बदरीनाथ विधानसभा उपचुनाव में मिली हार ने प्रदेश में बीते आठ वर्षों से सत्तारूढ़ भाजपा भीतर घमासान को जन्म दे दिया है। गत् पखवाड़े प्रदेश कार्य समिति की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के वक्तव्य ने इस घमासान को सार्वजनिक करने का काम कर दिखाया है। अब पार्टी नेता अपनी-अपनी सुविधानुसार इस हार का ठीकरा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अथवा पौड़ी से सांसद अनिल बलूनी और प्रदेश सरकार में मंत्री धन सिंह रावत पर फोड़ने का काम कर रहे हैं। इन नेताओं से इतर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अनिल बलूनी और धन सिंह रावत इस हार के लिए पुष्कर सिंह धामी से कहीं अधिक जिम्मेवार हैं। धन सिंह रावत इस उपचुनाव के लिए गठित संचालन समिति के मुखिया थे तो बलूनी ने राजेंद्र भंडारी की भाजपा में एंट्री करा उन्हें पार्टी प्रत्याशी बनाया था

गत् पखवाड़े विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को मिली हार बाद पार्टी में अंदरूनी घमासान मचा हुआ है। एक छोटी सी हार (बदरीनाथ) को भाजपा नेता पचा नहीं पा रहे हैं। 15 जुलाई को ऋषिकेश में आयोजित पार्टी की कार्यसमिति बैठक में भी इसका असर देखने को मिला। बूथ से लेकर मंडल, जिला स्तर के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के सामने पार्टी के कई बड़े नेताओं ने इस बैठक के दौरान प्रदेश संगठन और सरकार की कार्यशैली पर जमकर निशाना साध यह स्पष्ट संकेत दे डाले कि डबल इंजन वाली प्रदेश सरकार आपसी रार की शिकार है। हैरानी की बात यह है कि इस बैठक में कई ऐसे नेता भी अपने बयानों से पार्टी के बड़े नेताओं को असहज कर रहे थे जिन्होंने कभी पार्टी संगठन और शीर्ष नेतृत्व पर कोई सवाल खड़े नहीं किए लेकिन इस बार वे भी अपना दर्द बयान करने से पीछे नहीं रहे। विधानसभा उपचुनाव को लेकर कई नेताओं ने साफ तौर पर कहा कि उम्मीवार का चयन गलत तरीके से किया गया और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई जिससे कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव उत्पन्न हुआ। इसका ही असर रहा कि लोकसभा चुनाव में जिस विधानसभा सीट (बदरीनाथ) में पार्टी को बड़े अंतर से जीत मिली थी, उसी विधानसभा में पार्टी बड़े अंतर से चुनाव हार गई।

कार्यकताओं और बूथ, मंडल स्तरीय नेताओं ने जिस तरह से नेतृृत्व के निर्णयों पर सवाल खड़े करने वाले बयानों का जमकर तालियों और नारेबाजी से समर्थन किया इससे प्रदेश संगठन के साथ-साथ बड़े नेताओं को भरी बैठक में यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा कि उपचुनाव में हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी।

बैठक में सबसे ज्यादा सुर्खियां पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने अपने बयानों से बटोरी। तीरथ ने पार्टी नेताओं को साफ तौर पर नसीहत देते हुए कहा कि ‘मैंने तो पहले ही कह दिया था कि प्रत्याशी का चयन ठीक नहीं है।’ तीरथ सिंह रावत यहीं नहीं रूके और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निर्णयों पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि ‘पार्टी कार्यकर्ताओं पर निर्णयों को थोपा नहीं जाना चाहिए। पार्टी अपने निर्णय थोप देती है जिससे कार्यकर्ताओं में निराशा होती है।’

तीरथ सिंह रावत जैसे अनुशासित नेता द्वारा कार्यसमिति की बैठक में इस तरह से पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े करने से पूरा संगठन भी सकते में है। भाजपा के कई नेता मानते हैं कि पार्टी के हर निर्णय को खुले दिल से स्वीकार करने वाले तीरथ सिंह रावत को अपनी विनम्रता और पार्टी के निर्णयों को स्वीकार करने से जो राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है उसके वे खासे आहत हो अब मुखर हो चुके हैं।

गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत का टिकट काट कर कंाग्रेस से भाजपा में आए सतपाल महाराज को चौबट्टाखाल सीट से चुनाव में उतारा था। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी गढ़वाल संसदीय सीट से तीरथ सिंह रावत का टिकट काटकर पूर्व राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को टिकट दे दिया गया। यही नहीं 2021 में तीरथ सिंह रावत को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन महज 104 दिनोें में ही उनको पद से हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था।

राजनीतिक जानकारों की मानंे तो पार्टी का हर निर्णय सिर झुकाकर स्वीकार करने वाले तीरथ अगर कार्यसमिति में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निर्णय थोपने की बात कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर यह भाजपा के लिए गंभीर बात है। साथ ही जिस तरह से तीरथ रावत की बातों को पार्टी के बूथ और मंडल स्तर के पदाधिकारियों का भरपूर समर्थन मिला वह भी यह बताने के लिए काफी है कि पार्टी के निर्णयों से कार्यकर्ताओं में भारी निराशा का भाव है।

बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के वक्तव्य से भी पार्टी के भीतर मचे घमासान को सार्वजनिक कर दिया। हालांकि मुख्यमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा साफ था कि सरकार के निर्णयों पर पार्टी भीतर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं और निर्णयों को क्षेत्रवाद और जातिवाद में बांटने का काम हो रहा है। मुख्यमंत्री ने किन नेताओं पर इशारा किया यह तो साफ नहीं है लेकिन कुछ समय से सरकार के निर्णयों की आलोचना बढ़ रही है और उनको सोशल मीडिया के माध्यम से जमकर प्रसारित किया जा रहा है। फिर चाहे दिल्ली में केदारनाथ मंदिर के शिलान्यास बाद उठे हंगामें की बात हो या प्रसिद्ध कैंचीधाम की व्यवस्था की बात हो, हर मामले में मुख्यमंत्री को निशाने पर लिया गया है। यहां तक कि फर्जी तरीके से कुमाऊं के रामनगर से चारधाम यात्रा शुरू करने की सरकार की योजना को गढ़वाल बनाम कुमाऊं का रूप दिया जाना रहा हो, कमोवेश हर मामले में मुख्यमंत्री को निशाने पर लिया गया है।

मुख्यमंत्री ने अपने वक्तव्य में ‘शेर की खाल में छिपे भेड़िये को बेनकाब करने की बात’ कह आंतरिक कलह को और गर्मा दियाा है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो धामी भी पार्टी के कई नेताओं यहां तक कि अपनी ही सरकार के मंत्रियों से भी नाराज बताए जाते हैं। विगत दो वर्ष से सरकार के कई मंत्रियों के विभागों में भ्रष्टाचार और घोटाले के मामलांे चलते मुख्यमंत्री असहज हैं। साथ ही पार्टी संगठन और शीर्ष नेतृत्व द्वारा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं की भाजपा में एंट्री से भी पार्टी का एक तबका नाराज है जिसका असर निकाय और पंचायत चुनाव में पड़ना तय माना जा रहा है। इसे मुख्यमंत्री की आने वाले समय में बड़ी चुनौती मानी जा रही है और अपनी सरकार के काम काज को कसौटी पर परखे जाने की आशंका मुख्यमंत्री को भी सता रही है।

मुख्यमंत्री धामी समझ रहे हैं कि विधानसभा उपचुनाव में मिली हार को हथियार बना उनकी सरकार के कामकाज को कसौटी पर कसा जा रहा है। कई नेता नाम न छापने की शर्त पर यह मान रहे हैं कि यह हार पार्टी संगठन की नाकामी सरकार की कार्यशैली और बड़े नेताओं का अहंकार से मिली हार है।

एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मौजूदा समय में पार्टी संगठन कार्यकर्ताओं को आदेश देता है कि अमुक व्यक्ति अब भाजपा में हैं इसलिए उसके लिए जुट जाओ जबकि पूर्व में उसी व्यक्ति से भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता लड़ता और मार खाता रहा है। इन भाजपा नेता का मानना है कि राजेंद्र भंडारी भले ही बदरीनाथ के विधायक रहे हों लेकिन पूरे चमोली जिले में भाजपा के आम कार्यकर्ता और पदाधिकारी उनके खिलाफ लड़ते रहे हैं, लेकिन अचानक से वे भाजपा में आते हैं और टिकट लेकर चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार बन जाते हैं तो कार्यकर्ता कैसे इसको स्वीकार करेगा? पदाधिकारी तो पार्टी के अनुशासन से बंधी हुई एक गाय के समान है लेकिन कार्यकर्ता तो अनुशासन की रस्सी से नहीं बंधा है। इसलिए वह चुनाव में अपनी भूमिका से दूर हो जाता है। यही बदरीनाथ उपचुनाव में हुआ और भाजपा हार गई।

बदरीनाथ विधानसभा उपचुनाव में हार का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए इस पर पार्टी भीतर सुगबुगाहटंे तेज हो रही हैं। नव निर्वाचित सांसद अनिल बलूनी और प्रदेश सरकार में सबसे कई महत्वपूर्ण पोर्ट फोलियो वाले केैबिनेट मंत्री धनसिंह रावत की चुनावी राजनीति और रणनीति पर खुलकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साथ ही प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के नेतृत्व पर भी कई नेता दबे स्वर में सवाल खड़े कर रहे हैं।

अनिल बलूनी और धन सिंह रावत दोनांे ही नेताओं को बदरीनाथ उपचुनाव की पूरी जिम्मेदारी दी गई थी। धन सिंह रावत चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष के तौर पर बदरीनाथ में शुरू से ही मोर्चा संभाले हुए थे तो अनिल बलूनी ने राजेंद्र भंडारी को भाजपा में शामिल कराने की रणनीति तैयार की थी। बलूनी पर लोकसभा चुनाव में बड़े भारी मतों से जीत के बाद सारा दारोमदार आ गया था कि किसी भी तरह से वे बदरीनाथ सीट पर भाजपा के उम्मीदवार को विजयी बनाएं। उपचुनाव में 5 हजार से भी ज्यादा मतों से भाजपा के उम्मीदवार राजेंद्र भंडारी की करारी हार से अनिल बलूनी की लोकप्रियता और चुनावी रणनीति पर भी स्वयं भाजपा के कई नेता दबी जुबान में सवाल खड़े कर रहे हैं।

कई भाजपा के नेता यह भी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में अनिल बलूनी की जगह कोई और नेता को टिकट दिया जाता तो भी मोदी के नाम पर उसका जीतना निश्चित था। लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से जीत बलूनी की लोकप्रियता नहीं थी यह मोदी की लेाकप्रियता और भाजपा के पक्ष में मतदताआंे का रूझान था जो पांचों सीटों पर वोट के तौर पर सामने आया।

भाजपा कार्यसमिति की बैठक में भी कांग्रेस और अन्य दलों से थोक के भाव में नेताओं को भाजपा में शामिल किए जाने की बात भी उठी। हालांकि पार्टी भीतर मचे घमासान को अनुशासन के नाम पर दबा दिया गया लेकिन यह तय है कि निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा भीतर एक बड़े तूफान की आशंका से पार्टी नेता भी सहमे हुए हैं। तीरथ सिंह रावत ने सम्भवतः इसी बात को लेकर कहा कि पार्टी निर्णयों को थोपा नहीं जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहते हुए भाजपा की मौजूदा प्रदेश संगठन और सरकार पर इंशारों-इशारों में तंज कसा कि ‘आज जो पीछे हैं वह कल आगे आ जाएंगे और जो आगे हैं वह पीछे चले जाएंगे।’

बहरहाल भाजपा की कार्यसमिति की बैठक तो सम्पन्न हो गई, इस बैठक से विष निकला है या अमृत यह तो भाजपा का संगठन और नेता ही बता पाएंगे लेकिन यह जरूर है कि अब भाजपा में भी हर आदेश को सिर झुका कर स्वीकार करने की परम्परा टूटने लगी है।

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