रहा है कि टिहरी राजशाही के खिलाफ बॉबी पंवार की हुंकार ने पहाड़ पर नए राजनितिक समीकरण बना दिए हैं। जिस चलते बॉबी के साथ जन भावनाएं भी जुड़ी हैं। आगामी 4 जून को परिणाम कुछ भी आए लेकिन बॉबी के रूप में पहाड़ को भविष्य का नेता जरूर मिल गया है।
बॉबी पंवार का जन्म देहरादून जनपद के लाखा मंडल के लावडी गांव में सन 1997 में एक निर्धन परिवार में हुआ। स्कूली शिक्षा उनकी पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके सिर से पिताजी का साया उठ गया जिसके बाद बॉबी पंवार ने अपनी माता जी के साथ मजदूरी, पशुपालन एवं कृषि कार्य कर अपने परिवार का पालन-पोषण किया। अपने सपनांे को पंख देने के लिए पंवार गांव से देहरादून आ गए। यहां उन्होंने डीएवी कॉलेज में प्रवेश लिया और सरकारी सेवा में जाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगे। नियति को लेकिन कुछ और ही मंजूर था।
जब सपने हुए चकनाचूर
प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं में चल रही धांधली ने बॉबी सरीखे हजारों युवाओं के सपनों को पूरा होने से पहले ही तोड़ दिया। बॉबी पंवार ने वन विभाग में वन रक्षक पद के लिए आवेदन किया, परीक्षा हुई लेकिन नकल माफियाओं की मिलीभगत से प्रदेश की प्रतिभाएं दम तोड़ने को मजबूर हुई। इसके चलते प्रदेश भर के बेरोजगारों में आक्रोश भर गया।
बने बेरोजगार संघ के अध्यक्ष
नकल माफिया की व्यवस्था पर पकड़ से त्रस्त हों 2018 में बेरोजगार संघ का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष पद की कमान बॉबी पंवार को सौंपी गई। तब वे डाकपत्थर में एक निजी शिक्षण संस्थान से बीएड कर रहे थे। युवाओं के नेतृत्व को उन्होंने बखूबी निभाया। भ्रष्ट्राचार की भेंट चढ़ी वन आरक्षी परीक्षा को निरस्त करने की मांग को लेकर 26 मार्च 2018 को बॉबी पंवार के नेतृत्व में पहली बार हजारों बेरोजगारों का हुजूम सड़कों पर उतरा और सचिवालय घेराव हुआ। तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत की सरकार के आदेश से युवाओं पर लाठियां भांजी गई जिसमें कई युवा घायल हुए। इस दौरान बॉबी सहित उनके कई सहयोगी गिरफ्तार भी हुए।
संघर्षगाथा हुई शुरू
26 मार्च 2018 के आंदोलन से ही बॉबी पंवार की संघर्ष गाथा शुरू हुई। बॉबी पंवार एवं उनके सहयोगियों सहित तमाम बेरोजगारों पर हुई बर्बरता के बाद तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र रावत ने पांच साल बाद 2023 में सार्वजनिक रूप से प्रदेश के युवाओं से माफी भी मांगी। लेकिन 2018 से शुरू हुआ उत्तराखण्ड बेरोजगार संघ एवं उसके अध्यक्ष बॉबी पंवार का आंदोलन युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय होता चला गया। युवाओं की एकजुटता का ही परिणाम रहा कि जिस तरह से आंदोलन शुरू हुआ वह बढ़ता ही चला गया। समय-समय पर बड़े-बड़े आंदोलन किए गए।
पानी की टंकी पर चढ़ने को हुए मजबूर
आंदोलनों के क्रम में 2020 का वह आंदोलन भी जरूर याद किया जाएगा जब सरकार की नीतियों से हताश होकर बॉबी पंवार पानी की टंकी पर चढ़ने को मजबूर हुए थे। तब शासन-प्रशासन के हाथ पांव फूल गए। जब बॉबी पंवार नीचे नहीं उतरे तो प्रशासन ने मध्यरात्रि एसडीआरएफ की मदद से उन्हें नीचे उतार कर सीधा जेल पहुंचा दिया। इसके बाद युवाओं के बीच बॉबी लोकप्रिय हुए और उन्होंने कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया। चाहे वह आयोगों पर तालाबंदी करना, विधानसभा कूच करना हो या फिर सचिवालय के बाहर तंबू लगाकर दिन और रात के धरना देना हो।
शुरू हुआ सत्याग्रह
बॉबी पंवार एक बार फिर तब सुर्खियों में आए जब 8 फरवरी 2023 को उनकी अध्यक्षता में उत्तराखण्ड बेरोजगार संघ ने देहरादून के गांधी पार्क में ‘सत्याग्रह आंदोलन’ शुरू कर दिया। सरकार के इशारे पर मध्यरात्रि को प्रशासन ने सड़क पर सो रहे युवाओं पर लाठीचार्ज कर आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। इसके बाद पुलिस वाहन में भरकर बॉबी पंवार एवं सभी आंदोलनकारियों को मध्यरात्रि गिरफ्तार कर शहर से हटकर सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। कूड़े-कचरे से भरे उसी स्थान पर धरना कर युवाओं ने वह काली रात गुजारी। वहीं से ही अगले दिन यानी 9 फरवरी 2023 की रणनीति तैयार कर दी।
उत्तराखण्ड के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन
बेरोजगार युवाओं एवं छात्राओं के साथ हुई बदसुलूकी एवं लाठीचार्ज के वीडियो वायरल होने के बाद अगले दिन से ही गांधी पार्क के सम्मुख आक्रोशित युवाओं का हुजूम उमड़ने लग गया। देखते ही देखते हजारों की संख्या में युवा गांधी पार्क पहुंच गए। बॉबी पंवार के नेतृत्व में उत्तराखण्ड बेरोजगार संघ का यह आंदोलन उत्तराखण्ड के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन माना जाता है जिसमें 20 हजार से अधिक युवाओं की भीड़ जुट गई थी। देहरादून का दिल कहे जाने वाले घंटाघर से लेकर गांधी पार्क, एस्ले हॉल, राजपुर रोड आंदोलनकारी युवाओं से पूरी तरह खचाखच भरा हुआ नजर आया। भीड़ के आगे प्रशासन की कतई नहीं चली।
जिलाधिकारी, एसएसपी सहित तमाम आलाधिकारी कई दौर की वार्ता करने के लिए उनके बीच पहुंचे लेकिन युवाओं के जबरदस्त विरोध के आगे समूचा प्रशासन बौना साबित हुआ। आंदोलनरत युवा धांधली की भेंट चढ़ी पटवारी परीक्षा निरस्त करने, सीबीआई जांच की मांग और मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे।
प्रशासन ने फिर की 2018 जैसी बर्बरता
प्रशासन की युवाओं को मनाने की लाख कोशिशें करने एवं युवाओं का आक्रोश लगातार बढ़ता देख प्रशासन ने एक बार पुनः मार्च 2018 वाली बर्बरता दोहरा दी। इस दौरान पुलिस ने युवाओं पर बेरहमी से लाठियां भांजते हुए बेरोजगारों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। जिसमें कई युवाओं के सिर फूटे, टांगे टूटी, कई वाहन क्षतिग्रस्त हुए। घायल युवा अस्पतालों में कई दिन तक भर्ती रहे। प्रशासन ने बॉबी पंवार एवं उनके 13 सहयोगियों पर 307 जैसी कई जघन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
जब बिना शर्त हुए रिहा
पंवार के कुछ समर्थक उसी दिन देर शाम शहीद स्मारक पर धमक गए और वहीं पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर बॉबी पंवार एवं उनके सहयोगियों की तत्काल रिहाई की मांग की। साथ ही वे प्रदर्शन करते हुए पटवारी परीक्षा निरस्त करने एवं सीबीआई जांच की मांग पर अड़ गए। बेरोजगारों के इस आंदोलन की गूंज देश दुनिया में सुनाई दी। बॉबी पंवार की रिहाई के लिए प्रदेश भर में जगह-जगह आंदोलन होने लगे। शहीद स्थल पर बॉबी पंवार के सहयोगियों को तोड़ने के लाख जतन करने के बाद प्रशासन को सफलता हाथ नहीं लगी। बेरोजगारों ने खुले आसमान के नीचे 8 रातें गुजारी और अंत में प्रशासन को घुटने टेकने पड़े। बॉबी सहित सभी 13 युवाओं को बिना शर्त जमानत पर छोड़ना पड़ा।
पांच सौ दिन से अधिक हुए आंदोलन को
बॉबी पंवार के जेल से रिहा होने के बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि युवाओं ने उनके नेतृत्व में धरनास्थल एकता विहार में अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू कर दिया। धरना आज भी जारी है जिसे 500 से भी अधिक दिन हो गए हैं। धरनारत लोग आज भी उत्तराखण्ड में प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। बॉबी पंवार के इसी आंदोलन के परिणाम स्वरूप उत्तराखण्ड में शख्त नकल विरोधी कानून अस्तित्व में आया। उनके आंदोलन एवं संघर्ष के बदौलत 100 से अधिक नकल माफिया, जिसमें नेता और अधिकारी सम्मिलित हैं, सलाखों के पीछे हैं।
बॉबी पंवार के समर्थकों का कहना है कि अभी तो तालाब की छोटी छोटी मछलियां पकड़ी गई जबकि बड़ी-बड़ी डॉल्फिन जैसी मछलियां अभी भी तालाब में ही हैं। उनका दावा है कि यदि सीबीआई जांच होती है तो सरकार के आधे मंत्री और कई बड़े अधिकारी सलाखों के पीछे होंगे और इसीलिए मुख्यमंत्री डरे हुए हैं। इस दौरान बॉबी ने सरकार के कई बड़े विभागों के बड़े-बड़े घोटालों को भी उजागर किया।
बागेश्वर उपचुनाव में पंवार की पावर
आंदोलन के बीच में ही प्रदेश की बागेश्वर विधान सभा से विधायक और मंत्री रहे चंदन राम दास की आकस्मिक मृत्य के बाद उपचुनाव हुए। बॉबी पंवार एवं उनके कुछ साथी सरकार की पोल खोलने बागेश्वर भी धमक गए। सरकार ने खतरे को भांपते हुए तत्काल उनकी गिरफ्तारी के आदेश देते हुए उन्हें सहयोगियों के साथ पुनः हिरासत में ले लिया। लेकिन इस दौरान देहरादून में धरना स्थल पर चल रहे आंदोलन के साथियों ने मोर्चा खोल लिया। जिसके तहत पुतले दहन हुए, सहयोगी गिरफ्तार हुए, कई युवा पुलिस के वाहनों के नीचे 2 दिन तक लेटे रहे। एक बार फिर शासन-प्रशासन अपना फैसला पलटने को मजबूर हुआ और बॉबी सहित सहयोगियों को छोड़ दिया गया। यह उपचुनाव 20000 हजार मतों से जीतने का दावा करने वाली भाजपा सरकार 2000 के मामूली अंतर से जीत पाई।
समर्थकों के कहने पर उतरे टिहरी लोकसभा चुनाव में
बॉबी पंवार लंबे समय से युवाओं की मांगों एवं प्रदेश में हो रहे भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर करने के बाद सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे हैं जिसके बाद बॉबी पंवार की लोकप्रियता बढ़ती चली गई। नतीजन उनके सहयोगियों एवं समर्थकों ने उनके सामने टिहरी से लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा जिसे बॉबी पंवार ने सहर्ष स्वीकार किया।
नोट भी और वोट भी
पंवार का टिहरी से निर्दलीय चुनाव लड़ना भी खासा सुर्खियों में रहा। उनके सहयोगियों एवं समर्थकों ने ‘वोट भी, नोट भी’ का नारा दिया जो पूरे क्षेत्र में देखने को भी मिला। बॉबी पंवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी लेकिन प्रदेश के लोगों ने उनको चुनाव लड़ने के लिए खूब दान दिया। साथ ही उनके समर्थन में युवाओं एवं समर्थकों के हुजूम ने विपक्षियों को कड़ी टक्कर दी। मुकाबला बॉबी बनाम भाजपा में नजर आ रहा है। टिहरी गढ़वाल के मतदाताओं की मानें तो कांग्रेस यहां तीसरे स्थान पर पहुंच गई है। जबकि भाजपा परिणाम को लेकर असमंजस में है।
चुनाव की खान से चमका ‘हीरा’
बॉबी ने भाजपा प्रत्याशी महारानी लक्ष्मी शाह को चुनाव में कड़ी चुनौती दी है। एक ओर बॉबी पंवार को जगह-जगह सम्मान एवं सहयोग करते हुए भारी भीड़ नजर आई तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा प्रत्याशी महारानी लक्ष्मी शाह एवं उनके मंत्रियों का कई जगह विरोध हुआ। देहरादून के कैंट क्षेत्र में उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी सुनने को मिली, साथ ही कैंप्टी फॉल, थत्यूड, नौगांव, बड़कोट में भी जनता का आक्रोश स्पष्ट रूप से देखा गया। भले ही बॉबी एवं अन्य प्रत्याशियों का भविष्य मत पेटियों में कैद है लेकिन उनको मिले अपार जनसमर्थन ने उत्तराखण्ड को एक उभरता हुआ सितारा दे दिया है जो इस चुनाव की खान में एक ‘हीरा’ (लोकसभा चुनाव में बॉबी पंवार को मिला चुनाव चिन्ह) की तरह चमका है।
बात अपनी-अपनी
बॉबी पंवार के कैंपेन को मैंने सोशल मीडिया पर जब पहली बार देखा तो उनके लिए डर लगा। ये अपने चुनाव से पनपा डर था। क्योंकि क्रांतिवीरांे की जन्म और कर्म स्थली रहे उत्तराखण्ड में कभी क्रांति सेलिब्रेट करी जाती थीं लेकिन आज मायने बदल गए हैं। चुनावी शोर में ऐसी आवाज की मंशा को अक्सर गलत ही समझा जाता है। नेशनल एजेंडे पर चुनाव होते हैं और भू-कानून, अंकिता भंडारी जैसे मुद्दे चुनाव के वक्त भुला दिए जाते हैं। किसी दल विशेष की सेवा कर टिकट न मिलने से नाराज होकर नहीं, अपितु सभी दलों की सच्चाई समझकर जो आज की राजनीति के अखाड़े में निर्दलीय उतरने का साहस करे। वो अपने नहीं उत्तराखण्ड के भविष्य के लिए लड़ा है। बॉबी पंवार के इसी जज्बे को मेरा सलाम।
श्वेता मासीवाल, सोशल वर्कर एवं सचिव, वत्सल फाउंडेशन
मात्र 26 साल की उम्र के बॉबी पंवार के पक्ष में पूरे टिहरी लोकसभा की आम जनता उठ खड़ी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि राज परिवार के लोग लंबे समय से अटल और मोदी जी के नाम
पर जीत तो हासिल करता रहे लेकिन पिछले 20 वर्षों से टिहरी लोकसभा क्षेत्र की 14 विधानसभाओं की जनता संसद तक अपनी बात पहुंचाने से चूक गई। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे बेरोजगार संगठन के अध्यक्ष बॉबी पंवार ने जनता में नई उम्मीद जगाई है। 4 जून को बॉबी पंवार को मिलने वाला समर्थन चौंकाने वाला होगा।
शिवप्रसाद सेमवाल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी
उत्तराखण्ड में लगातार होते पेपर लीक मामलों के बीच एक युवा नेता उभरा जिसने हर बेरोजगार युवा जो सिस्टम द्वारा हो रहे अन्याय के खिलाफ बोलना चाहता था ‘उनकी आवाज बना वह और कोई नहीं इस बार टिहरी लोकसभा से निर्दलीय उम्मीदवार खड़े हुए बॉबी पंवार हैं। बॉबी अपने साथियों के साथ सैकड़ों दिनों से धरने पर बैठे हैं, इसके साथ-साथ सरकार में हो रही कई अनियमितताओं को उन्होंने समय-समय पर उजागर भी किया। इस दौरान उन्हें कई दिनों तक जेल भी जाना पड़ा। आंदोलन से राजनीति में कदम रखने वाले बॉबी पंवार को जनता का भी काफी समर्थन मिल रहा है। हम उनकी जीत की कामना करते हैं।
स्वाति नेगी, चर्चित यू-टयूबर एवं सामाजिक कार्यकर्ता
देवभूमि में बेरोजगार युवाओं को नौकरी नहीं देकर उनके सपनों को तोड़ने वाली सरकारें चाहे वह बीजेपी की रही हो या कांग्रेस की सभी ने पहाड़ के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। इसे इससे
समझा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों ने स्थानीय मुद्दों पर कोई बात तक नहीं की। जबकि उनका समाधान तो बहुत दूर की बात है। ऐसे में बॉबी पंवार उत्तराखण्ड के लोगों के लिए नया भविष्य बुन रहा है। जिसमें बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के साथ ही जमीनी मुद्दों को उठाया जा रहा है। आज बॉबी जैसे युवा ही प्रदेश में बढ़ रहे नशे को खत्म कर युवाओं को उनका उज्जवल भविष्य का सपना पूरा कर सकते हैं।
पीसी तिवारी, केंद्रीय अध्यक्ष, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी
हमारे समय में शमशेर सिंह बिष्ट जी ऐसे ही नवयुवा के तौर पर पहाड़ के हीरो बने थे। वह भी पहाड़ के मुद्दों को सरकार के सामने रखकर सत्ता के लिए चुनौती बनते थे। उन्हें मैनेज करने के लिए और उन पर डोरे डालने के लिए कांग्रेस के कई नेताओं ने कोशिश की। जिनमें केसी पंत जी प्रमुख रहे। लेकिन वह कभी भी किसी के सामने नहीं झुके। बॉबी पंवार में भी भविष्य की बहुत क्षमताएं हैं। जिस तरह उन्होंने बागेश्वर उपचुनाव में जाकर सरकार की नींद हराम की थी वह काबिले तारीफ है। वह युवाओं के हर मुद्दे पर ना डरा है ना थमा है। लेकिन मुझे लगता है कि बॉबी पंवार की यह थोड़ी जल्दबाजी होगी। उसे पहले लोकसभा चुनाव से नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव में उतरकर राजनीति के मैदान में आना चाहिए था। बेहतर तो यह था कि वह अगर बेरोजगारों को साथ लेकर ही आगे बढ़ते तो ज्यादा अच्छा रहता। हालांकि टिहरी लोकसभा चुनाव में बॉबी पंवार को अच्छा सपोर्ट मिला है। जिसके अप्रत्याशित परिणाम भी सामने आ सकते हैं। बॉबी पंवार को हमारी शुभकामनाएं हैं।
राजीव लोचन शाह, संपादक, नैनीताल समाचार
बॉबी पंवार आज उत्तराखण्ड के युवाओं के लिए आदर्श और प्रेरणादायक बन चुके हैं। वर्तमान सरकार और प्रदेश में पूर्व घटित राजनीतिक व प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ होती बुलंद आवाज का
नाम है बॉबी पंवार। इतनी कम उम्र में जिस प्रकार निडरता और साहस बॉबी ने दिखाया है और देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के लिए जिस तरह वे चुनौती बने हैं वो सच में काबिले तारीफ है। यदि बॉबी संसद पहंुचते हैं तो ये जीत टिहरी नहीं उत्तराखण्ड की होगी और निश्चित ही एक नया आरम्भ होगा।
अनुपम खत्री, राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तराखण्ड टाइगर फोर्स एवं पूर्व केंद्रीय प्रवक्ता यूकेडी
टिहरी गढ़वाल में चुनाव राजशाही के खिलाफ था। महारानी के विरुद्ध एंटी इंकम्बेंसी थी जिसे बॉबी पंवार और कांग्रेस मिलकर अच्छी तरह भुना सकते थे। हमारी पार्टी के उम्मीदवार जोत सिंह गुनसोला एक स्वच्छ छवि के नेता हैं। हालांकि बॉबी पंवार भी एक युवा और सक्षम नेता हैं। लेकिन इस बात को सोचना चाहिए था कि इस तरह अलग-अलग चुनाव लड़कर हम बीजेपी के हाथ ही मजबूत करेंगे। इस तरह बॉबी पंवार को सिर्फ वोट कटवा नहीं बनना चाहिए था। बीजेपी यह चुनाव साम, दाम, दंड, भेद सभी को अपनाकर लड़ी। महारानी मालाराज लक्ष्मी शाह इस बार ही नहीं पिछली बार भी चुनाव में नजर नहीं आई थीं तब भी उन्हें जनता ने जिता दिया। वह हिंदी तक नहीं बोल पाती। तब उन्होंने अपनी जीत को मोदी जी की जीत बताया था। ऐसे में टिहरी गढ़वाल की लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच थी तो बॉबी पंवार को इस लड़ाई में नहीं आना चाहिए था। क्योंकि जब देश को बचाने की बात आएगी तो उस समय यह देखा जाएगा कि भाजपा के साथ कौन खड़ा था। देखा जाए तो जाने-अनजाने बॉबी पंवार बीजेपी के पक्ष में ही खड़े नजर आते हैं।
सुजाता पॉल, प्रवक्ता, उत्तराखण्ड कांग्रेस
उत्तराखण्ड के एक गतिशील युवा नेता बॉबी पंवार युवाओं के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरे हैं, खासकर इसलिए क्योंकि हिमालयी राज्य की लगातार सरकारों ने उन्हें रोजगार प्रदान करने के लिए वास्तव में कुछ नहीं किया है। वर्तमान भगवा पार्टी शासन के तहत उत्तराखण्ड में धोखाधड़ी और अवैध रोजगार घोटाले के खिलाफ उनके नेतृत्व में हजारों युवाओं के साथ बड़ा आंदोलन, जिसमें उनके अपने नेता शामिल थे, जैसा कि दिवंगत अंकिता भंडारी मामले में हुआ था और उनकी गिरफ्तारी के कारण कई दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि बॉबी पंवार वर्तमान सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहे हैं। हाल ही में नामांकन पत्र दाखिल करने के दिन टिहरी कलेक्ट्रेट में मौजूद जबरदस्त भीड़, शायद लगभग एक लाख लोगों की भीड़ का कहना सच था कि उत्तराखण्ड की धरती पर एक नए जननेता का उदय हुआ है। आज उत्तराखण्ड अपने अलग अस्तित्व के 24 साल बाद भी चरम भ्रष्टाचार, महंगाई, भू-कानून लागू न होना, भारी बेरोजगारी, युवाओं और परिवारों को बर्बाद कर रही शराब का प्रचलन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, ठेकेदार, खनन और शराब माफियाओं की बढ़ती संख्या और अवैध रिश्वतखोरी से जूझ रहा है। राज्य को भ्रष्टाचार का अड्डा और जबरदस्त दोषों और अवगुणों वाला राज्य करार दिया गया है, जिसका राजकोषीय घाटा 70 हजार करोड़ से अधिक हो गया है। आज वास्तविक अर्थों में दूरदर्शिता, पारदर्शिता, बेदाग सत्यनिष्ठा और बॉबी पंवार जैसी क्षमता वाले एक युवा, तेज-तर्रार और साहसी नेता की हर तरह से आवश्यकता है। हालांकि राजनीति में बॉबी पंवार जैसे पारदर्शी, ईमानदार और तेज-तर्रार नेता आसानी से सिस्टम में फिट नहीं होते हैं या स्वीकार नहीं किए जाते हैं, लेकिन उत्तराखण्ड के लोगों को वैचारिक आधार और पार्टी से जुड़े लोगों को ऐसे युवा नेताओं की फैक्ट्री बनाने के लिए माहौल बनाना चाहिए, जो साफ-सुथरी सोच रखते हों। उत्तराखण्ड की सड़ी-गली राजनीति के मद्देनजर बॉबी पंवार पहली और सबसे बड़ी पसंद होनी चाहिए। वह दिन दूर नहीं जब राज्यों के युवा उत्तराखण्ड को उसकी विभिन्न बुराइयों और भ्रष्टाचार से ग्रस्त व्यवस्था से पूरी तरह मुक्ति दिलाने के लिए बॉबी पंवार के नेतृत्व में कमान अपने हाथ में ले सकते हैं।
सुनील नेगी, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक, यूके नेशन
बॉबी पंवार जैसा व्यक्तित्व युगों में पैदा होता है। ऐसा कोई बिरला ही होता है जो अपनी व अपने परिवार के भविष्य की परवाह किए बिना निःस्वार्थ समाज हित के लिए समर्पित हो जाता है। बिना कोई परवाह किए समाज हित के लिए निकलल पड़ता है। बॉबी पंवार का राजनीति में आना राजनीतिक दलों के लिए आईना है तथा उत्तराखण्ड राजनीतिक क्षेत्र में एक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। निश्चित रूप से उत्तराखण्ड की राजनीति में युवाओं के दखल का आगाज है बॉबी पंवार।
हुकम सिंह रावत, एडवोकेट, कैम्पटी, मसूरी
उत्तराखण्ड में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उपेक्षा और निराशा की उपज है बॉबी पंवार। बॉबी पंवार ही क्यों, आशुतोष नेगी का उदय भी ऐसे ही कारणों से हुआ है। भ्रष्टाचार के
चलते पिछले अनेक वर्ष में राज्य में सरकारी नौकरियों में जिस प्रकार से बड़े पैमाने पर धांधलियां हुई हैं और जिस प्रकार से नौजवानों को बेराजगार बने रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है, वही सब कारण हैं बॉबी के राजनीतिक क्षितिज पर उगने के लिए यदि बॉबी पंवार चुनावी अखाड़े में कूदकर यह राजनीतिक हस्तक्षेप न करता तो कोई और कर लेता। समय की यह मांग है। उत्तराखण्ड में डबल इंजन की सरकार उसी प्रकार से केवल और केवल पूंजीपतियों के लिए काम कर रही है, जिस प्रकार केंद्र में सरकार कर रही है। राज्य और विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों के बेरोजगारों की आवाज आज बॉबी पंवार बन चुका है। टिहरी लोकसभा सीट पर बॉबी ने अपना जलवा खूब बिखेरा। यदि उसके पास थोड़े भी संसाधन होते तो उसकी जीत निश्चित होती। भारतीय जनता पार्टी जैसे अभेद्य लगने वाले संगठन को चुनौती देना कोई खेल नहीं है। बॉबी पंवार ने यह कर दिखाया है। राजशाही को गए दशकों-दशक हो गए हैं पर न जाने क्यों टिहरी की जनता आज भी राजशाही के मोहपाश से बाहर नहीं निकल पा रही है। हां, इन्हीं लोगों में से एक वर्ग ऐसा अवश्य है जो राजशाही को वोट दिए जाने के विरुद्ध है। हो सकता है कि इस वर्ग ने भी परंपरागत राजनीतिक चिंतन को एक ओर रखकर बॉबी को ही अपना वोट दिया हो। नौजवान लोग तो बॉबी के साथ ही देखे गए और तथाकथित मोदी लहर की अंतिम तरंगें कहीं-कहीं अवश्य देखी गईं पर ये निष्प्रभावी थीं। उत्तराखण्ड में बेरोजगारी की मार इतनी है कि नौजवानों की शादियां भी नहीं हो पा रही हैं। लड़कियां कतई ऐसे युवकों से विवाह नहीं करना चाहतीं जो सरकारी नौकरी में न हो और जिसके पास देहरादून, हल्द्वानी या दिल्ली जैसे मैदानी शहरों में अपना घर न हो। ऐसे समस्त युवकों की आवाज आज बॉबी पंवार बन चुका है। सेना में अग्निवीर जैसी निरर्थक योजना लागू किए जाने से भी उत्तराखण्ड के युवावर्ग का संकट बढ़ा है। राज्य बनने के बाद फौज में उत्तराखण्ड का कोटा पहले ही कम हो गया था, अब अग्निवीर योजना ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। इस चुनाव में उसकी हार या जीत से अधिक मायने यह रखता है कि वह कब और कितने लंबे समय तक बेरोजगार युवाओं की आवाज बने रह सकता है। विकास और प्रगति का ढिंढ़ोरा पीटने वाली राज्य की भाजपा सरकार की पोल खोलने में बॉबी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अब इस सरकार की कलई भी उतर चुकी है। बॉबी पंवार ने यह सूत्र भी राज्य के युवावर्ग को दिया है कि उन्हें उल्लू बनाने वालों के दिन लदने वाले हैं। संक्षेप में, बॉबी उपेक्षित, बेरोजगार और आर्थिक कठिनाइयां झेल रहे युवाओं की आवाज है और यह आवाज अब बहुत दूर तक जाएगी।
सुरेश नौटियाल, संस्थापक एवं प्रवक्ता, इंडिया ग्रीन पार्टी

