Uttarakhand

पाने के वास्ते कुछ ….

‘अबकी बार चार सौ पार’ का चुनावी लक्ष्य रखने वाली भाजपा पर गत् दिनों दिवंगत हुए मशहूर गजलकार पंकज उधास की एक गजल के बोल सटीक बैठते नजर आ रहे हैं। इस गजल की एक पंक्ति है ‘…पाने के वास्ते कुछ, क्या-क्या पड़ा गवाना।’ एक निश्चित उद्देश्य और राजनीति में शुचिता के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने के लक्ष्य से जन्मी भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा अब पूरी तरह से बदल चुका है

 

लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां पूरे देश में तेज हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। राजनीतिक पार्टियां अपनी तैयारियों में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। कांग्रेस जहां अपने अंतर्विरोधों से जूझ रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी की मशीनरी 2024 का लोकसभा चुनाव फतह करने के लिए पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुकी है। भारतीय जनता पार्टी, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के लिए 370 सीटें और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए 400 सीटों का लक्ष्य रखकर भाजपा कैडर के लिए एक लक्ष्य तय कर दिया है। ‘अबकी बार, चार सौ पार’ के नारे को धरातल पर उतारने के लिए भाजपा कमर कस चुकी है। इस लक्ष्य को पाने की जद्दोजहद में वो सब रणनीतियां शामिल हैं जिसमें राजनीतिक नैतिकताओं का शायद ही स्थान हो। चार सौ पार का लक्ष्य तय करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के पास इसे पाने की बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़े जाने वाले इस चुनाव में, भाजपा के पास मोदी का चेहरा, मोदी की गारंटी जैसे नारों के बावजूद भाजपा सहज महसूस नहीं कर पा रही है। शायद इसी के चलते भारतीय जनता पार्टी दूसरे राजनीतिक दलों के बड़े चेहरों को अपनी पार्टी में शामिल करने की रणनीति पर काम करती दिख रही है। इस कवायद के चलते उसे विचारधारा के स्तर पर समझौते करने से भी कोई परहेज नहीं है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में कांग्रेस के साथ ही अन्य राजनीतिक दलों के बड़े चेहरों को भाजपा में शामिल कराया जा रहा है। पार्टी केंद्रीय स्तर पर एक समिति बना दूसरे दलों के ऐसे चेहरों की पहचान की तैयारी की है जो उसके चुनावी लक्ष्य को पाने में सहायक बन सकते हैं। उत्तराखण्ड भी भाजपा की इस कवायद से अछूता नहीं रहा है।

उत्तराखण्ड की राजनीति की बात करें तो यहां चुनावों से ऐन पहले नेताओं का अपने समर्थकों के साथ पाला बदलना कोई नई बात नहीं है। लेकिन एक रणनीति के तहत दूसरी पार्टियों के मजबूत चेहरों को खोज भाजपा में शामिल कराने की मुहिम पहली बार देखने को मिल रही है। भारतीय जनता पार्टी को कैडर आधारित पार्टी माना जाता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की खांटी विचारधारा में दीक्षित स्वयं सेवक ही आमतौर पर भाजपा के संगठन को संभालते हैं। भाजपा के विषय में एक धारणा यह भी है कि वो दूसरी पार्टियों या विचारधारा के लोगों को आसानी से आत्मसात नहीं कर पाते। लेकिन 2 सीटों से 303 सीटों तक पहुंचने के सफर में भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा तीनों में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। सत्ता के लिए ‘किसी भी प्रकार का समझौता न करने’ की घोषणा करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा अब सत्ता के लिए किसी भी प्रकार का समझौता करने से गुरेज नहीं करती। 2016 के राजनीतिक ड्रामे के बाद कांग्रेस विधायकों को तोड़कर हरीश रावत की सरकार को कुछ समय के लिए पदच्युत उत्तराखण्ड की राजनीति में नए समीकरणों की इबारत लिखी गई थी। उस वक्त भले ही हरीश रावत की सरकार बच गई हो लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव ने उत्तराखण्ड के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव किया था। कांग्रेस में बगावत के चलते सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत, उमेश शर्मा ‘काउ’, यशपाल आर्य, सुबोध उनियाल, विजय बहुगुणा, रेखा आर्य, प्रदीप बत्रा, शैलारानी रावत भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने कंाग्रेस के इन बागियों को प्रत्याशी बनाया। शैलारानी रावत को छोड़कर ये सभी नेता विधानसभा में पहुंचे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मंत्रिमंडल में कांग्रेसी पृष्ठभूमि के इन विधायकों में से यशपाल आर्य, सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, हरक सिंह रावत और रेखा आर्य मंत्री रहे। खास बात ये रही कि दस सदस्यीय त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में 50 प्रतिशत मंत्रिमंडल बागी कांग्रेसियों से आच्छादित था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की भले ही सीटें घटी हांे लेकिन कांग्रेस पृष्ठभूमि के विधायकों की संख्या में इजाफा हो गया। जहां 2017 में भाजपा के 57 विधायकों में 11 विधायक कांग्रेस पृष्ठभूमि के थे, वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधायकों की संख्या घटकर 47 रह गई। उनमें गैर भाजपा पृष्ठभूमि के विधायकों की संख्या बढ़कर 14 हो गई। वर्तमान में पुष्कर सिंह धामी मंत्रिमंडल में चंदनराम दास के निधन के बाद आठ मंत्री रह गए हैं। उनमें 4 मंत्री कांग्रेस पृष्ठभूमि के हैं। इस तरह से 2017 और 2022 की भाजपा की सरकारों में आधा मंत्रिमंडल कांग्रेसी मंत्रियों के अनुभवों से चल रहा है। किशोर उपाध्याय टिहरी, सुबोध उनियाल नरेंद्र नगर, शैलारानी रावत केदारनाथ, प्रीतम सिंह पवार धनौल्टी, उमेश शर्मा ‘काउ’ धर्मपुर, प्रदीप बत्रा रुड़की, रेनू बिष्ट यमकेश्वर, रेखा आर्य सोमेश्वर, मोहन सिंह जागेश्वर, त्रिलोक सिंह चीमा काशीपुर, सतपाल महाराज चौबट्टाखाल, सरिता आर्य नैनीताल, सौरभ बहुगुणा सितारगंज, रामसिंह कैड़ा भीमताल से विधायक हैं और सभी गैर भाजपा पृष्ठभूमि से हैं। भले ही इन्होंने भाजपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा हो। अपने मूल दल को छोड़कर भाजपा में शामिल होने पर पुरस्कृत होने वाले नेताओं की इस जमात के चलते भारतीय जनता पार्टी का वो मूल कैडर जो शून्य से शिखर तक पहुंचने का कारक था, कहीं पार्श्व में चला गया। आज बिशन सिंह चुफाल, बंशीधर भगत, मदन कौशिक, अरविंद पाण्डे सरीखे नेता पार्टी की अग्रिम पंक्ति में नहीं दिखाई देते तो कोई आश्चर्य नहीं होता। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार रहे ऊधमसिंह नगर के एक वरिष्ठ भाजपाई का दर्द है कि पार्टी के संघर्षों में दशकों तक साथ रहने और निःस्वार्थ सेवा के बावजूद उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। वे कहते हैं ‘बूथ लेवल कार्यकर्ता के शिखर तक पहुंचने की बात अब बेमानी लगती है। सत्ता के लिए समझौते ने भाजपा के बूथ कार्यकर्ता के लिए अब गुंजाइश भी कहां छोड़ी है। पहले पार्टी को स्थापित किया अब दूसरे दलों से आए नेताओं को स्थापित करना है।’

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव से पहले दूसरे दलों के नेताओं की खोज आगामी चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत बढ़ाने की कवायद है। आज कांग्रेस व अन्य दलों के नेताओं को भाजपा में शामिल कर पार्टी के नेताओं की विजयी मुस्कान भले ही नेताओं को भा रही हो, मगर भाजपा की ओर दूसरे दलों से नेताओं का प्रवाह वैचारिक स्तर पर स्वीकारोक्ति की कोई गारंटी नहीं है। भाजपा में अब कम सक्रिय रहे एक बड़े नेता का कहना है कि ‘सत्ता की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए राजनीतिक नैतिकताओं को दरकिनार करना तात्कालिक रूप में भले ही फायदे दिखाता हो लेकिन दीर्घकालिक रूप में इसका असर पार्टी संगठन के क्षरण के रूप में दिखेगा। एक वक्त ऐसा आएगा जब पार्टी के खांटी कार्यकर्ता जो कि पार्टी को उसके शीर्ष स्तर पर ले आए और दूसरे दलों से सत्ता की चाह में आए नेताओं का भविष्य में किस प्रकार सामंजस्य होगा ये गंभीर समस्या बन उभरेगा।’ दूसरे दलों के लोगों को शामिल करने का सिलसिला बड़े नेताओं से लेकर निचले स्तर तक चल रहा है। भाजपा में शामिल होने वाले पंचायत और स्थानीय निकाय तक के नेता हैं जिनकी महत्वाकांक्षाएं आने वाले पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में निश्चित तौर पर भाजपा के लिए चुनौती बनेंगी।

‘मोदी की गारंटी’ और ‘अब की बार चार सौ पार’ के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पाने के लिए क्या भाजपा के पास मुद्दों का टोटा पड़ गया है? क्या मोदी की गारंटी और मोदी का चेहरा भाजपा को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। सत्ता पाने के लिए इस हद तक समझौते क्या भाजपा की हड़बड़ाहट को दर्शाते हैं? अपनी सत्ता बरकरार रखने के लए कभी दूसरे दलों के लोगों को ‘कचरा’ कहने वाली भाजपा आज उसी कचरे को समेटते दिख रही है। उत्तराखण्ड में सरकार बनाने के लिए वो गैर भाजपाई पृष्ठभूमि वाले नेताओं से पीछा नहीं छुड़ा पा रही है। अपने कैडर से ज्यादा दल बदलने वालों की पूछ हो रही है। चुनावी प्रबंधन में माहिर मानी जाने वाली भाजपा का नेतृत्व आज दल बदल को इतना क्यों प्रश्रय दे रहा है? ये चर्चा राजनीतिक हलकों में तैर रही है। पीएम नरेंद्र मोदी का कथित आभामंडल भाजपा और मीडिया के एक वर्ग ने जितना प्रचारित कर दिया है उसने भाजपा के सामने ही चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अगर मोदी के चेहरे पर ही स्वयं भाजपा को भरोसा होता तो उसे इतनी कवायदों की जरूरत नहीं होती। भाजपा को शायद एहसास होने लगा है कि विविधता भरे भारत में एक बड़े नेता के चेहरे की भी सीमाएं होती हैं और सत्ता के लिए इस प्रकार के समझौते अपरिहार्य हो जाते हैं क्योंकि नेहरू के कद को छूने के लिए नेहरू जैसी समझ विकसित कर पाना हर नेता के वश में नहीं है।

 

कांग्रेस के पल्लू पर भारी भाजपा का दामन
उत्तराखण्ड में कांग्रेस के लिए आगामी लोकसभा चुनाव मुश्किल साबित हो रहा है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता जिस तरह कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं उससे केंद्रीय नेतृत्व सकते में है। पिछले एक सप्ताह में ही कांग्रेस के दर्जनों नेता पार्टी का पल्लू छोड़ भाजपा का दामन थाम चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वाले अधिकतर नेता पौड़ी लोकसभा के ही हैं। कांग्रेस के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह सजवाण और मालचंद के अलावा लक्ष्मी राणा समेत कई नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पूर्व विधायक धन सिंह नेगी ने भी पार्टी से त्यागपत्र देकर कांग्रेस को झटका दे दिया है। धन सिंह पूर्व में भाजपा में थे और वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल हुए थे। 17 मार्च को ही बदरीनाथ सीट से कांग्रेस विधायक एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र भंडारी भाजपा में शामिल हो गए। उनकी लंबे समय से भाजपा में शामिल होने की चर्चा चल रही थी। उनकी पत्नी रजनी भंडारी के पौड़ी का जिला पंचायत अध्यक्ष रहते भ्रष्टाचार के आरोप हैं। राजेंद्र भंडारी ने वर्ष 2007 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और पहली बार विधानसभा पहुंचे। तब उन्होंने तत्कालीन भाजपा सरकार को समर्थन दिया और वह पहले खंडूड़ी, फिर निशंक सरकार में मंत्री रहे। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले वह कांग्रेस में शामिल हुए और कांग्रेस के टिकट पर इसी सीट से विधायक चुने गए। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए थे, जबकि वर्ष 2022 में वह तीसरी बार विधायक चुने गए थे। इसके अलावा 20 मार्च को कांग्रेस नेता केसर सिंह नेगी भी भाजपा में शामिल हो गए। केसर सिंह साल 2022 में कांग्रेस के टिकट पर चौबट्टाखाल विधानसभा से चुनाव लड़ चुके हैं। वे पौड़ी के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं। केसर नेगी के साथ नवल किशोर ने भी कांग्रेस को अलविदा कह दिया है। किशोर 2022 में कांग्रेस से पौड़ी से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। नेगी और नवल किशोर के अलावा कांग्रेस नेता दीपक कुकसाल ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। कुकसाल पौड़ी के ब्लॉक प्रमुख हैं। जबकि कांग्रेस के एक और नेता दीपक भंडारी ने भी कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है। भंडारी जहरीख़ाल के ब्लॉक प्रमुख हैं।

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